अप्रैल-2018

देशअपरिपक्व     Posted: November 1, 2016

जिस छड़ी के सहारे चलकर वो चश्मा ढूँढने अपने बेटे के कमरे में आए थे, उसे पकड़ने तक की शक्ति उनमें नहीं बची थी। पलंग पर तकिए के नीचे रखी ज़हर की डिबिया को देखते ही वह अशक्त हो गए। कुछ क्षण उस डिबिया को हाथ में लिए यूँ ही खड़े रहने के बाद उन्होंने अपनी सारी शक्ति एकत्र की और चिल्लाकर अपने बेटे को आवाज़ दी,
“प्रबल…! यह क्या है..?”
बेटा लगभग दौड़ता हुआ अंदर पहुंचा, और अपने पिता के हाथ में उस डिबिया को देखकर किंकर्तव्यविमूढ होकर खड़ा हो गया। उन्होंने अपना प्रश्न दोहराया, “यह क्या है..?”
“जी… यह… रौनक के लिए…” बेटे ने आँखें झुकाकर लड़खड़ाते स्वर में कहा।
सुनते ही वो आश्चर्यचकित रह गए, लेकिन दृढ़ होकर पूछा, “क्या! मेरे पोते के लिए ? तूने यह सोच भी कैसे लिया?”
“पापा, पन्द्रह साल का होने वाला है वह, और मानसिक स्तर पाँच साल का ही… कोई इलाज नहीं… उसे अर्थहीन जीवन से मुक्ति मिल जाएगी…” बेटे के स्वर में दर्द छलक रहा था।
उनकी आँखें लाल होने लगी, जैसे-तैसे उन्होंने अपने आँसू रोके, और कहा, “बूढ़े आदमी का मानसिक स्तर भी बच्चों जैसा हो जाता है, तो फिर इसमें से थोड़ा सा मैं भी….”
उन्होंने हाथ में पकड़ी ज़हर की डिबिया खोली ही थी कि उनके बेटे ने हल्का_ सा चीखते हुए कहा, “पापा…! बस।”, और डिबिया छीन कर फैंक दी। वो लगभग गिरते हुए पलंग पर बैठ गए।
उन्होंने देखा कि ज़मीन पर बिखरा हुआ ज़हर बिलकुल पन्द्रह साल पहले की उस नीम-हकीम की दवाई की तरह था, जिससे केवल बेटे ही पैदा होते थे।
और उन्हें उस ज़हर में डूबता हुआ उनकी पुत्रवधू का शव और अपनी गोद में खेलता पोते का अर्धविकसित मस्तिष्क भी दिखाई देने लगा।
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