जून-2017

देशऔकात     Posted: September 1, 2015

राजू आज खुश था । खुश भी क्यों न हो? आज उसने अपने मालिक के लड़के की जान बचाई है। वरना लड़का खारून एनीकेट में डूबकर मर जाता। लोगों की भीड़ जुटने लगी थी उसके मालिक के यहाँ। लेकिन राजू व्यस्त था घर के कामों में। वह कपड़े धोकर सुखा रहा था छत पर। इतने में मालिक की कार गेट पर आकर खड़ी हो गई। हार्न बजते ही राजू नीचे की ओर दौड़ा गेट खोलने के लिए। मालिक बुदबुदाया – “कहाँ मर गया ये राजू?“ फिर लम्बा हार्न बजने लगा। दौड़ा-दौड़ा राजू नीचे आया और गेट खोला। कार को अन्दर होते ही मालिक झट से उतरते हुए राजू को पास बुलाया। राजू प्रसन्न मुद्रा में मालिक के पास पहुँचा। तभी जोर से झन्नाटेदार थप्पड़ मारते हुए मालिक ने राजू को फटकारा – “इतनी देर लगती है गेट खोलने में? अर तू बच्चे को एनीकेट में जाने ही क्यों दिया? कुछ हो जाता बच्चे को तो?“ फिर मालिक अन्दर जाकर बच्चे को गले लगा लिया। बच्चे ने अपने पापा से पूछा – “पापा आपने राजू को क्यों मारा? वो नहीं होता तो आज मैं जिन्दा नहीं बच पाता।“ पापा ने समझाते हुए कहा – “इसलिए कि वह अपने को हीरो न समझने लगे। उसे याद रहे कि वह नौकर है। सही काम करते रहे इसके लिए समय-समय पर नौकर को उसकी औकात बताना जरूरी होता है बेटा।”
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गतिविधियाँ

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

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