अगस्त-2017

देशअँगूठा छाप     Posted: July 1, 2015

स्टेशन आते ही उसने बगल में बैठे सहयात्री से उत्सुकता से पूछा–‘‘भैया कौन सा टेसन है?‘‘
‘‘बाहर बोर्ड नहीं दिख रहा है क्या ? पढ़ नहीं सकते?‘‘
‘‘नहीं बाबूजी।‘‘ मजदूर से दिखने वाले उस सहयात्री ने असमर्थता जताते हुए कहा।
‘‘अच्छा तो अँगूठा छाप हो।‘‘ अहंकार में डूबे आधुनिकता का लबादा ओढ़े युवक ने स्टेशन का नाम बताते हुए कहा। थोड़ी देर बाद उसने टच स्क्रीन मोबाइल निकाला और गेम खेलने लगा। यह देख सहयात्री हौले से हँस। दम्भित युवक रौब गाँठते हुए बोला– ‘‘क्यों हँस रहे हो। ऎसा मोबाइल पहली बार देख है क्या?‘‘
‘‘नहीं बाबूजी इसलिए नहीं।‘‘
‘‘तो फिर?‘‘
‘‘इसलिए कि हम दोनों एक जैसे हैं।‘‘
‘‘मतलब?‘‘
‘‘मैं अनपढ़ अँगूठा छाप हूँऔर आप पढे़ लिखे।‘‘
मोबाइल पर थिरकते अँगूठे थम गये। और युवक मुंह खोले आश्चर्य से उसे देखता रह गया।
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गतिविधियाँ

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
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