अक्तुबर-2017

मेरी पसन्दलघुकथाएँ मानव –संस्कृति का दर्पण     Posted: March 1, 2015

हिन्दी साहित्य में कथा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है । ये कथाएँ ही तो होती है जो मानव –संस्कृति को अपने दर्पण में बड़े हौले से उतार लेती हैं । हर हिन्दुस्तानी बच्चा कहानियाँ सुनकर ही बड़ा होता है।। हमारी साँसें भी किसी कथा से ही जुड़ी होती हैं. क्योकि सृष्टि का आधार ही है- एक कथा । हमारे व्रत,उत्सव , तीज –त्योहार किसी न किसी पौराणिक कथा का आधार है। कभी- कभी तो हमें कथा- सुनकर ही अन्न ग्रहण करने को कहा जाता है। कथाओं के क्षेत्र में हमारी हिंदी लघुकथा भी आज एक अलग ही पहचान बनाने में समर्थ हुई है। इसका श्रेय हमारे आज के जुझारू लेखकों को ही जाता है ।
सुगठित, सशक्त,तीव्र तथा झकझोरने वाली रचनाएँ जीवन से सच्चा साक्षात्कार कराने का हौसला रखती है । हमारी चेतना को भी स्पर्श कर लेती है । समाज का कोई भी क्षेत्र इनसे अछूता नहीं है। कहीं सुकेश साहनी की लघुकथाएँ शिनाख्त ,चादर जैसी लघुकथाएँ साम्प्रदायिकता के कठोर कलेवर पर बड़ी गहरी खरोंचें है तो पारिवारिक रिश्तों की शिथिलता को बखूबी दर्शाती है – कमरा ,बेटी का हिस्सा ,बूढ़े पाखी, पिंजरा ,बूढ़ी सिंड्रैला तथा पुराना दरवाज़ा ।हमारी आज की खोखली व्यवस्था को गेट मीटिंग, भूत, पेट, विवशता, चोर, रोज़ दिवाली व पाकेटमारी में निराले ही ढंग से परोसा है। समाज में फैली कुछ धारणाएँ त्याज्य होती हैं; पर हमारे मन की दुर्बलता इनके पीछे भागती रहती है। इसका उद्घोष हमें कुंडली, डाका ,अपनों से निकलकर ,बैठी लक्ष्मी ,स्टेटस में सुनाई पड़ता है । मकडी में बाजारवाद का विषैला रूप मुखरित हुआ है तो भेड़िया लघुकथा में आपसी रिश्तों में छुपी पशुता की मूक गूँज है। माँ की ज़रूरत, माँ के आँसू जैसी कुछ लघुकथाएँ मानवीय रिश्तों की संजीवनी -सी लगती हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण लघुकथा को नज़रों का ही नहीं ,हृदय का भी आलिंगन मिलता है । ऐसी ही कई लघुकथाओं के बीच दो लघु कथाओ ने मेरे मन में उद्वेलित किया है इनमें एक है पुराना दरवाज़ा(माधव नागदा) तथा तथा दूसरी भेड़िया(प्रियंका गुप्ता )
‘पुराना दरवाज़ा’ में मुख्य पात्र का मन एक दरवाज़े में ही अटका है, जो पुराना है – दादाजी की धरोहर।उनके मन की मुराद है कि जब भी घर में नव- निर्माण होगा तो वो इस दरवाज़े को पुन: लगवा देंगे और जब उन्हें पता चलता है कि उनका बेटा बंगला बनवा रहा है तो उन्हें बहुत ख़ुशी होती है। वे एक दिन घर में चल रहे कार्य के दौरान उस दरवाज़े को लगवा भी देते है । बेटा उसे तुरंत हटवा देता है ;क्योकि उसकी दृष्टि में वह ‘भंगार’ से अधिक कुछ नहीं है । दरवाज़े को फिर से एक कोने में खड़ा कर दिया जाता है और असहाय पिता को लगता है कि दरवाज़े का नहीं बल्कि उन्हीं का वह स्थान है ।
लघुकथा का आरंभ एक पिता की आस से उपजकर ,विश्वास को छूता हुआ मर्मान्तक लाचारी तक पहुँच जाता है ।आज की संतान अपने पिता का एक छोटा- सा स्वप्न भी सजीव करने में कितनी नाकाम होती है।वर्तमान समय का यही कड़वा सच उभारती है लघुकथा – पुराना दरवाज़ा । लघुकथाकार ने इसे बड़ी ही कुशलता तथा परिपक्वता से उभारा है। लघुकथा का शीर्षक सरल व सार्थक है ,पर देह बड़ी ही तराशी हुई । सरल व सटीक भाषा का प्रयोग पाठक का मन मोह लेता है। दरवाज़े के लिए प्रयुक्त शब्द जैसे- हिया जुड़ा, भंगार तथा अडोल सहजता से उपयोग में लाए गए है, जो बड़े ही प्रभावी बन पड़े है। लघुकथा में एक ही जगह संवाद है – जहाँ बेटे का तीक्ष्ण कथ्य मन को भेद देता है , “हटाओ इस भंगार को” ।और जब दरवाज़ा हटवा कर एकांत में रख दिया जाता है तब बाबूजी को लगता है कि पुराना दरवाज़ा नहीं बल्कि वे ही हैं जो दरवाज़े के स्थान पर स्वयं ही खड़े है – बस !यहीं पर आकर एक पिता की दम तोड़ती आस की पीड़ा पाठक की संवेदना को हिलाकर रख देती है ,यही है सभ्य समाज का कटु यथार्थ । जब हम किसी यथार्थ को भावात्मक नमी के साथ रचना में पातें हैं ,तो पाठक की संवेदना का स्तर द्रुत गति पकड़ लेता है। अंत में हमारी चेतना तक पहुँच कर ही दम लेता है – यही एक सफल रचना की जीत है ;जो इस लघुकथा में भी अभिव्यक्त हुआ है।इन्हीं विशेषताओं के कारण यह लघु कथा मेरी पसंद बनी ।
मेरी पसंद के अंतर्गत दूसरी लघु कथा है- भेड़िया । प्रतीकात्मक और भावात्मकता की तरलता में भीगी एक बेहद मार्मिक लघुकथा। इसमें एक माँ अपने नन्हें से मेमने को घर में ही रहनें की नसीहत देती है। वह उसे ,खासतौर पर भेड़िए से सावधान रहने को कहती है। पर माँ की आज्ञा मानने पर भी मेमना बच नहीं पाता ;क्योंकि उसकी माँ उसे घर के भेड़िए के बारे में बताना भूल गई थी ।
कथा का आरंभ बड़ी ही सहजता से होता है। मेमना प्रतीक है समाज में भोले तथा कोमल बच्चे का और भेड़िया- मानवीय रिश्तों के आवरण में छुपे उन “अपने” लोगों का जो मानवीय संवेदना को रौंदते हुए क्रूरता की सारी हदों को पार कर लेते हैं । इस लघुकथा में माँ को पता है कि बाहर की दुनिया अँधेरे तथा कालेपन से आवृत्त है, जो दुष्कर्म व जघन्य बुराई का प्रतीक है , मगर, घर में छुपे अँधेरे को वह या तो देख नहीं पाई या फिर ‘बता नहीं पाई’ । घरों में अपने ही लोगों के हाथों कुकृत्य के प्रति असावधानी की ओर संकेत ही नहीं करती ये लघुकथा बल्कि संवेदना के स्तर पर कोड़े का- सा प्रहार करती है । सक्षम लेखन की अनूठी मिसाल है ‘भेड़िया’। शिल्प और शैली में सहज होकर भी जिज्ञासा की तरफ पाठक को खींच कर ले जाती है । इसमें यदि क्रूरता की शिकार बनी निर्जीव देह है, तो कड़वी और कठोर सच्चाई भी बिना संवाद के अनावृत्त करके रख दी है कि घर के भेड़िए अधिक खतरनाक हैं । अंतस् झकझोरने वाली एक सफल लघुकथा ।
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1-पुराना दरवाज़ा -माधव नागदा ( इसी अंक में देश के अन्तर्गत पढ़ी जा सकती है)

2- भेड़िए-प्रियंका गुप्ता

माँ अक्सर अपने नन्हें-से मेमने को समझाती…घर के बाहर दूर तक अकेले न जाना…। घना, अँधेरा…बिल्कुल काला जंगल…जिसमें खूँख़्वार जंगली जानवर बसते हैं…। बाकी तो तब भी ठीक हैं…शायद बख़्श भी दें, पर भेड़िया वो जीव है, जिससे उसे सबसे ज़्यादा होशियार रहना है…। अपनी आँख-नाक-कान सब खुले रखने हैं। माँ जब काम पर जाए तो दरवाज़ा बन्द करके घर के अन्दर ही रहना है…। मेहमान का भी भरोसा नहीं करना है बिल्कुल…। दूर से भी कहीं भेड़िया छुपे होने का शक़ हो, तो तुरन्त भागकर घर में घुसकर दरवाज़े-खिड़कियाँ मजबूती से बन्द कर लेने हैं…।
माँ ने दुनिया देखी थी, जंगल देखा था…वो सब जानती थी…। मेमना माँ की सब बात मानता था…। ये बात भी मानी…। इसलिए अब वह अकेले कहीं नहीं जाता था…| किसी अजनबी तो दूर, जानने वाले से भी ज़्यादा बात नहीं करता था…। माँ के जाते ही मजबूती से घर के सब खिड़की-दरवाज़े बन्द कर लेता था।
एक दिन माँ जब काम से लौटी, मेमना कहीं नहीं मिला…। मिले, तो बस्स खून के कुछ कतरे…। माँ नहीं समझ पा रही थी कि उसके इतने आज्ञाकारी बच्चे का शिकार आखिर हुआ कैसे…? समझ तो शिकार होने तक मेमना भी नहीं पाया था…। माँ उसे घर के भेड़िए के बारे में बताना जो भूल गई थी…।
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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