अक्तुबर-2017

संचयनगौतम कुमार सागर की लघुकथाएँ     Posted: January 2, 2017

1-अपराध

माँ – बाप का सिर लज्जा से झुक गया. पुलिस ने सात टीनएजेर्स को पकड़ा था।ये संगठित अपराध , “यो यो gautam-sagarगो “ ग्रूपचला रहे थे । ये टीनएजेर्स माहिर बाइकर्स थे । यह स्कूल से बंक मार कर , हेलमेट से मुँह ढककर ….सुनसान कॉलोनियोंमें चक्कर काटते थे । यह अधेड़ , बूढ़ी महिलायों के गले की सोने की चैन खींचते थे।  ये ग़रीब या निम्न आय वाले घर के लाड़ले नही थे । इनमें से किसी के पिता … गवर्नमेंट ऑफ़िसर थे …तो किसी केप्रोफेसर…. कोई बिज़नेसमॅन का बेटा था …तो कोई पुलिस महकमे के अधिकारी का .   माँ- बाप तो पहले मानने को ही तैयार नही थे की उनके राजदुलारे असल में उच्चके और चैन स्नेचर हैं । पुलिस ने कई जगह की सी सी टी वी फुटेज दिखाई , तब वे माथा पीटकर रह गये।

इतनी रेस्पेक्टफुल लाइफ स्टाइल , उम्दा एजुकेशन , अच्छे कपड़े , आलीशान और आरामदेह घर ……। फिर इन्हे…चोरी चकारी करने की क्या ज़रूरत पड़ी।

“ड्रग्स …..????”-एक पिता ने घबराते हुए पूछा ।

सब इनस्पेक्टर ने कहा , “ मेडिकल टेस्ट में …ड्रग्स वग़ैरह के सबूत तो नहीं पाए गए …..लेकिन ये चोरी अपने लिए भी नहीं करते थे . बल्कि दूसरों के लिए करते थे .”

कुछ माँओं की बुझती आँखों में एक उजास भर आया …तो क्या उनके कुल दीपक ….रॉबिन हुड हैं ….. ग़रीबों के लिए इतनी बेहतरीन सोच रखता हैं ….बस रास्ता ग़लत चुना .लेकिन पुलिस की थर्ड डिग्री के बाद ……सातों ने भेद खोले , नाम बताए , वे नाम थे– शीना , रीया , सुहाना , सारा , प्रिया , पूजा …और जेनिफेर,यह सब उनकी गर्ल फ्रेंड्स के नाम थे । वे अपनी अपनी गर्ल फ्रेंड को महँगे मोबाइल फोन , गिफ्ट्स देने , उन्हे महँगे होटलों में खाना खिलाने , घूमने , फिरने के लिए चोरी- चाकरी करते थे ।

प्रेम का यह विकृत रूप देखकर …..सुनकर …सब भौचक थे , निशब्द , निरुपाय।

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2-माँ की फोटो

माँ की एक पासपोर्ट फोटो चाहिए। माँ बिल्कुल तैयार नहीं .उसे फोटो खींचवाने से परहेज नहीं हैं।

मगर वह अकेले फोटो नहीं खिंचवाना पसंद नहीं करती है…… कहती है , “ मैं निर्बंसीनी हूँ क्या …पहली फोटोसोनपुर के मेले में खिंचवाई थी ….तुम्हारे बाबूजी के साथ।”

वह ब्लैक एंड व्हाईट फोटो अब भी तक बड़े से आयताकार फ्रेम में मुख्य बैठक में लगा हुआ है…..एक बेश कीमतीएंटिक पेंटिंग की तरह। उस फोटो में माँ सिर पर आँचल लिए ,एक दम नई नवेली दुल्हन के साज़-सिंगार में नाक मेंबड़ी सी नथ , कानों में बड़े कर्णफूल पहने , माँग में टह -टह लाल सिंदूर ( वह सिंदूर बाद में फोटोग्राफर ने बारीक पैंट केरूप में लगाया गया था ….माँ के कहने पर), …. बेहद सुंदर थी माँ तब….वैसे भी माएँ कब कुरूप होती हैं।

बाद में श्याम-श्वेत हो या रंगीन ….माँ की जितनी तस्वीरें थीं ..सब में या तो बाबूजी साथ में थे या चारों बेटे-बेटियों  के हमेशा फॅमिली फोटो में माँ ऐसी दिखती …मानो….परिवार की माला का चमकदार और कीमती कोहिनूर।

माँ कहती थी .-इतना बड़ा कुनबा होते हुए ,…मैं अकेली तस्वीर क्यों खिचवाऊँ . बाबूजी इसे माँ का “अंध विश्वास “ ,“ फोबिया “ आदि कहकर चिढ़ाते थे।

बॅंक में अकाउंट खुलवाने के समय भी माँ नहीं मानी थी । तब बाबूजी ने साथ में फोटो खिचवाया और बाद में फोटो ग्राफरको कहकर माँ की फोटो अलग करवाई थी ।

माँ अब कोई 70 साल की है। बाबूजी को गुज़रे भी कोई 9 साल हो गए ।

दोनो बेटियाँ सालों पहले ससुराल चलीं गईं । दोनो बेटे अपने अपने परिवार के साथ दूसरे राज्यों में सेटल हो गए ।माँ …। छूटे स्टेशन की तरह ….पीछे छूट गई। घर में अकेले । बेटों के घर छोटे पड़ते थे। बेटियों की अपनी मजबूरियाँ थी।स्वाभिमानी माँ ….किसी पर बोझ बनना पसंद नहीं करती थी ।

माँ आज भी उर्जा से भरी रहती हैं। बुढ़ापे की चलती फिरती बीमारियों के अलावे ।.एकदम स्वस्थ. अपने;सुखद स्मृतियोंऔररामचरित मानसके साथ संतुष्ट । ना जीवन से शिकायत, ना संतानों से। बाबूजी के बाद माँ को पेंसन मिलनेलगा .वह जीवन यापन के लिए काफ़ी था।

मगर वह आज भी अकेले फोटो नहीं खिंचवाती , “ कहती हैं निर्बंसनी हूँ क्या ….आधार कार्ड वालों से कह दिया …गर्मी की छुट्टियों में मेरे बेटे – बेटियाँ पोते पोती आएँगे ….तब आना …मेरी फोटो लेने”।

माँ पुरानी अलबम की तरह हैं .. जिसके भीतर वक़्त ने हज़ारों फोटोग्राफ्स खींच कर ..सहेज कर रखे हैं…. स्मृतियों के रूप में.

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3-मनोकामना

उच्च सरकारी अधिकारी दासगुप्ता बड़े उदास दिख रहे थे ।

“क्यों भाई,क्या बात हुई । हर साल तो फॉरेन ट्रिप पर जाते थे । हर दो साल में नई गाड़ी खरीदते थे।

साल दो साल में नये फर्निचर लाते थे। इस बार . कुछ खास नही दिख रहा हैं।” उनके पड़ोसी बंसल ने पूछा.

दासगुप्ता आह भरते हुए बोले, “ अब क्या बताए , समय -समय का फेर हैं । जिले का यही हाल रहा तो ….अगले साल… दूसरे जिले में तबादले की अर्जी लगा दूँगा.…..ज़रा …मेरे जूनियर रहे मिश्रा को देखो…..बाढ़ग्रस्त इलाक़े में पोस्टिंग क्या मिली ……हर सावन -भादो ….रुपये की वारिश होती हैं. राहत – कोष,रिलीफ पॅकेज, बाढ़ में बहे मवेशियों के लिए , आदमियों के लिए , टूटे घरों के लिए ….और ना जा क्या-क्या के मुआवाज़े का ढेर सारा पैसा आता हैं।” वे बाकी सब इशारों में समझा गए ।

…… और देखो ,उ सक्सेना को ….मेरा ही कालीग रह चुका हैं. महाराष्ट्र के किसी सूखा ग्रस्त इलाक़े मे पोस्टिंग क्या मिली . सारी ईमानदारी ……रेत में बूँद की तरह जज़्ब हो गई. सुना हैं …ऑडी गाड़ी में चलता हैं,पुणे , मुंबई में फ्लॅट ले लिए , बेटों को पढ़ने के लिए कनाडा भेजा हैं. फिर वे गला व्हिस्की से तरकरते हुए बोए " …..सूखे में भी कम हरियाली नहीं हैं भाई ….वहाँ भी पानी के टैंकरों , बर्बाद फसलों की क्षतिपूर्ति , सब्सिडी , मुफ़्त अनाज , तेल , चारा आदि की योजनाएँ।”

फिर एक लंबी आ भरते हुए बोले –” अब दूसरे को देख कर जलने से क्या लाभ । अपने भी दिन फिरेंगे । इंद्र भगवान ने चाहा तो अपने भी जिले में इस बार कोई ना कोई नदी उमड़कर …20-50 गाँव डुबोएगी . नहींतो …सूर्य देवता ..ज़रूर अपनी भयंकर गर्मी से सूखा पड़वाएँगे .”

वह जिस जगह पर खड़े थे …धरती की छाती गुस्से से फट रही थी।

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4-अजनबी- जैसे  हमसफ़र

नई नई शादी . नये स्वप्न. नई उमंगे . नव  दांपत्य- जीवन की अल्साई कुमुदनियों सी  सुबहें ,गुलाबी  सुरमई  शामें  और  बेशुमार रजनीगंधा सी खुशबूदार  रतजगे .

संयुक्त परिवार में ….एक लंबी सी चौड़ी  छत ….  आँगन की ओर खुलते कमरे ….रिश्तेदारों की  ताकती –झाँकती  नज़रें…..एकांत के बहुमूल्य  क्षण की तलाश में  लजाते , शरमाते  नये वर-वधू .  शोख  नयनों के इशारे… …नये नये कोड वर्ड में होती बातचीते , दबी दबी पनीली मुस्कुराहटें ….. . जीवन के  सबसे हसीन कुछ महीने ..जो दोबारा लौटकर नहीं आने वाले …. मीठी आँच का  प्रेम अलाव….जिन्हें …तापते  …दो …ठिठुरते …  जवां बदन .  चैत के मुँहचोर  चाँद को निहारते  ….शीतल  समीर के झकोरों में …कंधे पर सिर रखकर ….मधु बतियां ….महुए के मादक  फलों की  ….पतित-ध्वनियों सी कानाफूसियाँ …… . फिरदौस -ए- इश्क़ के   किवाड़ के दो पल्लों  की तरह खुलती -बंद होती ….दो हथेलीयाँ ..दो हृदय …दो रूहें.

यह सब प्रकाश बाबू को याद आ रहा हैं….विवाह के करीब 28 वर्ष बाद . वे इसे अपनी  धर्मपत्नी   , विभा  को बताते हैं..तो वह  लजा कर झिड़कती हैं और कहती  हैं…..” दैया ! अपनी उमर तो देखो….सठियाने  की  उमर में शोले दहक रहें हैं. अभी दो सप्ताह  पहले बेटे  की शादी की  है …नई बहू घर में आई हैं ….और आप ??”

प्रकाश बाबू …चिंतित स्वर में कहते हैं ,” वहीं तो मैं कह रहा  हूँ.  नई नई शादी के बाद क्या खुमारी …कैसी मदहोशियाँ और खुशियाँ रहती हैं. वह  चीज़ मैं ..आलोक और निवेदिता में …नहीं देख पा रहा हूँ.. …अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ….दोनो के बीच  क्या सब कुछ ठीक हैं??  कभी उन्हे ..आपस में  हंसते …कानाफूसी करते  , इशारे करते …नहीं देखा।”

“हां  ! यह बात मैंने  भी नोट की है। सोचा  बहू से पूछू  कि  ..कहीं उसे यहाँ कोई परेशानी  तो नहीं”  आलोक की माँ  के चेहरे पर उदासी  की लकीर खींच आई।

अगले दिन   शाम को …प्रकाश बाबू ऑफ़िस से आए ..चाय पीते हुए …अनायास ही पूछा , “ बेटे  –बहू …कहीं घूमने गए हैं  , क्या ?”

“ नहीं …वे दोनो छत पर हैं.” बिभा देवी ने कहा

प्रकाश बाबू  को अनायास क्या सूझा …अपनी पत्नी का हाथ  पकड़ा  और कहा , “ चलो छत पर चलते हैं. …ठंडी हवा में।”

“ अरे , रुको …….” वह  कहती रह गई।

ऊपर उन्होने देखा . आलोक और  निवेदिता ..दोनो झूले पर बैठे हुए हैं। ठंडी हवा बह रहीं हैं. दोनो करीब बैठे हुए हैं. मगर चुप हैं। वे दोनों अपने कानों  में इयर फोन्स लगा रखे हैं . दोनो अपने- अपने स्मार्टफोन पर लगे हुए हैं….व्हाट्सएप  और फेस बुक पर।

करीब आधे घंटे तक प्रकाश बाबू और बिभा देवी ने  दरवाजे की आड़ में खड़े खड़े देखा। बहू-बेटे  चुपचाप….आभासी दुनिया में मस्त थे. मानो …जीवन साथी नहीं …किसी रेल के दो अजनबी मुसाफिर  हो।

प्रकाश बाबू ….तेज़ी से आए और …उन दोनो का फोन छीनते  हुए कहा, “ माफ़ करना ! लेकिन यह ज़रूरी हैं…अब तुम दोनो को फोन  पूरे  एक महीने बाद मिलेगा।किसी से बात करनी हो तो लैंड -लाइन यूज  करना।”

ऊपर चमकता हुआ चाँद …थोड़ा और खूबसूरत हो गयाउ।  हवाओं  में थोड़ी  और रूमानियत  घुल गई. ऊपर आसमान पर सफेद हंसों का जोड़ा उड़ता हुआ दिखाई दिया ।

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5-मीडिया का  मुँह

अस्पताल घायलों से पटा हुआ है. सुरेंद्र सिंह का सिर जख्मी है. मोहन राठौर की नाक टूट गई है. सरफराज की एक आँख……। दिपेन कुमार की गर्दन की हड्डी….।बलबीर मीणा की बायीं टांग….।

यह सैनिक अस्पताल है। ये सेना के जवान हैं।

मीडिया का कैमरा मुँह बाँधे पत्थर बाजों के अगुवा के जनाजे को लाइव टेलीकास्ट करके “देश धर्म ” निभा रहे थे ।

सियासी चूल्हे दहक रहे थे । बयानों की रोटियाँ , मानवाधिकार के दम बिरयानी के साथ पेश किये जा रहे थे।

” भटके युवाओं के साथ सख्ती ठीक नहीं ।”

“यह सरकार का एक खास समूह को टारगेट कर रही है ।”

“यह मानवाधिकार का हनन है।”

उधर सैनिक हेड ऑफिस ने खबर जारी की । ताजा हमले में तीन जवान शहीद हो गए।

कुछ अखबारों ने एक उँगली जितनी लंबाई में औपचारिकता के रूप में यह खबर छापी. ” तीन सेना के जवान मारे गए “। उनके नाम तक नहीं दिये गए।

इधर हर अखबार और टीवी चैनल पत्थर बाजों के नेता की मौत पर टी आर पी बटोरू घडियाली आँसू बहा रहे थे. स्टोरी बनाकर छाप और दिखा रहे थे. उसका जीवन चरित का गुण गान कर उसे चे ग्वारा तक बता रहे थे।

जम्मू से लेकर जे. एन.यू तक गाढ़ा कोहरा पसरा हुआ था। उस कोहरे से आभासी प्रतिमाएँ बनाई जा रही थी। चेहरे गढे़ जा रहे थे।

तथाकथित बुद्धिजीवियों का सुखभोगी वर्ग बुढौती में यश कामना लिए देश विरोधी बयान देकर अपने मेंटल बैंकरप्सी की नुमाईश कर रहे थे।

 

6-ख़बर

गाँव के एक रिपोर्टर ने न्यूज़पेपर के एडिटर इन चीफ को फोन किया , “ सर , एक बढ़िया स्टोरी है…..जल संकट से जूझते गाँव की कुछ स्कूली लड़कियों ने पानी की हर बूँद के अधिकतम प्रयोग का एक बिल्कुल अनूठा तरीका निकाला है. अगर इसे स्टोरी बनाएँगे तो … पानी की कमी से जूझते कई इलाक़ों को फ़ायदा होगा और वे जल संरक्षण को प्रेरित होंगे।”

उधर महोदय ने फोन उठाकर रख दिया था । वे किसी और से बात कर रहे थे , “ वालिया ! इंस्टाग्राम और फेसबुक पर आजकल उस टीनेजर लड़की की हॉट तस्वीरे और वीडियो काफ़ी वायरल हैं .अगले  वीक की स्टोरी उसपर बनाना हैं. अभी से जुट जाओ।”

“कौन सी लड़की ,सर ?” वालिया ने पूछा।

“वहीं जो इस कंट्री के एक सुपर स्टार की नातिन हैं..जो कहीं विदेश में पढ़ रही हैं।”

“समझ गया।”

गाँव का रिपोर्टर ….हेलो ..हेलो …करता जा रहा था। लैंड लाइन फ़ोन का रिसीवर पेपर वेट की तरह पड़ा था ।

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-
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    -सम्पादक द्वय

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