दिसम्बर-2017

दस्तावेज़खिड़कियों से :दीपक मशाल की लघुकथाएँ     Posted: January 2, 2017

      प्रत्येक विकासशील विधा स्वरूप एवं शिल्प की दृष्टि से कभी स्थिर नहीं रहती है। कभी मन्थर गति से तो कभी क्षिप्र गति से स्वरूप और शिल्प में परिवर्तन होते रहते हैं। विषयवैविध्य जहाँ अलग शिल्प की तलाश करता है, वहीं सामाजिक दायित्व की पूर्त्ति के लिए कभी ये परिवर्तन सहज रूप में होते हैं , तो कभी %e0%a4%96%e0%a4%bf%e0%a5%9c%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%87लेखक स्वयं को अलग स्थापित करने के लिए भी करते हैं। एक स्थिति आदर्श की होती है, जिसमें सहजता का सन्निवेश होता है, तो दूसरी स्थिति भावुक आदर्श की; जिसका उद्देश्य केवल पाठक को प्रभावित करना होता है। इवान तुर्गनेव की भिखारी का कथ्य मानवीयता का आदर्श होते हुए भी सहज है। किसी भूखे भिखारी को अपने हिस्से की रोटी में से कुछ दे देना भी इसी श्रेणी में आएगा; लेकिन भिखारी के साथ बैठकर रोटी खाना भावुक और ऊहात्मक आदर्श कथा को कमज़ोर करता है। लेखक जब कथा के विरल प्रवाह में खुद कूद पड़ता है, तो वह हास्यास्पद हो जाता है; क्योंकि लेखकीय हस्तक्षेप साफ़ नज़र आने लगता है। हिन्दी लघुकथा-जगत् में इस ऊहात्मक आदर्श की ढेरों लघुकथाएँ लिखी गई हैं और आज भी लिखी जा रही हैं। इस तरह की रचनाएँ साधारण पाठक के लिए क्षणिक मनोरंजन हो सकती हैं, लेकिन गम्भीरता से विचार करने पर पता चलता है कि ये शिल्पगत दुर्बलता का अच्छा उदाहरण बन गई हैं।

सृजन और लेखन दो विपरीत ध्रुव हैं। प्रयास के बिना तो कुछ भी नहीं हो सकता। ख़्याली पुलाव किसी रचना का रूप धारण नहीं कर सकते। लेकिन सृजन वह अन्त:स्फूर्त कार्य है, जो समय-कुसमय नहीं देखता। बस मनोमस्तिष्क पर इस तरह छा जाता है कि रचनाकार लिखने को बाध्य हो जाए। न लिखे तो वह पाखी-सा फुर्र भी हो सकता है और बरसों बरस कभी हाथ आने वाला नहीं। सृजन की इस त्वरा के पीछे कोई क्षणिक हड़बड़ाहट नहीं, वरन् अनुभव जन्य चिन्तन का वह आवेशित स्वरूप है जो किसी न किसी रूप में प्रकट होना चाहता है, स्वरूप धारण करना चाहता है। वह कोई आकस्मिक, बेतरतीब और आधारहीन चिन्तन नहीं है। न चुटकियों का खेल है। जीवन में बहुत तरह के अभाव होते हैं उन अभावों का भी अपना कोई स्थायी भाव होता ही है। समृद्धि का भी अपना कोई न कोई दु;खद अभाव होता है। अभावों का भाव जहाँ हमें सुख-दु:ख में जोड़ता है, समृद्धि का अभाव वहीं गलाकाट प्रतियोगिता में सबको पछाड़ने की कसम खा लेता है। यह उसकी परेशानी बढ़ाने वाला कारक है ।

लघुकथा का सृजन भी लम्बे अर्से के जीवन- अनुभव के ताप में तपकर इसी प्रकार सामने आता है। लघुकथा-जगत् में कुछ नए लेखक और कुछ अन्य विधाओं में असफल होकर हाथ आज़माने के लिए उतरे नए-नए लेखक घटना या घटनाओं को ही लघुकथा समझकर धड़ाधड़ लिखने में लगे हैं। अगर घटनाओं को ही लघुकथा मानने लग जाएँ तो पुलिस का रोज़नामचा हफ़्तेभर में लघुकथा संग्रह में तब्दील हो जाएगा। प्रवचन देने वालों के दृष्टान्तों, किसी चुभते कथन या आन्दोलित करने वाले विचारों को लघुकथा मानने लगें तो साहित्य-जगत् में वैचारिक कोहरा और अधिक घना हो उठेगा। घटना एक आधारभूत तथ्य को खुद में छुपाए होती है, जैसे एक प्रस्तर खण्ड अपने में खूबसूरत मूर्त्ति समाहित किए हुए होता है। वही तथ्य जब कथ्य का आधार बनता है तो लघुकथा में परिवर्तित हो जाता है। यह सम्भव है कि उस लघुकथा में आधारभूत घटना का कोई एक छोटा-सा अंश परिमार्जित होकर हमारे सामने आ जाए। यह अंश उससे उद्भूत होने पर भी उससे एक दम अलग नज़र आ सकता है, जैसे प्रस्तर-खण्ड से बनी मूर्ति, उस बेडौल पत्थर की सूरत से कहीं मेल नहीं खाती। यह निर्मिति ज्यों की त्यों घटना न होकर एक अलग एक पुनर्गठित स्वरूप है; जो मूल घटना या उत्प्रेरक घटना से कोसों दूर है। यह भी सम्भव है कि कई घटनाएँ, कुछ संवाद परस्पर अनुरूप होते हुए पूरक रूप में जुड़कर किसी एक बिन्दु पर केन्द्रित हो गए हों। एक मुख्य कथा-बिन्दु बन गए हों। यही बात विचार-सरणी  को लेकर भी है। कोरा विचार लघुकथा नहीं। किसी बात को सार रूप में लिख देना भी लघुकथा नहीं। विचार तो वह धुरी है जिस पर वह कथा घूमती है। विचार किसी क्षण विशेष से उपजा वह स्रोत है जिसकी विरल धारा उन किनारों की कोई बात कहती हो, जिन्हें छूकर वह कुछ अपनापन महसूस करती रही है।

दीपक मशाल नए लघुकथाकार हैं। मैं सन् 2011 से इनकी लघुकथाएँ पढ़ता रहा हूँ।  लघुकथा के कथ्य और शिल्प पर मुझसे प्राय: चर्चा होती रहती है। न तो यह युवा लेखक आत्ममुग्ध है और न किसी रचना पर आकर ठहरा है। यह निरन्तर आगे बढ़ने में विश्वास रखने वाला है, अपनी विशिष्टता के साथ, अपनी दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करके। भारत के अलावा विश्व-संस्कृति के सम्पर्क में रहने के कारण इनकी लघुकथाओं का विषय एकांगी नहीं, वरन् वैविध्यपूर्ण है। इनकी लघुकथाओं का फलक व्यापक है। दूध, डर, मुझे नहीं होना बड़ा, बेचैनी यदि मनोवैज्ञानिक क्षेत्र का अवगाहन करती हैं तो वो चेहरा, माचिस, चोर-सिपाही-वजीर-बादशाह प्रतीकात्मक अर्थ लिये हुए हैं। दखल,  अच्छा सौदा उपभोक्ता संस्कृति के यथार्थ की व्याख्या हैं। ठेस और पानी हमारी सामाजिक विकृतियों को अनावृत्त करती हैं। यह शुभ संकेत है कि दीपक मशाल ने खुद को किसी एक क्षेत्र से बाँधकर नहीं रखा है।

ठेस लघुकथा विधि और समीर के लिव इन रिलेशन की पृष्ठभूमि की कथा है। विधि के पिता उसके पास रहने के लिए आते हैं तो वह समीर को एक-दो हफ़्तों के लिए कहीं किसी दोस्त के यहाँ शिफ्ट करने को कहती है; क्योंकि वह नहीं चाहती कि घर वाले जाने कि मैं लिव-इन में रहती हूँ। आधुनिकता को एक ओर स्वीकार करते हुए भी मर्यादा की एक ऐसी दीवार बची हुई है, जिसे अचानक भूमिसात् नहीं किया जा सकता है। इस कथा में कोई अन्तर्द्वन्द्व नहीं, वरन् मर्यादा का पर्दा है  प्रेमिका विधि जिसे  गिराने के पक्ष में नहीं है। समीर मॉडर्न बनने और दूसरी तरफ़ मर्यादा की बात करने को अव्यावहारिक मानता है। ‘अगर तुम्हारी बहिन तुमसे अपने लिव-इन रिलेशन के बारे में बताए ,तो तुम खुशी-खुशी मान जाओगे?’ विधि के इस प्रश्न से समीर उखड़ जाता है। उसका खुलापन पलभर में ढह जाता है। आधुनिक जीवनशैली का वह हामी संकीर्णता से घिरा नज़र आता है। सोच का यह दोगलापन सुविधावादी पुरुष को, उसकी उथली सोच को बेनकाब कर देता है। संकीर्णता वस्तुत: सामाजिक देन नहीं, वरन् व्यक्ति केन्द्रित है। केवल अपने ऐशोआराम को प्राथमिकता देना प्रगतिशीलता नहीं। प्रगतिशीलता है अपने साथी को, उसकी मन:स्थिति को समझना, उसका सम्मान करना।

दूध लघुकथा में एक ओर अनब्याही माँ की पीड़ा है, जो कभी गर्भपात करवा चुकी है। आज उसका बच्चा भी इसी युवाग्राहक की उम्र का होता; तो दूसरी ओर उस पुत्र की पीड़ा है ; जिसे माँ का आत्मीय स्पर्श नहीं मिला। मन को सींचने वाला प्यार नहीं मिला। वेश्यावृत्ति से जुड़ी महिला और छात्र से जुड़ी यह लघुकथा कहीं भी मन में वितृष्णा पैदा नहीं करती। इस कथा में प्याज के छिलके की तरह तेज़ी से कपडे निकाल कर उसने लड़के को बिस्तर पर खींच लेने वाली उस महिला का मातृत्व ही उभरकर आया है। उसके सीने से लिपटा लड़का बड़बड़ाए जा रहा था, ”क्यों मम्मी!! क्यों चली गईं छोड़कर….. क्यों??”

वह अभिभूत हो उठी और उस लड़के के सर पर हाथ फेरा तो वह गले से और जोर से लिपट गया। फिर अचानक उठा, नज़रें नीची कर अपने कपड़े पहने और सॉरी कहकर कमरे से बाहर निकल गया।

इस तरह की रचना में विषयवस्तु का निर्वाह करना बहुत कठिन है; लेकिन दीपक ने इसका निर्वाह बहुत सफलता से किया है। कथा-प्रवाह में लेखक का हस्तक्षेप कहीं भी दृष्टिगत नहीं होता। यही इस कथा की सफलता है।

पानी लघुकथा घाटी में घटी त्रासदी के व्याज से एक अलग दूषित चिन्तन को उद्घाटित करती है। भीषण त्रासदी से शर्मा जी किसी तरह बचकर आ गए हैं। विपदा से बचकर लौटना भी एक बड़ी घटना है यानी दूसरे शब्दों में कहें तो चमत्कार। आज के दौर में हर घटना को भुनाने की होड़ लगी है। आपदा के समय पानी बेचकर पैसा कमाने वालों की कमी नहीं होती , उसी प्रकार कुछ लोग अपने स्वार्थ के लिए हर घटना का महिमामण्डन करके उसके द्वारा सृजित लाभ को अपनी ओर मोड़ लेने के प्रयास में लगे रहते हैं। शर्माजी खुद को इस जंजाल से दूर रखना चाहते हैं। वे जो ताण्डव देख चुके हैं,  उससे उनकी आस्था कहीं न कहीं आहत हुई है। वे छोटे शर्मा (अपनेपौत्र) पर चिल्ला उठते हैं– ”चल भाग जा राक्षस…… मैं मर जाऊँगा लेकिन बीस गुनी कीमत का तेरा पानी नहीं खरीदूँगा।” कारण सीधा-सा है, छोटे शर्मा इस साल दद्दू को प्रधानी के लिए खड़ा करना चाह रहे हैं। यही कारण है कि उनके इंटरव्यू के लिए टीवी वालों को बुला लिया है, ताकि इस अवसर पर लोगों की आस्था का दोहन कर लिया जाए। गाँव से शहर तक, शहर से तीर्थाटान तक फैला बाज़ारवाद हमारी संवेदना का दोहन किसी न किसी रूप में कर रहा है। सामाजिक और सांस्कृतिक केन्द्र इसके विस्तार में गोपनीय भूमिका निभा रहे हैं, जिन्हें धर्म-कर्म के नाम पर अनदेखा कर दिया जाता है ।

अच्छा सौदा छूट पर बिकने वाली वस्तुओं के पीछे छुपे सच को उजागर करती है। क्रिसमस के अगले दिन होने वाली  बॉक्सिंग डे सेल का चित्रण करते हुए लेखक ग्राहकों की मारामारी को उकेरता है। लेखक का यह कहना- हर कोई दुम में रॉकेट लगाए भाग रहा था’ क्रेता की आतुरता को सही अर्थों में चित्रित करता है। लघुकथा के लिए इसी तरह की भाषा चाहिए, नवीन उद्भावना और अर्थ-गहनता लिये हुए। जिस छोटे से शो-रूम में बाकी दिनों में इक्का-दुक्का ग्राहक ही जाते थे आज वहाँ भी मारामारी थी। सेल का महत्त्व बढ़ाने के लिए बड़ी चालाकी से- ‘सेल में बिका हुआ माल ना वापस होगा और ना ही बदला जाएगा’ के पम्फलेट लगाए गए थे। शोरूम में दो नवयुवक घुसे जो तेज़ निकला उसके हाथ कोट आ गया। दूसरा उसे न पा सका। दूसरे युवक की बेचैनी और गुस्से को भी सार्थक अभिव्यक्ति दी देर से जागने के कारण को। उसे लगा- ‘जैसे कोहिनूर हीरा उसके हाथ से फिसल किसी और की झोली में जा गिरा हो।’ कथा के साथ पाठक की उत्सुकता निरन्तर बनी रहती है।

अब प्रकट होती है इस सेल के पीछे की असलियत ।दुकान का मालिक खुश था कि आठ महीने से दुकान में पड़ा वह कोट बिक गया, लागत निकलने के साथ फ़ायदा भी हो गया ; अन्यथा दोपहर बाद उसकी कीमत कम करनी पड़ती। दुकान का सेल्समैन उसी कोट को पहनकर रात क्रिसमस पार्टी में गया था, जिस पर रेड वाइन का पैग गिर गया था। गहरे रंग का होने से उस पर पड़ा दाग ग्राहक को नज़र नहीं आया। वह मालिक की डाँट खाने से और आर्थिक दण्ड भुगतने से बच गया। ग्राहक, दुकान मालिक और सेल्समैन तीनों  की नज़र में यह अच्छा सौदा था। बाज़ारवाद की पोल खोलता यह ‘अच्छासौदा’ सेल्स की प्रक्रिया की सीवन उधेड़ने में सक्षम है।

चोर-सिपाही-वजीर-बादशाह लघुकथा व्यवस्था पर करारा व्यंग्य है। चार पर्चियाँ डाली गईं। उन पर नाम लिखे गए चोर, सिपाही, वजीर और बादशाह। बादशाह की पर्ची जिसके हाथ में आई, वह सीना चौड़ा करके गरजकर बोला– ‘बोल-बोल, मेरा वजीर कौन?’ लेखक ने नहीं बताया कि इनके पास कौन-सी पर्ची आई है। सीना चौड़ा करके गरजने और पूछने के तरीके ने उसके अस्तित्व का बोध कराया। वज़ीर का विनम्रतापूर्ण उत्तर– ‘मैं जहाँपनाह!’

जब बाकी बचे दोनों में से चोर–सिपाही का पता लगाने के लिए कहा जाता है तो वज़ीर का कथन बहुआयामी ही नहीं बल्कि व्यंजनात्मक भी हो जाता है- ‘जाने भी दीजिये हुज़ूर, दोनों अपने ही आदमी हैं… वैसे भी इनके हाथ तो सिर्फ कौडियाँ लगी होंगी, अशर्फियाँ तो महफूज़ ठिकानों में पहुँच ही चुकी हैं।’ सत्ता में वज़ीर व्यवस्था को पदमर्दित करने की भूमिका का निष्ठापूर्वक निर्वाह करता है। चोर भी उनका आदमी और चोर को पकड़ने वाला सिपाही भी उन्हीं का आदमी। जिसका सब कुछ चोरी चला गया है, वह किसी का आदमी नहीं, उसकी कोई सुनवाई नहीं। जिसके लिए सारी व्यवस्था का तामझाम है, उसे गर्दनिया देकर बाहर कर दिया गया है। सत्ता अपने चोर सिपाही के माध्यम से लूट को अंजाम देती रहती है। सामान्य और पीड़ित जन इस खेल से पूरी तरह बाहर है। लोकतन्त्र की यह सबसे बड़ी विडम्बना और विवशता है। इस नए लेखक की यह लघुकथा पाठक के मन पर एक धमक छोड़ने की शक्ति रखती है। सतही तौर पर रचना-पाठ सामान्य लग सकता है। गहन रूप से पढ़ने पर सहृदय पाठक विचलित और चिन्तित हो उठता है। वज़ीर और बादशाह की सारी ताकत चोर और सिपाही को बचाने में ज़ाया हो रही है। जो इनके हाथों लुट –पिट चुका है, उसे राहत मिलने की सम्भावना है ही नहीं। सामाजिक पतनशीलता और राजनैतिक विद्रूपता को यह लघुकथा मार्मिक अभिव्यक्ति प्रदान करती है।

दखललघुकथा में उस युवा मानसिकता को रेखांकित किया गया है जो विदेश में प्रवास और नौकरी करने को अलग प्रतिष्ठा से जोड़ने का भ्रम पाले हुए हैं। सोशल साइट के माध्यम से इस तरह की हीन मानसिकता को और खाद मिल रही है। भ्रम का गुब्बारा तब फुस्स हो जाता है, जब उसी के गाँव के समवयस्क लड़के की फ़्रैण्ड रिक्वेस्ट पाकर उसे लगता है कि वह इस दौड़ में पिछड़ गया है। वैश्विक स्तर पर यह गलाकाट प्रदर्शन मन का चैन छीनने का ही काम करता है। विषयवस्तु की नवीनता आज की युवा पीढ़ी की मानसिकता उजागर करती है ।

डर– बेटे और बेटी का परिवार हर तरह से समृद्ध और सुखी है फिर भी बूढ़ा कहीं घूमने-फिरने को तैयार न होता। वह न बेटी की बात सुनता और न बेटे की। उस कस्बानुमा जगह से बाहर न निकलना चाहता था। बच्चों को लगता कि उनके भविष्य की खातिर दिन–रात एक कर दिया था। न कहीं घूमना-फिरना न तीर्थयात्रा, न साथ में आकर शहर में रहना। उस शहर से उसकी आसक्ति किसी से छुपी नहीं थी, जबकि ना ही वहाँ उसका कोई दोस्त था ना सगा-सम्बन्धी। ऊपर से हवेलीनुमा उस मकान में दोनोंलोग दो कमरों और एक किचेन से ज्यादा कुछ इस्तेमाल भी ना करते । इसके पीछे एक डर छुपा हुआ था कि कहीं उनकी अनुपस्थिति में कोई उस घर पर कब्ज़ा न कर बैठे। इसीलिए वे घर का कोई भी हिस्सा कभी किराए पर नहीं देते थे। इसके पीछे भय निहित है; क्योंकि बुढ़िया को ध्यान आया कि उसके पति 35 साल पहले इस मकान के बूढ़ेमालिक के पास किरायेदार बनकर आए थे और फिर एक सुबह अचानक उसके मालिक बन बैठे थे। अपराधबोध कभी आदमी को चैन से नहीं जीने देता। स्वप्न के माध्यम से लेखक उस डर को सामने लाता है।

माचिस– लघुकथा उस षडयन्त्र को बेनक़ाब करती है, जिसके अन्तर्गत एक अभियान चलाया जा रहा है, उदारता को अनुदारता में बदलने का। जो देश को एकता के सूत्र में बाँधकर चले, उन्हें वर्गीकृत कर के सीमित और संकीर्ण दायरे में लाकर खड़ा करने का उपक्रम किया जा रहा है। विचारों की उदार विरासत को एक छोटी- सी परिधि में जकड़ दिया गया है। दलबन्दी से अभिशप्त वर्ग ने समभाव वाले वैचारिक आन्दोलन का अपहरण करके उस पर अपने मनमाने अर्थ चस्पाँ कर दिए। पूरी लघुकथा आज के राजनैतिक प्रदूषण और अवसरवादिता को बेनक़ाब करती है। ‘हर पार्टी के ऑफिस में माचिस-माचिस की पुकार मची थी।’ वास्तव में यह माचिस दीपावली की फुलझड़ी जलाने वाली नहीं है। यह वह माचिस है जो निरन्तर आपसी सद्भाव, शालीनता, एकात्मकता, साम्प्रदायिक सौहार्द और सहिष्णुता को जलाने पर उतारू है। प्रत्येक दल में इसी माचिस की पुकार मची है। देशहित कहीं कोने में खड़ा रह गया है, जिसे संकीर्णता की माचिस कभी भी भस्म कर सकती है।

बेचैनी आपसी सम्बन्धों में औपचारिकता और अहंमन्यता सदा कृत्रिमता को ही जन्म देती है। अपने आने वाले परिचित को इन्तज़ार कराना सम्भवत:  उसी अहं का पोषण करता है। पत्नी नहीं चाहती कि आते ही एकदम अगवानी के लिए दौड़ा जाए,  इसलिए वह पति को टोकती है। इससे पति की बेचैनी बढ़ती है। वह अपनी बेचैनी पत्नी के सामने प्रकट कर देता है। पत्नी को भी अहसास होता है कि प्रतीक्षा करने वाले मित्र के साथ उनका छोटा बच्चा भी तो होगा ,  जो नीचे अकारण बाहर सर्दी में खड़ा होगा। वह पति को जल्दी सबको ले आने के लिए कह देती है। थोथे अहं का यह विगलन मानवीयता की सुगन्ध बन जाता है।

वो चेहरालघुकथा  में सामाजिक अन्याय से लड़ने का एक जज़्बा है। समय बीतता जाता है। बेईमानों के विरुद्ध लिखने के लिए और आँकड़ों की दरकार हुई। एक अर्से बाद पर्याप्त आँकड़े एकत्र हो गए। सारे षडयन्त्रों का भंडाफोड़ किया जा सकता है। वह उन्हीं नामों के प्रतिरोध के लिए तैयार हुआ लेकिन यह क्या! ‘उसके पेट से निकले हाथों ने उसके हाथों को थाम लिया, उसके पेट पर उभरे उस चेहरे के आँसुओं में गज़ब का सम्मोहन था।‘ पेट से निकले हाथों के इस सम्मोहन ने उसकी सारी शक्ति छीन ली। उसके सारे इरादे कालकवलित हो गए। इस प्रतीकात्मक लघुकथा में यह सन्देश मुखर हुआ है कि पेट भर रोटी के लिए सारी शक्ति लगा देने वाला व्यक्ति अघाए और अत्याचारी लोगों से मुकाबला नहीं कर सकता। यह असमानता का संघर्ष है, जिसमें हार उसी की है जो असहाय है, अकेला है तथा निहत्था है, जिसे इस संघर्ष में अपनी आजीविका छिन जाने का डर है।

‘अहम्’ लघुकथा में  नारी को पुरुष से ही न समझने का अहंकार कोई नया नहीं है। नगरपालिका के रजिस्टर में डबल एम.ए. पास पत्नी का नाम दर्ज़ कराते समय क्लर्क ने जब प्रश्न किया कि आप तो सिर्फ़ ग्रेज्युएट हैं’। वह पूछता है- ‘आप कहें तो उनको इंटरमीडिएट पास लिख दूँ?’

तो पति का यह उत्तर उनकी रुग्ण और रूढ़िवादि मानसिकता का परिचायक है।

-‘चाहे जो लिख दो यार, सम्हालना उन्हें चौका ही है।’ इस सोच को इंगित करते हुए एक भाव स्थिति उभरती है और वह यह है कि पुरुष की हीन भाव वाली मनोवृत्ति छूटने वाली नहीं-‘कमरा अचानक एक अजीब बदबू से भर गया।’ इस तरह की मानसिक दुर्गन्ध से न जाने कब मुक्ति मिलेगी।

सत्ता का सदा एक ही चेहरा होता है , जिससे कोई लाभ नहीं, उस पीड़ित का बचाव न करना। वास्तविक पीड़ित व्यक्ति को कभी सही रूप में सहायता नहीं मिल पाती। ‘मुआवज़ा’ लघुकथा इसी तरह की है, कस्बे की बाढ़ में नेकसिंह बनजारे का कपड़ा–लत्ता, कुत्ता बकरी सब बह गए। उसके पास तो कच्चा घर भी नहीं था। अपनी गाड़ी पर ही बरसाती तानकर काम चलाते रहे- ‘घर न हतो मालिक, ऐसेई गाड़ी पे बरसाती तान कें काम चलात ते’- गिड़गिड़ाने पर सिपाही उसको मुआवज़ा दिलवाने की बात करता है; लेकिनक्यों? यह रहस्य धूर्त्त सिपाही हँसते हुए बताता है- ‘जब चोरी-चकारी या राहजनी जैसे मामले नहीं सुलझ पाते तो प्रेशर कम करने के लिए गिरफ्तारी दिखाने में बड़े काम आते हैं ये बंजारे’ ये शब्द थे सिपाही के सत्त्ता और कुशासन का शोषण दर शोषण यह सिलसिला ज़ारी रहता है। क्षेत्रीय बोली के कारण लघुकथा सशक्त बन गई है। सटीक शब्द–चयन और वाक्य-गठन लघुकथा को अर्थपूर्ण और कलात्मक बनाते हैं। लघुकथाकार से जिस धैर्य की, गह्नचिन्तन और सुगठित शिल्प की माँग करती है, वह इस रचना में मौजूद है।

‘सोने की नसेनी’–लड़के और लड़की की असमानता को इंगित करती कथा है। लड़के का जन्म पुण्य का काम है , स्वर्ग तक पहुँचाने वाली नसैनी (सीढ़ी) है। लड़की के प्रति घोर उपेक्षा की बद्ध मूलधारणा आज की तथा कथित सभ्यता पर प्रश्न खड़े करती है। यहाँ शिक्षा या अशिक्षा उतनी महत्त्वपूर्ण कारक नहीं, जितनी कन्या के प्रति सदियों से चली आ रही उपेक्षा की बद्ध मूलधारणा।

प्रतीक-प्रयोग करना तो आसान है,  पर धुर तक उसका निर्वाह करना बहुत कठिन है। मानवेतर पात्रों का प्रतीक के रूप में प्रयोग और भी चुनौती-भराहै। सही प्रयोग न होने पर रचना हास्यास्पद हो सकती है। ‘बड़े’- प्रतीकात्मक कथा है। बचपन में पौधे के प्रति लगाव, फूल का खिलना महत्त्वपूर्ण थे। समय बदला, फूल झरे तो झरे, साथ में बचपन भी बीत गया। खुशी भी बड़ी क्या हो गई तो काफ़ूर ही हो गई। छोटी-सी खुशी कब की खत्म हो गई! बड़े होने का मतलब है सहजता का गायब होना। सुख का मनोविज्ञान अधिक रुपया–पैसा नहीं, वर्ना कम से कम साधनों में सुख महसूस करने की ओर प्रवृत्त होना है। बहुत सोच-समझकर प्रतीक का प्रयोग किया गया है।

‘आतंक’ लघुकथा में भाषा के प्रति सामन्ती दृष्टिकोण को उभारा गया है। शिक्षा जगत के इस विषय पर बहुत लघुकथाएँ लिखी जा चुकी हैं। मशाल ने इसे नए फ़ॉर्म में पेश किया है,  जिससे शिक्षा के नाम पर क्रूर भाषायी आतंक और अधिक गहरा होकर उभरा है। हिन्दी में बोलने पर पाबन्दी–संविधान विरोधी कृत्य को बढ़ावा दिया जाना चिन्ताजनक है। भाषा का विरोध अर्थात्  बहुभाषी लोगों का उपहास अलोकतान्त्रिक कदम् तो है ही साथ ही हमारी भीरु सहनशीलता का कड़वा सच भी है। शिक्षा– जगत में जिनका प्रवेशनिषिद्ध होना चाहिए , संवेदनहीनलोग शिक्षक जैसे संवेदनशील पद पर कार्यरत हैं।

निमंत्रण’– लघुकथा में उस छोटी–सी बात को भी ध्यान में लाया गया है, जो पीड़ा दे जाती है। निमन्त्रण–पत्र में बड़ों का नाम न होना  अखरता है। अनजाने में की गई ये गल्तियाँ घर के मुखिया को आहत करती हैं। दुबारा इसी तरह का निमन्त्रण आने पर तल्ख़ लहज़े में बहू का प्रतिकार सारा दर्द दूर कर देता है- ‘माफ़ कीजिए भाईसा’ब, ईश्वर की दया से हमारा परिवार अभी तक बँटा नहीं है और घर के मुखिया बाबू जी ही हैं। आप तीनों भाइयों के नाम के साथ सपरिवार लिखने के बजाय बाबू जी के नाम पर सपरिवार लिख सकें तभी हम आमंत्रण स्वीकार कर सकेंगे। बहू का यह एक वाक्य ससुर की मनोव्यथा को धो डालता है।

‘जिजीविषा’ मार्मिक लघुकथा है। बुजुर्गों को खाने से अधिक बात करने वाला, हालचाल पूछने वाला चाहिए। अम्मा की असहाय सहेली का चले आना खटकता है। बहूरानी का प्रतिरोध उभरता है- ‘देखिये जी आप अपनी अम्मा से बात करिए जरा, उनकी सहेली बूढ़ी अम्मा जो रोज-रोज हमारे घर में रहने-खाने चली आती हैं वो मुझे बिलकुल पसंद नहीं।

– लेकिन कविता, उनके आ जाने से बिस्तर में अशक्त पड़ीं अपनी अम्मा का जी लगा रहता है..

– अब तुम्हे पता तो है कि बेचारी के बेटों ने घर से निकाल दिया.. ऐसी सर्दी में वो जाएँ भी कहाँ?

– गज़ब ही करते हैं आप.. घर से निकाल दिया तो हमने ठेका ले रखा है क्या उनका? जहाँ जी चाहे जाएँ.. हम क्यों उनपर अपनी रोटियाँ बर्बाद करें?

अन्दर चल रही बहस को सुनकर सासू माँ की सहेली चली गई। बेबस सास अपनी सहेली को रोक भी न सकी। अम्मा खाने की तरफ देखे बगैर भूखी ही सो गई थीं।

‘बीमा’ लघुकथा के माध्यम से गाँव वालों की अज्ञानता–भरी सोच उद्घाटित होती है। बीमा कराने का मतलब–बीमार होने की कामना करना या अपशकुन मानना तो नहीं होता। अशिक्षा और जागरूकता की कमी भी इसका एक कारण है।

बाबूगिरी का भ्रष्टाचार पूरे देश और समाज को खोखला करता जा रहा है। इसका निदान कठिन ही लग रहा है। सरकार द्वारा दी गई सहायता के लिए गिड़गिड़ाना सामान्यजन की नियति बन गई है। ‘फेलोशिप’ में प्रस्तुत धूर्त्तजन के कुत्सित कार्यों का प्रतिरोध जरूरी है।

शिकार- लोकतन्त्र की क्रूरता की कथा है। ‘बँटवारा’–विभाजन बड़ों को बाँट देता है, लेकिन बच्चों को नहीं। अंगुलियाँ– आदर्शवादी और सकारात्मक लघुकथा, अपनेमेंपूर्ण।

‘हिम्मत’ लघुकथा में डाँटकर पिता का आत्मविश्वास जाग्रत करना भले ही अनुचित लगे , लेकिन यह पूर्णतया स्वाभाविक है। यह लघुकथा पुत्र की विवशता को बहुत संजीदगी से अभिव्यक्त करती है। इस नए विषय पर हटकर लिखी और सधी हुई लघुकथा है।

‘जो जरूरी है’– बेटे–बेटी का भेद मिटाने की एक छोटी-सी पहल की शुरुआत भर है। रोज़मर्र्रा के व्यवहार में जाने-अनजाने ऐसी स्थितियाँ आती रहती हैं कि हम लड़के को लड़की से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण बनाने की गलती कर जाते हैं। समय रहते उसे रोका जाना चाहिए। यही इस लघुकथा का सन्देश है।

‘चक्कर’ लघुकथा में दर्शाया गया है कि मानवता और उदारता व्यक्ति का नैसर्गिक गुण है। किसी के प्रतिद्रवित होने पर शंकित होना उचित नहीं। इस कथा को और उभारा जा सकता था।

‘साँचा’– लघुकथा में अनुकम्पा पर मिली नौकरी, साहब का बुरा बर्ताव मन को चोट पहुँचाता है। परिवार चलाने की मज़बूरी किसी भी व्यक्ति के आत्मसम्मान को चोट पहुँचाकर उसे गुलाम बना सकती है। दफ़्तरों में यह स्थिति आम है। ‘गणित’ में तबादलों का गणित चोर नौकरशाह और धूर्त्त राजनेताओं के लिए हरी-भरी फसल की तरह है। ‘ज़रिया’ अगर घृणित कृत्य को उजागर करती है, तो ‘इज्ज़त’ अपनों द्वारा किए गए घृणित देहशोषण को बेनकाब करती है, जिसका जिक्र बहुत कम होता है। यह वह चीख है, जो सुनाई नहीं देती; क्योंकि लाज बचाने के नाम पर वह चीख दबा दी जाती है।

दीपक मशाल की लघुकथाएँ युवा लेखकों के लिए आदर्श हैं- विषय वैविध्य के कारण भी और प्रस्तुति की नव्यता के कारण भी। फिर भी मैं एक बात कहना चाहूँगा कि अच्छे लघुकथाकार में रचनाकर्म के लिए संयम और धैर्य होना चाहिए। जो लघुकथा शुरू कर दी है, उसे पूरा कर के ही दम लिया जाए, जैसा कोई दबाव मन पर नहीं होना चाहिए। इसका सबसे बड़ा नुकसान है, उसी बीच में कोई अन्य महत्त्वपूर्ण प्लॉट मन में आएगा, तो यूँ ही बिसर जाएगा। रचना को तराशना बहुत ज़रूरी है। कई अच्छी रचनाएँ और अधिक अच्छी बन सकती थी। उनके लिए और अपेक्षित श्रम की ज़रूरत थी, जो दीपक में मौजूद है। मानवेतर पात्रों का समावेश ज़रूर करना चाहिए;  लेकिन यदि वही कथ्य मानव पात्रों के द्वारा बेहतर ढंग से किया जा सकता है तो मानवेतर पात्रों से गुरेज़ करना चाहिए।

दीपक मशाल की ये लघुकथाएँ इतना तो आश्वस्त करती हैं कि आने वाले समय में लेखक और अधिक नए विषयों का सन्धान करेगा और शिल्प के क्षेत्र में भी नए द्वार का उद्घाटन करेगा।

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

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    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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