अगस्त-2017

मेरी पसन्दकोहरे को चीरते हुए     Posted: April 1, 2015

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु की लघुकथा नवजन्मा मेरी सर्वाधिक पसंदीदा लघुकथाओं में से है। हमारे कथित आधुनिक, पश्चिमी देशों से बुरी तरह प्रभावित, समाज के दोमुँहे चेहरे का सबसे बड़ा उदाहरण है, घरों में लड़की पैदा होने के बाद पैदा हुई परिस्थितियाँ! अधिकतर घरों में ””लड़की पैदा हुई है’ सुनते ही सारा प्रगतिवाद, सारा आधुनिकतावाद जैसे एकाएक ब्रेक लगे वाहन की तरह रुक जाता है। पहियों के रुकने की तीखी चरमराहट की आवाज सकारात्मकता के शांत वातावरण को बुरी तरह चीर डालती- सी महसूस होती है। चेहरों का खून निचुड़ जाता है, वातावरण में मायूसी छा जाती है, फोन बंद कर दिए जाते हैं। दादी-नानियाँ उस चाँदी के थाल को घूरकर देखने लगती है, बेटा पैदा होने पर जिसे बजाने की उन्होंने आकांक्षा पाल रखी थी। लड़की पैदा होने के समाचार को पिता को ऐसे सुनाया जाता है जैसे कोई आघात लगा हो। कैसी विडम्बना है हमारे समाज की, जहाँ एक इंसान (बेटी) के जन्म की खबर को मौत के समाचार की तरह सुनाया जाता है। सुनकर पिता तनावग्रस्त हो जाता है, दु:खी होता है। लेकिन सर्वाधिक दु:ख और अपराध बोध से ग्रस्त होती है नवजात की माँ, कमरे के बाहर चल रहे व्यंग्य बाण, कटु वचन सुनकर जिसे ऐसा लगता है कि बेटी जनकर उसने पता नहीं दुनिया का कौन सा भारी नुकसान कर दिया है। ऐसी घनी निराशा के कोहरे में घिरा बेटी का पिता करे तो क्या करे। ऐसी ही परिस्थितियों, ऐसी ही ऊहापोह, ऐसी ही उलझनों में पाठक को घुमाते हुए लेखक ने इस लघुकथा में अत्यंत कुशलता से आज के इस नंगे यथार्थ को चित्रित किया है।
पहले ही संवाद में दादी कथानायक से कहती है, ””जिल्ले! तेरा तो इभी से सिर बँध ग्या रे। छोरी हुई है!’ भयावह अर्थ से भरे इस दमदार वाक्य से ही पाठक को वातावरण की गंभीरता का एहसास हो जाता है और उसे नायक के भविष्य की चिंता सताने लगती है। प्रभावित पाठक स्वयं को ऐसी ही किसी घटना से जोड़कर देखने लगता है। इस एक वाक्य से ऐसा प्रतीत होता है कि कथा नायक के सिर पर दु:खों से भरा टनों वजनी पहाड़ रख दिया गया हो। ””तेरा तो इभी से सिर बँध ग्या रे।’ सशक्त संवाद और पंक्ति के अर्थबोध और अनुगूंज को पाठक बम की भयावह आवाज सा महसूस करता है। लघुकथा का एक शानदार पाश्र्व पक्ष है माँ की चुप्पी! ””माँ की चुप्पी और अधिक बोल रही थी’ लेखकीय कौशल से भरपूर यह वाक्य पाठक को आक्रोशित करते हुए सीधे-सीधे प्रभावित करता है। ””मेरा भी नेग मारा गया’ बहन के और निराशा उंडेलते ही जिलेसिंह का चेहरा तन जाता है और माथे पर दूसरी लकीर उभर आती है। माथे पर लकीर का उभर आना, दूसरी लकीर का उभर आना परिस्थितिजन्य आक्रोश का शानदार संकेतितार्थ है जो पाठक को बुरी तरह उद्वेलित कर देता है। यही तो लघुकथा की वास्तविक शक्ति है, जिसको अनुभवी लेखक ने बखूबी वर्णित किया है।
पति को देख मनदीप (पत्नी) ने डबडबाई आँखें पोंछते हुए अपना मुँह अपराधबोध से दूसरी ओर घुमा लिया। नारी शक्ति का इससे बड़ा अपमान, इससे बड़ी रुसवाई क्या होगी कि बेटी जनना उसका महापाप हो गया है। ऐसी विडम्बना पर स्त्री विमर्श के दौर को लेखक का जोरदार चाँटा है रचना का यह भाग। कोई संवाद नहीं, कोई बातचीत नहीं, बस एक-दूजे को अनदेखा करना। जहाँ शब्दों की सीमा समाप्त हो जाती है, वहाँ आँसू भाव पूरे करते हैं, साहित्य जगत् की इस माँग के अनुरूप लेखक ने पूर्ण न्याय किया है।
लेकिन इसी सारे सन्नाटे, निराशा को चीरकर कथा नायक का बाहर जाना और संतु ढोलिये के साथ वापस लौट आना, ढोल बजवाना, लघुकथा को एकाएक नया मोड़ दे देता है। जैसे बहुत देर तक उबडख़ाबड़, कँटीले, सूखे रास्ते पर चलते-चलते एकाएक शीतलता बख्शता, रीझाता, सुकून देता कोई झरना दिख गया हो। रचना के मध्य में ढोल की आवाज सुन मोहल्ले वालों का चौंक पडऩा, जिलेसिंह का तुर्रेदार पगड़ी निकालना दृश्य संयोजन के शानदार उदाहरण हैं, जो रचना को मजबूती देते हैं। रचना के अंत में नायक का नवजात के कमरे में जाना, जेब से सौ रुपए का नोट निकालकर नवजात के ऊपर वार-फेर करना, मनदीप का छलकते आँसुओं को इस बार नहीं पोंछना और बाहर संतु ढोलिये का सौ का नोट मिलने से उत्साहित होकर और जोर से ढोल बजाना पाठक को आनंद में भिगो देता है और हर्ष से उसके आँसू छलक आते हैं। लघुकथा की रचना प्रक्रिया पर लेखक ने बहुत श्रम किया है और पात्रानुकूल भाषा का प्रयोग कर सीधे-सीधे सम्प्रेषण किया है।
इस लघुकथा के तीन महत्वपूर्ण मोड़ हैं। जिलेसिंह को बेटी होने की सूचना और उसके बाद वातावरण का भारीपन, दूसरा उसका व्यंग्य बाण सुनते हुए पत्नी के कमरे में जाना, पत्नी का अपराध बोध दर्शाना एवं तीसरा आशंकाओं, कुशंकाओं के कोहरे को चीरते हुए जिलेसिंह का संतु ढोलिये के साथ वापस लौटना।
रचना के अंत में संतु ढोलिये की ढोल की आवाज का उच्चारण वर्णित कर लेखक ने रचना को सजीव कर दिया- ””तिड़-तिड़-तिड़ तिड़क धुम्म, तिड़क धुम्म! तिड़क धुम्म्म! तिड़क धुम्म्म!’
इस लघुकथा में संक्षिप्तता है, पैनापन है, कथातत्व है, यथार्थपरकता है। न उपदेशात्मक है, न बुनावट में कोई पेचीदापन। समाज के दोहरे मापदंडों, छोटे मनों, विडंबनाओं, कुरीतियों को लेकर गुथी हुई इस लघुकथा की विकास यात्रा पाठक को झुलते-झुलाते हुए अंत में सकारात्मकता के सुखद मोड़ पर ला खड़ा करती है –
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सुभाष नीरव की बहुचर्चित लघुकथा जानवर भी मेरी दृष्टि में अत्यंत ज्वलनशील मुद्दे पर एक अत्यंत प्रभावी रचना है। एकांत पाते ही निश्छल प्रेम के बीच कैसे जवान लड़के के भीतर वासना जन्म ले लेती है, अंधेरा घिरते ही कैसे वह धधकती है, कैसे ज्वालामुखी बन फटने को उद्यत होती है और केवल प्यार के आगोश में आकंठ डूबी लड़की इस अनपेक्षितता को कैसे झेलती है, इन सारी परिस्थितियों को रचनाकार ने अत्यंत तन्मयता से, अत्यंत प्रभावी ढंग से एक के बाद एक सामने रखा है। इस रचना में परिवर्तन की गतियाँ हैं, हिलोरें मारते समुद्र के सामने पुरुष के अंतर में हिलोरे मारती वासना का कसैलापन है, दृश्यों का सजीव चित्रण है और यही सब पाठक को अंत तक बांध कर रखता है। खुलेपन से भरी इस लघुकथा में लेखक ने संपूर्ण गरिमा के साथ अपनी बात रखी है और पाठक को चौंकाने वाला अंत देकर चमत्कृत कर दिया है।
आज के क्रूर एवं बेशर्म होते, संस्कारों का अंतिम संस्कार करते समय में जबकि नग्रता सड़क पर, बाजारों में, पूरी तरह छाई है, खुलापन, खुले तन, नाइट क्लब, सिनेमाघरों, वेश्यालयों से निकलकर मध्यम वर्गीय एवं निम्र वर्गीय घरों तक जा पहुँचे हैं, नग्र चित्र, मोबाइल स्क्रीन, पुस्तकों के कवर से लेकर घरों की बैठकों तक की शोभा ””बढ़ा’ (?) रहे हैं तब ऐसी स्थिति में प्यार, निश्च्छल, खालिस निच्छल प्यार जो सिर्फ मन तक सीमित हो, कहाँ तक दम मार सकता है? वैसे भी (चाहे मजाक में क्यों न हो) कहा गया है कि ””प्यार कभी कहाँ पूरा होता है, प्यार का तो पहला अक्षर ही अधूरा होता है।’ प्यार में आकंठ डूबी, प्रेमी को सर्वस्व मानकर भावी जीवन के सुनहरे सपने देखने वाली लड़कियाँ इस तथ्य को अक्सर मस्तिष्क के हाशिए पर डाल देती हैं कि प्यार करने वाले हर दूसरे पुरुष के मन में वासना का भयावह जानवर घुटनों तक बैठा हुआ है, जो बाहर आने का कोई अवसर नहीं छोड़ता। यह लघुकथा ऐसी ही भोली भाली मासूम लड़कियों के लिए एक चेतावनी है, एक उपदेश है, एक फटकार है जो निर्जन स्थान पर ले जाकर प्यार का ढोंग रचने वाले लड़कों से उन्हें सावधान करती है। रचना के अंत में नायिका (लड़की) को हावी दिखाकर लेखक ने नारी शक्ति का उचित स्तवन किया है।
रचना के प्रारंभ में समुद्र की लहरों की अठखेलियाँ, लड़का-लड़की का खिलखिलाकर हंसना, अवसर पाकर लड़के का लड़की को बाहों में भरना, लड़के का सूर्यास्त और अंधेरे की प्रतीक्षा में बार-बार बेचैन होना, लड़की का घबराकर निर्जनता और ””जानवर’ को लेकर भोले भाले सवाल करना और अंत में प्रतिरोध करते हुए उसका सबल होकर उभरना आदि दृश्यों, घटनाओं, पात्रानुकूल संवादों का इतना विशद किंतु सटीक, सजीव वर्णन है कि पाठक को लगता है जैसे वह किसी चलचित्र में डूब गया हो। गहन अर्थ लिए रचना का अंतिम वाक्य ””बीच’ पीछे छूट गया, लड़का भी। देकर लेखक ने सांकेतिकता का सर्वोत्तम उपयोग किया है। संवाद से ज्यादा दृश्यों, स्थितियों का वर्णन कर लेखक ने लघुकथा की माँग के अनुरूप पूर्ण न्याय किया है। मानवीय चरित्र और घटनाओं का सूक्ष्म अवलोकन ””जानवर’ लघुकथा की सबसे बड़ी विशेषता है। सामाजिक चेतना के प्रहरी, अनुभवी लेखक सुभाष नीरव जानते हैं कि आज का पाठक वर्ग केवल बौद्धिक व साहित्यिक ही नहीं, वरन समाज के विभिन्न वर्गों तक फैला हुआ है। इसलिए आज की ज्वलंत समस्या, बलात्कार पर केन्द्रित इस लघुकथा को पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रमुखता से स्थान मिला है। लघुकथा के भविष्य के लिए यह अत्यंत शुभ संकेत है।
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1-नवजन्मा
जिलेसिंह शहर से वापस आया तो आँगन में पैर रखते ही उसे अजीब-सा सन्नाटा पसरा हुआ लगा।
दादी ने ऐनक नाक पर ठीक-से रखते हुए उदासी भरी आवाज में कहा, ””जिल्ले! तेरा तो इभी से सिर बँध ग्या रे। छोरी हुई है!’
जिलेसिंह के माथे पर एक लकीर खिंच गई।
””भाई, लड़का होता तो ज्यादा नेग मिलता। मेरा भी नेग मारा गया।’ बहन फूलमती ने मुंह बनाया, ””पहला जापा था। सोचा था, खूब मिलेगा।’
जिलेसिंह का चेहरा तन गया। माथे पर दूसरी लकीर भी उभर आई।
माँ कुछ नहीं बोली। उसकी चुप्पी और अधिक बोल रही थी। जैसे कह रही हो- जूतियाँ घिस जाएँगी ढंग का लड़का ढूँढने में। पता नहीं किस निकम्मे के पैरों में पगड़ी रखनी पड़ जाए।
तमतमाया जिलेसिंह मनदीप के कमरे में घुमा। बाहर की आवाजें वहाँ पहले ही पहुँच चुकी थीं। नवजात कन्या की आँखें मुँदी हुई थीं। पति को सामने देखकर मनदीप ने डबडबाई आँखें पोंछते हुए अपना मुंह अपराध भाव से दूसरी ओर घुमा लिया।
जिलेसिंह तीर की तरह लौटा और लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ चौपालवाली गली की ओर मुड़ गया।
””सुबह का गया अभी शहर से आया था। तुम दोनों को क्या जरूरत थी इस तरह बोलने की?’ माँ भुनभुनाई।
घर में और भी गहरी चुप्पी छा गई।
कुछ ही देर में जिलेसिंह लौट आया। उसके पीछे-पीछे संतु ढोलिया गले में ढोल लटकाए आँगन के बीचों-बीच आ खड़ा हुआ।
””बजाओ!’ जिलेसिंह की भारी-भरकम आवाज गूँजी।
तिड़क-तिड़-तिड़-तिड़ धुम्म, तिड़क धुम्म! ढोल बजा।
मुहल्लेवाले एक साथ चौंक पड़े। जिलेसिंह ने आलमारी से अपनी तुर्रेदार पगड़ी निकाली, जिसे वह शादी-ब्याह या बैसाखी जैसे मौके पर ही बाँधता था। ढोल की गिड़गिड़ी पर उसने पूरे जोश से नाचते हुए आँगन के तीन-चार चक्कर काटे। जेब से सौ का नोट निकाला और मनदीप के कमरे में जाकर नवजात के ऊपर वार-फेर की और उसकी अधमुँदी आँखों को हल्के-से छुआ। पति के चेहरे पर नजर पड़ते ही मनदीप की आँखों के सामने जैसे उजाले का सैलाब उमड़ पड़ा हो। उसने छलकते आँसुओं को इस बार नहीं पोंछा।
बाहर आकर जिलेसिंह ने वह नोट संतु ढोलिया को थमा दिया।
संतु और जोर से ढोल बजाने लगा- तिड़-तिड़-तिड़ तिड़क धुम्म, तिड़क धुम्म्म! तिड़क धुम्म्म! तिड़क धुम्म्म!
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2-जानवर
बीच पर भीड़ निरन्तर बढ़ती जा रही थी। सूरज समुद्र में बस डुबकी लगाने ही वाला था। वे दोनों हाथ में हाथ थामे समुद्र किनारे रेत पर टहलने लगे। पानी की लहरें तेजी से आतीं और लड़की के पैरों को चूम लौट जातीं। लड़की को अच्छा लगता। वह लड़के का हाथ खींच पानी की ओर दौड़ती, दाएँ हाथ से लड़के पर पानी फेंकती और खिलखिलाकर हँसती। लड़का भी प्रत्युत्तर में ऐसा ही करता। उसे लड़की का इस तरह उन्मुक्त होकर हँसना, खिलखिलाना अच्छा लग रहा था। अवसर पाकर वह लड़की को अपनी बाँहों में कस लेता और तेजी से उनकी ओर बढ़ती ऊँची लहरों का इंतजार करता। लहरें दोनों को घुटनों तक भिगोकर वापस लौट जातीं। लहरों और उनके बीच एक खेल चल रहा था, छुअन-छुआई का।
लड़का खुश था लेकिन भीतर कहीं बेचैन भी था। वह बार-बार अस्त होते सूरज की ओर देखता था। अँधेरा धीरे-धीरे उजाले को लील रहा था। फिर दूर क्षितिज में थका-हारा सूर्य समुद्र में डूब गया।
लड़के की बेचैनी कम हो गई। उसे जैसे इसी अँधेरे का इंतजार था। लड़का लड़की का हाथ थामे भीड़ को पीछे छोड़ समुद्र के किनारे-किनारे चलकर बहुत दूर निकल आया। यहाँ एकान्त था, सन्नाटा था, किनारे पर काली चट्टानें थीं, जिन पर टकराती लहरों का शोर बीच-बीच में उभरता था। वह लड़की को लेकर एक चट्टान पर बैठ गया। सामने विशाल अँधेरे में डूबा काला जल….. दूर कहीं-कहीं किसी जहाज की बत्तियाँ टिमटिमा रही थीं।
””ये कहाँ ले आए तुम मुझे?’ लड़की ने एकाएक प्रश्र किया।
””भीड़ में तो हम अक्सर मिलते रहते हैं….. कभी….’
””पर मुझे डर लगता है। देखो, यहाँ कितना अँधेरा है….’ लड़की के चेहरे पर सचमुच एक भय तैर रहा था।
””किससे? अँधेरे से?’
””अँधेरे से नहीं, जानवर से….’
””जानवर से? यहाँ कोई जानवर नहीं है।’ लड़का लड़की से सटकर बैठता हुआ बोला।
””है… अँधेरे और एकान्त का फायदा उठाकर अभी तुम्हारे भीतर से बाहर निकल आएगा।’
लड़का जोर से हँस पड़ा।
””यह जानवर ही तो आदमी को मर्द बनाता है।’ कहकर लड़का लड़की की देह से खेलने लगा।
””मैं चलती हूँ….।’ लड़की उठ खड़ी हुई।
लड़के ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
””देखो, तुम्हारे अन्दर का जानवर बाहर निकल रहा है…. मुझे जाने दो।’
सचमुच लड़के के भीतर का जानवर बाहर निकला और लड़की की पूरी तरह को झिंझोडऩे-नोंचने लगा। लड़की ने अपने अंदर एक ताकत बटोरी और जोर लगाकर उस जानवर को पीछे धकेला। जानवर लडख़ड़ा गया। वह तेजी से ””बीच’ की ओर भागी, जहाँ ट्यूब लाइटों का उजाला छितरा हुआ था।
लड़का दौड़कर लड़की के पास आया, ””सॉरी, प्यार में ये तो होता ही है….।’
””देखो, मैं तुमसे प्यार करती हूँ, तुम्हारे अन्दर के जानवर से नहीं।’ और वह चुपचाप सड़क की ओर बढ़ गई। ””बीच’ पीछे छूट गया, लड़का भी।
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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