जून-2017

देशएक और जाल     Posted: June 1, 2015

एक और जाल
मोबाइल फोन की घण्टी बजी। हिन्दी के रीडर महोदय ने उसे कान से लगाया और कहा, ‘‘हलो!’’
उधर से उन्हीं के विभाग के साथी की आवाज़ आई,‘‘एक खुशखबरी है।’’
‘‘क्या?’’
‘‘यू.जी.सी. के अनुसार ‘नैट’ अब कम्पलसरी नहीं रहा।’’
‘‘वाकई यह तो अच्छी खबर है। नैट सचमुच एक जाल ही था। बिना नैट से मुक्त हुए कोई प्रवक्ता बनने के लिए एप्लाई तक नहीं कर सकता था।’’
‘‘अब लोग पी–एच. डी. की तरफ ज्यादा भागेंगे।’’
‘‘हाँ,इसमें क्या शक है।’’
‘‘तो फिर तुम्हारे लिए मार्केटिंग शुरू कर दूँ?’’
‘‘क्या पॉसिबिलिटी है?’’
‘‘कम से कम साठ–सत्तर हजार। तीस ‘सिनोप्सिस’ मंजूर होन पर, बाकी थीसिस लिख जाने के बाद।’’
‘‘अभी इन्तजार करो। रेट और ऊँचे जाएँगे।’
शोध–छात्रों के लिए एक और जाल बुना जा रहा था।
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गतिविधियाँ

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
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