नवम्बर-2017

देशआठ सिक्के     Posted: January 2, 2015

ठंड लगभग जा चुकी थी । गंगा किनारे के जो घाट ठंड में सूने पड़े रहते थे, ठंड का असर कम होते ही फिर आबाद होने लगे थे। घाटों पर चहल-पहल बढ़ने लगी थी।पिछली रात ओले क्या पड़े। ठंड पलटकर आ गई। सर्द हवाओं ने एक बार फिर गंगा के किनारों को निर्जन बना दिया था। किनारों पर वही इक्का दुक्का नजर आते जो बरसों से बिना नागा किए गंगा मैया के तट पर आते रहे हैं।
कड़ाके की ऐसी ठंड में शिव मंदिर के पास यही कोई सात-आठ बरस का लड़का अधनंगा बैठा था। हडिड्यों को गला देनेवाली ठंड में कपड़े के नाम पर उसके तन पर सिर्फ अधोवस्त्र था। गंगा दर्शन को आए लोग घाट पर खड़े होकर नदी में सिक्का फेंकते और वो लड़का छपाक से नदी में कूद जाता और कुछ ही पलों में अपनी मुठ्ठी में सिक्का दबाए ऊपर आजाता। वो बहते हुए पानी में गोता लगाकर सिक्का ढूंढ लाता। लोग हतप्रभ होकर उसे देखते। उसके इस अनोखे करतब पर वे तालियाँ तो नहीं बजाते अलबत्ता वही सिक्का उसके हाथ में थमाकर आगे बढ़ जाते। वो रोज इसी तरह गंगा मैया के पेट से सिक्के निकालकर अपने पेट का इंतजाम करता।
दोपहर का वक्त था। सूरज अपनी प्रकृति के हिसाब से चरम पर था लेकिन ठंड के तीखे तेवरों के आगे आज वो भी नतमस्तक था। शिव मंदिर की सीढ़ियां उतरती हुई महिला के सामने उस लड़के ने हाथ फैलाया। महिला उसे नजर अंदाज कर आगे बढ़ने लगी तो साथ चल रहे पति ने उसे रोका। अपनी जेब से एक सिक्का निकाला और नदी में फेंक दिया। लड़का फुर्ती से मंदिर के चबूतरे पर चढ़ा और कुल्फी जमादेने वाली ठंड में कल-कल बहती गंगा नदी में कूद पड़ा। छपाक की आवाज के साथ लहरें गोल होने लगीं। लड़का कुछ ही पलों में उन वलयाकार लहरों को चीरता हुआ मुठ्ठी में सिक्का दबाए हाजिर था। ‘ओह नोण्ण्’ महिला ने विस्फारित आंखों से उस लड़के को देखते हुए कहा। अपने बेटे के सिर से सरक आए स्कार्फ को उसने व्यवस्थित किया और कसकर गठान लगा दी ताकि कानों में ठंडी हवा न जा सके।‘मैंने  एक ही सिक्का फेंका था। तुम चाहो तो एक साथ कई सिक्के फेंक सकती हो। ये लड़का उन्हें भी निकाल लायेगा। यू केन ट्राय।’पति ने कहा। महिला ने पर्स से मुठ्ठी भर कलदार निकाले। गिने तो कुल आठ सिक्के थे। महिला ने हाथ को हवा में उछाला और पूरी ताकत से सिक्के नदी में फेंक दिये। लड़का चीते-सी तेजी के साथ शिव मंदिर के चबूतरे पर चढ़ा और नदी में कूद गया। इस बार नदी में लहरें एक जगह नहीं कई जगह गोल हो गई थीं। नदी का वो हिस्सा जिस जगह पर लड़का कूदा था वहाँ पानी की हलचल कम हो गई थी। महिला ने पति की ओर देखा और चलने लगी।
‘रुको वो आता ही होगा। इस बार सिक्के ज्यादा हैं।’ पति ने कहा।
‘वो नहीं आयेगा। चालाक है वो। अब तक तो चुपचाप अंदर ही अंदर तैरकर किसी दूसरे किनारे पर चला गया होगा। आज की कमाई हो गई उसकी।’ महिला ने बेटे की लेदर जैकेट की चैन को गले तक कसकर लॉक कर दिया। अब सर्द हवाओं को कहीं से भी घुसने की गुंजाइश नहीं थी। साथ ही बेटे को हिदयात भी दी-‘डोंट प्ले विथ चेन। बीमार हो जाओगे। अब चलो बहुत ठंड है।’
‘रुक जाइए मेम साब… देख तो लीजिए… पूरे आठ सिक्के ढूँढकर लाया हूँ।’ लड़के के होंठ ठंड से नीले पड़ गए थे।

-0-

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-
    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine