जून-2017

देशअस्तित्वबोध     Posted: September 1, 2015

नीता चार साल बाद एम.बी.ए. कर के, अच्छी नौकरी पाकर न्यूयार्क से वापस हाथरस अपने पहुँची थी। उसे देख कर पूरा घर उमड़ आया। बड़े भैया, भाभी, और छोटी गुड़िया सबसे आगे थे, पीछे से दोनों छॊटी बहनें खिली पड़ रहीं थीं। मम्मी और दादी, चाची और उनके दोनों बेटे….सारा घर दरवाज़े पर से ही उसे बाँहों में भरने को तैयार था। भाभी ने आरती उतार कर ही उसे घर के अंदर आने दिया। वह हँस रही थी और शर्मा भी रही थी..” ऐसी कौन -सी मेहमान है वो!!”
कमरों के बीच बने, अंदर वाले आँगन में सबकी खूब दौड़ भाग हो रही थी। वह भी सब के साथ बच्ची बन गई, चार साल का विदेशीपन, ऊँची पढ़ाई, ऑफिस का अच्छा पद, उस सब से जुड़ी सारी गंभीरता..चार पलों में उड़न-छू! भागा-दौड़ी के बीच ही उसे दादी के वो शब्द सुनाई दिये थे, जो वो माँ से कह रही थीं,“ बहू! नीता को ज़रा नब (झुक) के चलने को कहो, पहाड़ सी यहाँ से वहाँ डोल रही है, लड़की की जात, उस पर से भारी पढ़ाई! ऐसे छाती निकाल के चलेगी तो लोग क्या कहेंगे? शादी के टोटे पड़ेंगे सो अलग, आजकल की लड़कियाँ भी बस….!!” दादी इसके बाद भी उसकी चिंता में बुदबुदाती रहीं।
नीता ने सुना! उसे लगा,घर की दीवारों ने सुना, आँगन ने सुना, भाई-बहनों ने भी सुना,रसोई ने सुना…वह हतप्रभ रह गई। फिर वह भाई-बहनों के खॆल में भाग नहीं ले सकी। यह बात वो बचपन से सुनती आ रही है दादी से.. “ ज़रा नब के चलो!” वो अपनी लंबाई के कारण हमेशा शर्मिंदा होती थी!
पर पिछले सालों से वह अमरीका में दूसरी बात सुनती आ रही थी, “सीधे चलो!”
उसकी बॉस अक्सर उसे कहती, ” क्या तुम से कोई ग़लती हुई है?”
वह हैरान होकर कहती, ” नहीं!!”
“तो झुक कर क्यों बैठती हो?”
वह शर्मिंदा हो कर और सिकुड़ आती। उसकी अफसर उसकी “मैन्टोर” (गुरु) भी थीं। कोर्स समाप्त करने के बाद वह “इन्टर्नशिप” के लिए इसी कम्पनी में आई थी और उसका काम इतना अच्छा था कि उसकी अफसर ने उसे एक साल बाद जाने नहीं दिया और नौकरी दे दी। काम के साथ काम की प्रस्तुति के बारे में उसने बहुत कुछ “लॉरा”, अपनी इस गुरु और अफसर से सीखा था। वो अक्सर उसे कहतीं,
“तुम्हारे शरीर की भाषा, तुम्हारे बोले हुए शब्दों से अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। अगर तुम झुक कर बैठोगी, खड़ी होगी तो आत्मविश्वास की कमी दिखाई देगी और तुम अच्छा काम करके भी सफल नहीं हो पाओगी। क्या तुम यह बर्दाश्त कर पाओगी कि तुम्हारा ‘इम्प्रेशन’(प्रभाव) अच्छा न पड़े?
नहीं! असफलता का कोई विकल्प नहीं है उसके लिए । नीता ने बहुत मेहनत की है इस पड़ाव तक आने के लिए, अब इस एक छोटी सी बात के लिए वह अपनी सफलता के सपनों को दाँव पर नहीं लगा सकती!
पर तब भी बहुत कोशिशों के बाद भी वह आदतन झुक जाती। बहुत लम्बा समय लगा उसे और “लॉरा” उसे बराबर समझाती, टोकती रही, बिल्कुल दादी की तरह मगर बिल्कुल उल्टी बात के लिए ।

और बाद में दोबारा शर्मिंदा हुई थी वह यह जानकर कि उसकी गर्दन और पीठ का तेज़ दर्द केवल इसलिए था ; क्योंकि वह सीधे नहीं चलती, सीधी नहीं बैठती! सिरदर्द और नॉज़िया जब बढ़ गए तो उसे डॉक्टर के पास जाना पड़ा था और फिर वहाँ से फिज़ियोथैरेपी पर। कई महीनों की थैरेपी..निरंतर याद दिलाए जाने, पीठ को टेप से बाँधने आदि के बाद कहीं जाकर अब वह स्वत: सीधी खड़ी होती है वरना तो हाईस्कूल से कंधे सिकोड़ कर, हल्का -सा झुककर चलने की आदत थी उसे।
माँ जानती हैं कि उसे किस दर्द और परेशानी से गुज़रना पड़ा था, कितनी रातें हीटिंग पैड पर गुज़ारनी पड़ी थीं! माँ जानती थी कि ऑफिस में भी उसे इस बात के लिए टोका जाता है। फोन पर अक्सर वो नीता की बातें सुनकर रुआँसी हो जातीं कि तू इतनी दूर है कि मैं वहाँ आकर तेरी कुछ मदद भी नहीं कर पा रही हूँ। पापा भी यह सब जानते थे..शायद सभी थोड़ा बहुत उसके दर्द के बारे में जानते थे..शायद दादी भी! पर दादी तो दादी हैं..घर की प्रमुख नियंत्रक..कड़क महिला…आज तक किसी ने उनसे पलट कर कुछ नहीं कहा पर उनकी डाँट से सब घबराते थे। बहुत ज़ोर से डाँटती थीं वो।
माँ ने भी उनकी यह बात सुनी, वो कुछ कहने जा रही थीं कि उन्होंने नीता को हतप्रभ सा खड़ा देखा तो पहले उसके पास आ गईं! नीता के आँखों में एक भाव आता था, एक जाता था! कितनी मुश्किल से वह सीधे खड़े रहना सीख पाई है। इतनी छोटी सी बात लगती है, सीधे खड़े रहना, सीधे बैठना पर जिसे हमेशा झुककर चलने को कहा गया हो, उसके लिए सीधे चलने की आदत डालना कितना कठिन होता है, वह जानती है! लॉरा हमेशा कहती.. “इट वोंट हैपन अंटिल यू डू इट ( यह तभी होगा जब तुम करोगी)”
इतनी कोशिशों के बाद उसे अभ्यास हुआ था सीधे बैठने, खडे होने का! और अब…
माँ ने उसे कंधे से घेर लिया, और दादी के पास आते हुए सधी आवाज़ में कहा, “माता जी, नीता को सीधे ही चलना है, सीधा खड़ा रहना है, सीधे ही बैठना है। किसी को अगर इस कारण हमारी लड़की पसन्द नहीं आती, तो यह उनकी समस्या है, अब यह कभी झुककर नहीं चलेगी!”
ड्यौढ़ी पार कर भीतर आते हुये पापा और चाचा ने माँ की बात सुनी, दादी ने भी हैरानी से सुना। आँगन ने सुना, घर की दीवारों ने सुना, बच्चों ने सुना, चौके में चाय बनाती चाची ने सुना..पहली बार नीता ने सुना ..और पाया कि उसकी माँ उससे भी कहीं ज़्यादा सीधी खड़ी है!
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गतिविधियाँ

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

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