अगस्त-2017

संचयनखून का रिश्ता     Posted: March 1, 2015

खून का रिश्ता
आज वह सालों बाद शहर से गाँव में दुर्घटनाग्रस्त अपने बड़े भाई से मिलने आया था। वह एक दुर्घटना में बाल-बाल बचा था।
उनका जमीन के एक टुकड़े पर झगड़ा हुआ था। झगड़ा यहाँ तक बढ़ा कि छोटे ने बड़े से हमेशा के लिए नाता तोड़ लिया था। वह भतीजी की शादी में भी उसे आशीर्वाद तक देने न आया। बस, उसके बाद तो वे नाम के ही भाई रह गए।
वह चौखट पर था। न चाहते हुए भी बरसों पहले के दृश्य एक-एक कर स्मृतिपटल पर छाने लगे…उसे याद आया कि किस तरह भाई ने आर्थिक अभाव झेलते हुए मुझे अपने पैरों पर खड़े होने लायक बनाया…।
‘‘अरे! मैं किस सोच मे पड़ गया। नहीं…नहीं…अब मुझे ऐसा नहीं सोचना। उसने अपनी बात को स्वयं ही काटा। बस, अब तो एक पल को मिलूँगा और उन्हीं कदमों से वापिस लौट आऊँगा।’’
वह अन्दर गया। दो मिनट बात की और लौट पड़ा। उसका पत्थर दिल पत्थर ही रहा।
पर, यह क्या? उसने जैसे ही चौखट पर कदम रखा ,तो उसके कदम उठाए न उठे। वह तुरन्त पीछे मुड़ा और भाई के कदमों में गिरकर यूँ रोया कि मानो वर्षों से मन में जमा विषाद आसुँओं के रूप में बहा देना चाहता हो।
बड़े भाई की आँखों से भी अश्रुधारा रोके नहीं रुक रही थी।
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