दिसम्बर-2017

संचयनलघुकथाएँ     Posted: September 1, 2016

1-करवाचौथ का कड़वा सच

अगले दिन की छुट्टी का आवेदन पत्र बॉस के सामने रखते हुए महिला कर्मचारी ने कारण स्पष्ट किया कि कल करवा चौथ है, वर्ष में एक ही ऐसा दिन है जब पति के साथ पूरे दिन रहने की इच्छा रहती है।बॉस ने मुस्कुरा कर छुट्टी स्वीकृत कर दी।

महिला ने घर में बड़बड़ाते हुए प्रवेश किया -‘‘अगर बॉस करवा चौथ की छुट्टी भी नहीं दें तो ऐसी नौकरी किस काम की? इससे अच्छा मैं नौकरी ही ना करूँ।

पति ने हँसते हुए कहा -‘‘यह कोई गम्भीर मुद्दा नहीं है। शाम को चन्द्रमा

देखने के बाद दोनो साथ ही खाना खाएँगे और फिर सारी रात्रि साथ ही तो हैं।’’

करवा चौथ के दिन महिला नौकरी के लिये घर से निकली। पुरुष मित्र दो चौराहे छोड़कर आगे वाली गली में चार पहिया वाहन लिये हुए खड़ा मिल गया। दोनों किसी अनजान राह पर निकल पड़े। दिन–भर घूमत रहे, नाश्ता–खाना वगैरह चलता रहा और प्रीत की किश्ती में सवार दोनो को समय का भान ही नहीं रहा।

‘‘अरे यार, मुझे घर जाना पड़ेगा। वो बेचारा मेरा मुँह देखकर खाना खाएगा’’ अचानक महिला मित्र ने कहा।

पुरुष मित्र को भी उसके विवाहित होने का ख्याल आया।वह बोला– ‘‘यार

मेरी धर्मपत्नी भी मेरा मुँह देखकर ही खाना खाएगी।

और दोनो करवाचौथ का कड़वा सच प्रकट कर एक–दूसरे से विदा हो गए।

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2-पूर्वाग्रह

एक निजी महिला चिकित्सालय में मैं मेरी पुत्री का चैक अप करवाने गया था। महिला चिकित्सक ने कुछ जाँचें लिखी थीं अत: उसमें समय लगना स्वाभाविक था। चिकित्सालय में वेटिंग रुम जैसी व्यवस्था थी जहाँ लगभग पन्द्रह–बीस कुर्सियाँ व्यवस्थित रूप से लगी हुई थी। मैं भी वहाँ जाकर एक कुर्सी पर बैठ गया। पास की कुर्सी पर एक अधेड़ उम्र के सभ्रान्त से दिखने वाले व्यक्ति बैठे थे। वेटिंग रूम से सभी आने–जाने वाले लागों को देखा जा सकता था। लगभग सभी महिलाएँ

प्रसव संबंधी चिकित्सा परामर्श के लिए इस अस्पताल में आ–जा रही थी। लगभग आधे घण्टे के बाद एक युवक व युवती के साथ अस्पताल में दाखिल हुआ। युवती गर्भवती लग रही थी, पर उसने न तो माँग में सिंदूर भर रखा था और न ही हाथों में चूड़ियाँ आदि पहन रखी थी। युवक भी अत्यधिक घबराया हुआ लग रहा था। मेरे

पास बैठे शख्स ने बड़बड़ाते हुए कहा- ‘‘ साले पहले विवाह पूर्व गलतियाँ करते

हैं और फिर भागते फिरते हैं।’’

मैंने उत्सुकता से उनसे पूछा ‘‘क्या आप युवक या युवती को जानते हैं।’’

उस व्यक्ति ने हँसकर उत्तर दिया ‘‘ आप किस दुनिया  में रहते है मैं इन दोनों की घबराहट और हालत को देखकर सब कुछ जान गया और आपको कुछ भी पता नहीं चला?

मैंने हँसकर बात बंद कर दी। कुछ समय बाद संयोगवश वह युवक मेरे पास वाली कुर्सी पर आकर बैठ गया। वह काफी घबराया हुआ और परेशान था। मैंने वैसे ही पूछ लिया ‘‘ क्या बात है इतना परेशान क्यों हो?’’

युवक ने बताया – ‘‘हम दोनो की शादी लगभग 5 वर्ष पूर्व हुई थी, शादी के लगभग एक वर्ष बाद एक बहुत सुन्दर लड़की पैदा हुई ;परन्तु लगभग छह माह की आयु में वह किसी अज्ञात बीमारी से चल बसी।उसके जाने के बाद उसकी माँ ने प्रण लिया कि वह कोई शृंगार तब तक नहीं करेगी जब तक कि भगवान उसकी गोद फिर से हरी नहीं कर देता। अब हमें संतान का इंतजार है और जब भी हम अस्पताल आते हैं हमारी घबराहट स्वत: बढ़जाती है।’

मैंने पास बैठे अधेड़ की तरफ देखा। वे अपना सिर झुकाए बैठे थे,शायद

उन्होने भी सब कुछ सुन लिया था और वेसमझ गये थे कि हमारा पूर्वाग्रह समाज

को जितना बुरा मानता है उतना बुरा यह समाज नहीं है।

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3- गैरहाज़िर कन्धे

विश्वास साहब अपने आपको भागयशाली मानते थे। कारण यह था कि उनके दोनो पुत्र आई.आई.टी. करने के बाद लगभग एक करोड़ रुपये का वेतन अमेरिका में प्राप्त कर रहे थे। विश्वास साहब जब सेवा निवृत्त हुए तो उनकी इच्छा हुई कि उनका एक पुत्र भारत लौट आ और उनके साथ ही रहे ;परन्तु अमेरिका जाने के बाद कोई पुत्र भारत आने को तैयार नहीं हुआ, उल्टे उन्होंने विश्वास साहब को अमेरिका आकर बसने की सलाह दी। विश्वास साहब अपनी पत्नी भावना के साथ अमेरिका गये ; परन्तु उनका मन वहाँ पर बिल्कुल नहीं लगा और वे भारत लौट आए।

दुर्भाग्य से विश्वास साहब की  पत्नी को लकवा होगया और पत्नी पूर्णत: पति की सेवा पर निर्भर हो गई। प्रात: नित्यकर्म से लेकर खिलाने–पिलाने, दवाई देने आदि का सम्पूर्ण कार्य विश्वास साहब के भरोसे पर था। पत्नी की जुबान भी लकवे के कारण चली गई थी। विश्वास साहब पूर्ण निष्ठा और स्नेह से पति धर्मका निर्वहन कर रहे थे।

एक रात्रि विश्वास साहब ने दवाई वगैरह देकर भावना को सुलाया और स्वयं भी पास लगे हुए पलंग पर सोने चले गए। रात्रि के लगभग दो बजे हार्ट अटैक से विश्वास साहब की मौत हो गई। पत्नी प्रात: 6बजे जब जागी तो इन्तजार करने लगी कि पति आकर नित्य कर्म से निवृत्त होने मे उसकी मदद करेंगे। इन्तजार करते करते पत्नी को किसी अनिष्ट की आशंका हुई। चूँकि पत्नी स्वयं चलने में असमर्थ थी ,उसने अपने आपको पलंग से नीचे गिराया और फिर घसीटते हुए अपने पति के पलंग के पास पहुँची। उसने पति को हिलाया–डुलाया पर कोई हलचल नहीं हुई। पत्नी समझ गई कि विश्वास साहब नहीं रहे। पत्नी की जुबान लकवे के कारण चली गई थी ; अत: किसी को आवाज देकर बुलाना भी पत्नी के वश में नहीं था। घर पर और कोई सदस्य भी नहीं था। फोन बाहर ड्राइंग रूम मे लगा हुआ था। पत्नी ने पड़ोसी को सूचना देने के लिए घसीटते हुए फोन की तरफ बढ़ना शुरू किया। लगभग चार घण्टे की मशक्कत के बाद वह फोन तक

पहुँची और उसने फोन के तार को खींचकर उसे नीचे गिराया। पड़ोसी के नंबर जैसे तैसे लगाये। पड़ौसी भला इंसान था, फोन पर कोई बोल नहीं रहा था, पर फोन आया था,अत: वह समझ गया कि मामला गंभीर है। उसने आस– पड़ोसी के लोगों को सूचना देकर इकट्ठा किया, दरवाजा तोड़कर सभी लोग घर में घुसे।उन्होने देखा -विश्वास साहग पलंग पर मृत पड़े  थे तथा पत्नी भावना टेली फोन के पास मृत पड़ी थी।पहले विश्वास और फिर भावना की मौत हुई। जनाजा दोनों का साथ–साथ निकला। पूरा मोहल्ला कंधा दे रहा था परन्तु दो कंधे  मौजूद नहीं थे जिसकी माँ–बाप की उम्मीद थी। शायद वे कंधे करोड़ो रुपये की कमाई के भार सेपहले से ही दबे हुए थे।

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4-दही का इन्तजाम

गुप्ता जी जब लगभग पैंतालीस वर्ष के थे तब उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया था। लोगों ने दूसरी शादी की सलाह दी परन्तु गुप्ता जी ने यह कहकर मना कर दिया कि पुत्र के रूप में पत्नी की दी हुई भेंट मेरे पास हैं, इसी के साथ पूरी जिन्दगी अच्छे से कट जाएगी।

पुत्र जब वयस्क हुआ तो गुप्ता जी ने पूरा कारोबार पुत्र के हवाले कर दिया। स्वयं कभी मंदिर और आॅफिस में बैठकर समय व्यतीत करने लगे। पुत्र की शादी के बाद गुप्ता जी और अधिक निश्चित हो गये। पूरा घर बहू को सुपुर्द कर दिया।

पुत्र की शादी के लगभग एक वर्ष बाद दुपहरी में गुप्ता जी खाना खा रहे थे, पुत्र भी ऑफिस से आ गया था और हाथ–मुँह धोकर खाना खाने की तैयारी कर रहा था। उसने सुना कि पिता जी ने बहू से खाने के साथ दही माँगा और बहू ने जवाब दिया कि आज घर में दही उपलब्ध नहीं है। खाना खाकर पिताजी ऑफिस चले गये। पुत्र अपनी पत्नी के साथ खाना खाने बैठा। खाने में प्याला भरा हुआ दही भी था। पुत्र ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और खाना खाकर स्वयं भी ऑफिस चला गया।

लगभग दस दिन बाद पुत्र ने गुप्ता जी से कहा- ‘‘ पापा आज आपको कोर्ट चलना है,आज आपका विवाह होने जा रहा है।’’ पिता ने आश्चर्य से पुत्र की तरफ देखा और कहा-‘‘बेटा मुझे पत्नी की आवश्यकता नही है और मैं तुझे इतना स्नेह देता हूँ कि शायद तुझे भी माँ की जरूरत नहीं है, फिर दूसरा विवाह क्यों?’’

पुत्र ने कहा ‘‘ पिता जी, न तो मै अपने लिए माँ ला रहा हूँ न आपके लिए पत्नी,मैं तो

केवल आपके लिये दही का इन्तजाम कर रहा हूँ। कल से मै किराए के मकान मे आपकी बहू के साथ रहूँगा तथा ऑफिस मे एक कर्मचारी की तरह वेतन लूँगा ताकि आपकी बहू करे दही की कीमत का पता चले।’’

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5-कड़वा  कौर

हिन्दू समाज में जिस दिन किसी के घर में मौत हो जाती है, उस दिन घर में चूल्हा नहीं जलता और खाना सगे–सम्बन्धियों या पड़ौसियों द्वारा उस घर में पहुँचाया जाता है जिसे ‘‘कड़वा कौर‘‘ कहा जाता है।

माँ के पाँच बेटे थे। पाँचों के प्रति माँ का अगाध स्नेह और प्यार था । बेटे सयाने हो गए थे और उनकी बहुएँ भी आ गई थीं पर माँ का मानना था कि बेटों का उनके हाथ का खाना ही सर्वाधिक पंसद है। पाँचो बेटों को अपने बूढ़े हाथों से खाना बनाकर खिलाना माँ को सबसे अच्छा लगता था। माँ को सदैव चिन्ता बनी रहती थी कि यदि मैं नहीं रही तो बच्चों को खाने का वह स्वाद संतुष्टि कौन देगा? अत्यधिक बुजुर्ग होने के बावजूद माँ अपने काँपते हाथो से खाना बनाकर बेटों को खिलाती।

एक दिन माँ भगवान को प्यारी हो गई । दाह- संस्कार के बाद सगे सम्बन्धियों द्वारा किसी होटल से ‘कड़वा कौर‘ की व्यवस्था की गई। पाँचों बेटे खाना खाने बैठे। एक दो कौर खाने के बाद एक बेटे ने कहा ‘‘सब्जी बहुत अच्छी बनी है‘‘ दूसरे बेटे ने हामी भरी। एक बेटे ने पूड़ी के नरम होने की तारीफ़ की। पाँचों बेटों ने पूर्ण संतुष्टि के साथ खाना खाया। कहते है मृत्यु के बाद कुछ दिनों तक आत्मा अपनों के पास भटकती रहती है। माँ की आत्मा बच्चों के आस पास भटक रही थी। लगता था माँ की आत्मा आज भी बन्धन मुक्त नहीं थी, परन्तु माँ की आत्मा नें जब यह सब कुछ सुना तो माँ की आत्मा उसी समय बन्धन मुक्त हो गई। माँ को लगा ‘‘अब मेरे बेटे बड़े और सयाने हो गए है, अब उन्है मॉ के हाथो के खाने  की आवश्यकता नहीं है।’’

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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