अगस्त-2017

संचयनएक्सपर्ट     Posted: July 1, 2015

””आज फिर से वही आलू मटर। बोर हो गया मैं ऐसी सब्जियों से।कभी पिज़्जा बनाया आपने। कभी पास्ता भी बनाओ, शर्म आती है सब बच्चों के सामने अपना लंच बॉक्स खोलते। जब देखो पराठे और सब्जी।
शामक की माँ तो उसे हमेशा नयी-नयी सब्जियाँ बना के देती है। रोजाना उसका लंच बॉक्स नए व्यंजन से भरा होता है। जाओ, आज मैं स्कूल नहीं ले जाऊँगा कुछ।” और शाश्वत की ऐसी बेरुखी तोड़ गई सुधा को भीतर तलक। आखिर माँ है न। गृहशोभा से देखकर उसने जैसे-तैसे आज पास्ता बनाया लंच के लिए और जब बेटे के सामने परोसा तो उसकी चमकती आँखें देख कर मन बाग-बाग हो उठा – ””बेटा आज रिपोर्ट कार्ड मिला होगा दिखाओ तो।”
””लो माँ पर अब शुरू मत हो जाना कि बाकि बच्चों के नंबर कितने आए, मैं मैं हूँ। किसी से मेरी तुलना न किया करो। हर कोई पढ़ाई में एक्सपर्ट थोड़े ही होता है।”
सुधा अवाक् थी। पर मन कह रहा था- ””बेटा हर माँ भी तो विदेशी खाने बनाने में एक्सपर्ट नहीं होती।”
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