सितम्बर-2017

मेरी पसन्दकथ्य को उत्कृष्टता प्रदान करती लघुकथाएँ     Posted: July 1, 2017

मैं विगत दो दशकों से लघुकथाएँ गंभीरता से पढ़ता आ रहा हूँ । यह विधा मुझे अपनी क्षिप्रता एवं स्वाभाविक लघु आकार के कारण आकर्षित करती रही हैं। इसी कारण आज तक मैंने असंख्य लघुकथाएँ पूरी गंभीरता से पढ़ डालीं और कुछेक लघुकथाएँ तो ऐसी हैं जो भुलाये नहीं भूलतीं, अपितु वे मुझे बाध्य करती हैं कि समय-समय पर प्रसंगवश मैं उन्हें अन्य लघुकथा-प्रेमियों से साझा करूँ, चर्चा करूँ । कारण -मेरी मान्यता है कि चर्चा करने से भी हमारी समझ में विस्तार होता है।

मैंने जो लघुकथाएँ पढ़ीं और उनमें से जो मेरे हृदय से इतनी निकट हो गईं कि उन्होंने मेरे हृदय में स्थायी निवास ही बना लिया ऐसी लघुकथाओं की संख्या पचास या इससे कुछ अधिक अवश्य होगी, जिनके लेखकों में रमेश बतरा, डॉ. शकुन्तला किरण, चित्र मुद्गल, कमल चोपड़ा, ज्ञानदेव मुकेश, बलराम अग्रवाल, सुकेश साहनी, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, मधुदीप इत्यादि ;किन्तु डॉ.सतीशराज पुष्करणा और श्यामसुन्दर अग्रवल की प्रायः लघुकथाओं ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया है। डॉ. पुष्करणा लघुकथाओं में भी मुझे ‘मन के साँप’ और श्याम सुन्दर अग्रवाल की लघुकथाओं में ‘घर’ मुझे पसंद के चरम तक पसंद है।

डॉ. पुष्करणा की लघुकथा ‘मन के साँप’ के अतिरिक्त जीवन संघर्ष, सहानुभूति, बोफोर्स काण्ड, भी मुझे बहुत पसंद हैं, किन्तु ‘मन के साँप’ की बात ही निराली है। अपने समकालीनों से नितान्त भिन्न एक असामान्य मनोविज्ञान पर आधारित एक श्रेष्ठ लघुकथा है, जिसका शिल्प इसके कथानक के सर्वथा अनुकूल ही नहीं, अपितु पूर्णतः सटीक है। सबसे बड़ी विशेषता तो यह है कि इस लघुकथा के नायक का मनोविश्लेषण इतना स्वाभाविक एवं विश्वसनीय है कि लघुकथा पढ़ते समय हर दृश्य सजीव होकर चलचित्र की भाँति आँखों के समक्ष अपनी पूरी सजीवता से उपस्थित हो जाता है। नायक की पत्नी का प्रत्यक्षीकरण भी बहुत ही स्वाभाविक ढंग से होता है और लघुकथा को स्वाभाविक एवं विश्वसनीय बनाने में पूरा-पूरा सहयोग देता है। इस लघुकथा का प्रस्तुतीकरण बहुत ही स्वाभाविकता से नायक के भीतर चल रहे संघर्षात्मक द्वन्द्व के साथ विकास पाता जाता है, ऐसी रचना-कला अन्य लघुकथाकारों में बहुत ही कम देखने को मिलती है।

जिन लोगों ने लघुकथा के शीर्षक को एक अभिन्न तत्त्व के रूप में स्वीकार किया तथा अपनी लघुकथाओं में उसे बहुत ही व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत भी किया है उनमें डॉ. सतीशराज पुष्करणा पांक्तेय हैं। उनकी यह कला ‘मन के साँप’ में भी देखी जा सकती है। ‘मन के साँप’ शब्दों की चर्चा पूरी लघुकथा में कहीं नहीं होती; किन्तु प्रतीक रूप में यह शीर्षक लघुकथा की आत्मा से पूरी गहराई तक जाकर जुड़ा है, जो इस लघुकथा को श्रेष्ठता की ऊँचाई तक पहुँचाने में अपनी सार्थक भूमिका का निर्वाह बहुत ही कुशलता से करता है। अन्त में मैं यह कहना चाहूँगा कि इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी संवेदनशीलता है, जो भाषा-शैली के माध्यम से प्रायः प्रत्येक संवाद में भी स्पष्ट होती है और अपना वांछित प्रभाव छोड़ती है।

अपने इन्हीं गुणों के कारण ‘मन के साँप’ मेरी पहली पसन्द बन गयी है।

दूसरी लघुकथा के रूप में श्याम सुन्दर अग्रवाल की ‘घर’ है। हालाँकि इनकी अन्य लघुकथाओं में ‘गुब्बारा’ और ‘माँ का कमरा’ भी चर्चित रही हैं; किन्तु घर मुझे उनसे भी अधिक संवेदना से जुड़ी तथा व्यावहारिक लघुकथा प्रतीत हुई। इसका ‘कथानक’ बहुत सुन्दर है, जिस पर इस विधा में बहुत कम काम हुआ है। इसका निरूपण कथानक की आवश्यकता के सर्वथा अनुकूल है। इसका कथ्य तो बहुत ही महत्त्वपूर्ण है ,जो सहज एवं सरस रूप में सकारात्मक संदेश की ओर ले जाता है।

आज प्रायः घरों में पति-पत्नी में मतभिन्नता के कारण तनाव हो जाता है, फिर बढ़ते-बढ़ते वो सम्बन्ध-विच्छेद की स्थितियों तक पहुँच जाता है। पति-पत्नी का सम्बन्ध ऐसा है कि सफलतापूर्वक घर दोनों के सुन्दर तालमेल से ही चलता है। अतः पति-पत्नी को चाहिए की मतभिन्नताओं को मनभिन्नताएँ न बनाएँ; अपितु ऐसे विषयों पर एक-दूसरे के कामों में हस्तक्षेप न करके अपने-अपने कामों पर ध्यान केन्द्रित करें । इस संदर्भ में इस लघुकथा का समापन वाक्य पूरी लघुकथा के कथ्य को मजबूत आधार देता है, जिस पर पूरी लघुकथा मजबूती के साथ अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करते हुए सुन्दर ढंग से खड़ी है। वाक्य देखें –

‘इस पर तुम्हारा आपस में झगड़ा नहीं होता ?’

‘झगड़ा किस बात का ! यह मेरे काम में दखल नहीं देती, मैं इसके काम में । जिन्दगी अच्छी गुज़र रही है।’

इस लघुकथा की भाषा-शैली सहज एवं स्वाभाविक है जो कहीं से भी किसी पात्र पर आरोपित नहीं लगती और लघुकथा संवादों के सहारे अपने चरम का स्पर्श बहुत ही सुन्दर ढंग से करते हुए किसी की भी संवेदना को सहज ही जगा देती है।

श्याम सुन्दर अग्रवाल भी डॉ. पुष्करणा की तरह शीर्षक के मामले में बहुत सतर्क प्रतीत होते हैं। इस लघुकथा का ‘घर’ के अतिरिक्त अन्य सटीक शीर्षक हो ही नहीं सकता था। घर यानी पति-पत्नी के मध्य आपसी सुन्दर समझदारी । अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण यह लघुकथा मेरी सर्वप्रिय लघुकथा बन गयी है।

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1-मन के साँप- डॉ.सतीशराज पुष्करणा

आज रात खाना खाने के बाद उसका मन कैसा-कैसा तो होने लगा । वह मन-ही-मन बड़बड़ाया, ‘ये पत्नी भी अजीब है, मायके गई तो गई-आज सप्ताह होने को आया, उसे इतना भी ध्यान नहीं कि पति की रातें कैसे कटती होंगी।’ वह आकर अपने बिछावन पर लेट गया। नींद तो जैसे उसकी आँखों से उड़ चुकी थी । आज टी-वी- देखने को भी उसका मन नहीं हो रहा था। उसे ध्यान आया कि आज ऑफिस में मिसेज़ सिन्हा कितनी खूबसूरत लग रही थीं, क्या हँस-हँसकर बातें कर रही थीं। इस स्मरण ने उसे और बेचैन-सा कर दिया । उसे अपनी पत्नी पर क्रोध आने लगा,’यह भी कोई तरीका है शादी के बाद औरत को अपने घर का ध्यान होना चाहिए।’

वह जैसे-जैसे सोने का प्रयास करता, नींद उसकी आँखों से वैसे-वैसे दूर भागती जाती इतने में उसकी दृष्टि सामने अलगनी पर जा टिकी, जहाँ उसकी पत्नी की साड़ी लापरवाही से लटकी हुई थी । उसे लगा, जैसे उसकी पत्नी खड़ी मुस्करा रही है। वह उठा और अलगनी से उस साड़ी को उठा लाया और उसे सीने से लगा लिया। फिर एकाएक उसे चूम लिया। उसे लगा, जैसे वह साड़ी नहीं, उसकी पत्नी है। उसने साड़ी को बहुत प्रेम से सरियाया और तह लगाकर अपने तकिए के बगल में रख लिया ।

‘मालिक ! और कोई काम हो, तो बता दीजिए फिर मैं सोने जाऊँगी।’ अपनी युवा नौकरानी के स्वर से वह चौंक उठा। उसने चोर-दृष्टि से उसके यौवन को पहली बार भरपूर दृष्टि से देखा, तो वह दंग रह गया। आज वह उसे बहुत सुन्दर लग रही थी। उसे देखकर फिर न जाने उसका मन कैसा-कैसा तो होने लगा। अभी वह कामुक हो ही रहा था कि नौकरानी ने पुनः पूछा,’मालिक, बता दीजिए न !’

‘तुम ऐसा करो, तुम कहाँ उधर दूसरे कमरे में सोने जाओगी । यहीं इसी कमरे में सो जाओ । न जाने कोई काम याद आ ही जाए । ज़रूरत पड़ने पर तुम्हें जगा दूँगा । हाँ ! पीने के लिए पानी का एक जग और एक गिलास ज़रूर रख लेना । फिलहाल तो कोई काम याद नहीं आ रहा है।’

‘जी अच्छा !’

आज नींद उसकी आँखों से दूर, कभी पत्नी का ख़्याल, कभी मिसेज़ सिन्हा का ध्यान, कभी नौकरानी के यौवन का नशा। उसने अपने को बहलाने के विचार से कोई पत्रिका सामने अलमारी से निकाली । उसे पढ़ने में मन तो नहीं लगा। बस यों ही उलटने-पलटने लगा । पत्रिका के मध्य में उसे किसी सिने-तारिका का ‘ब्लो-अप’ नज़र आया । उसकी दृष्टि रुक गई। उसे लगा, वह सिने-तारिका हरक़त करने लगी है। वह उसे देखता रहा । उसे लगा, वह मुस्करा रही है। वह भी मुस्कराने लगा। उसने उस ‘ब्लो अप’ को स्पर्श किया, तो यथार्थ के धरातल पर आ गया। उसने पत्रिका बन्द करके एक तरफ रख दी ।

वह पानी के विचार से उठा । उसने देखा, उसकी नौकरानी उसकी नीयत से बेखबर गहरी नींद में सोई हुई है। उसकी आती-जाती साँसों से हिलता उसका बदन उसे बहुत भला लगने लगा । उसका मासूम चेहरा, उसे लगा कि वह उसे चूम ले, किन्तु किसी अज्ञात भय से वह पीछे हट गया। वह सोचने लगा कि वह समाज का प्रतिष्ठित व्यक्ति है। कार्यालय में भी उसको आदर की दृष्टि से देखा जाता है। बाहरी आडम्बरों ने उसके मन को दबाया, किन्तु फिर मन था कि उसकी ओर बढ़ा, किन्तु एकाएक उसकी पत्नी की आकृति उभरती दिखाई दी । अब उसकी पत्नी के चेहरे पर मुस्कराहट के स्थान पर घृणा के भाव थे। वह सिहर गया। पुनः अपने पलंग पर लौट आया। नौकरानी को आवाज़ दी और पानी का गिलास देने को कहा।

उसने पानी पीकर कहा, ‘देखो ! अब मुझे कोई काम नहीं है। तुम वहीं बगल के कमरे में जाकर सो जाओ। देखो! अन्दर से कमरा ज़रूर बन्द कर लेना।’  यह कहकर वह बाथरूम की ओर बढ़ गया। बाथरूम में लटका पत्नी का गाउन उसे ऐसा लगा, पत्नी मुस्करा रही है और इस अर्द्धरात्रि में वह स्नान करने लगा ।

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2-घर-श्याम सुन्दर अग्रवाल

अनीता ने कमरे की दीवार पर लक्ष्मी-गणेश का एक बड़ा-सा कैलेण्डर क्या लगाया, घर में क्लेश हो गया। उसका पति गिरीश गरज रहा था, ‘इइस घर में ऐसा कैलेंडर नहीं चलेगा । तुम्हें पता है कि मैं नास्तिक हूँ, फिर भी तुम- – -।‘

‘एक धार्मिक कैलेंडर लगाने भर से तुम नास्तिक से आस्तिक हो जाओगे क्या ! क्यों इतना भड़क रहे हो?’ अनीता भी आज लड़ने के मूड में लग रही थी ।

इससे पहले कि अनीता आगे से जवाब देती और लड़ाई भड़कती, ‘डोरबेल’ बज उठी। गिरीश दरवाज़े की ओर बढ़ा ।

दरवाज़ा खोला, तो सामने सुधीर खड़ा था। सुधीर उसकी विचारधारा का था और दल के सभी लोगों के विचार आपस में मिलते थे। सुधीर से बातचीत में उसने जान लिया था कि वह भी नास्तिक है और किसी धर्म में उसका कोई विश्वास नहीं है।

अन्दर आते ही सुधीर बोला, ‘भाभीजी, इसे तो कई बार कह चुका हूँ कि आपके साथ हमारे नए घर में चरण डालें । आने-जाने से ही मेलजोल बढ़ेगा, लेकिन यह मेरी सुनता ही नहीं ; इसलिए आज मैं खुद ही लेने आ गया।’

गिरीश मना नहीं कर सका। वह चाहता भी था कि अनीता सुधीर जैसे कट्टर नास्तिक और तर्कशील का घर देखे। शायद उस पर कुछ असर हो जाए।

कुछ ही देर बाद वे सुधीर के घर ड्राइंग-रूम में बैठे थे। चाय-पान के बाद गिरीश ही सुधीर की पत्नी से मुखातिब हुआ, ‘भाभीजी, हम कुछ ज़रूरी बातें करते हैं, तब तक आप अनीता को अपना घर दिखा दें ।’

कुछ देर बाद ही वे लौट आईं ।

‘बहुत जल्द देख लिया सारा घर ?’ गिरीश बोला ।

‘हाँ, मैंने तो देख लिया, आओ आप भी देख लो ।’ अनीता बोली ।

गिरीश लॉबी में पहुँचा तो आँखें फटी रह गईं । सामने एक कोने में बड़ा-सा मन्दिर बना हुआ था। सुधीर की ओर हैरानी से देखते हुए बोला, ‘यह क्या ? तुम जैसे नास्तिक के घर में मन्दिर ?’

‘नास्तिक मैं हूँ गिरीश, तुम्हारी भाभी नहीं—– और यह घर मेरे अकेले का नहीं है। हम दोनों का है ।’

इस पर तुम्हारा आपस में झगड़ा नहीं होता ?’

‘झगड़ा किस बात का ! यह मेरे काम में दखल नहीं देती, मैं इसके काम में ।ज़िन्दगी अच्छी गुजर रही ।’

-0-डॉ. ध्रुव कुमार,पत्रकार

परमेश्वरी दयाल लेन, महेन्द्रू,पटना-800 006 (बिहार)

मो: 7549991048, 9304455515

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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