जनवरी-2018

देशछँटनी     Posted: December 1, 2016

“कुछ रिश्ते कभी नहीं बदलते …!”

बड़े-बड़े अक्षरों में रिसेप्शन-एरिया में लिखे कम्पनी के सूक्त-वाक्य को देख वह खीझ उठा।

“झूठ है सब, छलावा….! ” बुदबुदाते हुए वह मेज़ पर पड़े उस लाल रंग के लिफ़ाफ़े को उलटने-पलटने लगा था जो उसके ऑफ़िस आने से पहले ही कोई उसकी मेज़ पर रख गया था। उस लिफ़ाफ़े को खोलने की हिम्मत नही पड़ी उसकी। उसे खूब अच्छी तरह पता था इस लाल रंग के लिफ़ाफ़े का मज़मून । छँटनी किए गए कर्मचारियों को दिया जाता रहा है यह।

‘इस कम्पनी के हर अच्छे-बुरे वक्त में साथ रहा हूँ मैं। रोहन बाबू क्या समझेंगे कि कैसे जब कम्पनी घाटे में आ गई थी, तो बड़े बाबू के साथ दिन-रात मेहनत करने वाला मैं ही तो था। सब के सब छोड़-छोड़ कर जा रहे थे और मैं यहीं रहा, अडिग। बस मेरी कम्पनी ही मेरे लिए सब कुछ थी।’ सोचते-सोचते उसका दिमाग़ भन्नाने लगा। उसने बड़ी मुश्किल से पानी का घूँट हलक से नीचे उतारा। पर अतीत था कि मुँह बाए रह-रह कर सामने आ खड़ा होता था ।

‘कर्मचारियों की छँटनी में मेरा भी नाम डाल दिया, कितने बदल गए हैं सब? कम्प्यूटर का ज्ञान न होने भर से मैं कम्पनी के लिए बेकार हो गया। पर ये भी कोई उम्र है कम्प्यूटर सीखने की? ‘

“हुँह…” बड़ी जोर से उसने सिर झटकते हुए घड़ी की तरफ़ देखा..पाँच बजने ही वाले थे।

‘काश बड़े साहब होते, तो ये सब नही होने देते..।’ सोचते हुए उसने खिड़की से बाहर झाँका।सामने क्षितिज में सूरज धीरे-धीरे डूब रहा था।ऑफ़िस में वह अपने आख़िरी दिन के लम्हे-लम्हे को जी लेना चाहता था। एक गहरी साँस के साथ अपनी सारी यादों को फेफड़ों में भरते हुए उसने आँखें मूँद लीं। तभी पास में रोहन बाबू का गम्भीर स्वर गूँजा.., “अब आप यहाँ काम नहीं करेंगे।”

चारों तरफ सन्नाटा छा गया।उसने कातर दृष्टि से इधर-उधर देखा।पूरे स्टाफ को मानो साँप सूँघ गया था।

“बल्कि….”

पूरे स्टाफ का कलेजा मुँह को आने लगा। लगभग आधा मिनट रोहन बाबू शांत खड़े रहे फिर बोले, “अब आप मेरे केबिन में मेरे साथ बैठेंगे। आखिर पापा के बाद कोई तो होना चाहिए, जो मुझे सही सलाह दे सके। पापा होते तो वे भी यही करते।” रोहन बाबू ने जैसे ही अपनी बात पूरी की, सारा ऑफ़िस तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

वह भावावेश में हाथ जोड़ता हुआ रोहन बाबू के करीब पहुँच गया। रोहन बाबू ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया। उसकी आँखों से झर-झर बहते आँसू रोहन बाबू का महँगा कोट भिगो रहे थे। उसने कस कर उन्हें अपनी बूढ़ी मगर मजबूत बाहों में जकड़ लिया।

“हाँ, मगर एक बात है! अब आपको कम्प्यूटर भी सीखना होगा ।दिस टाइम नो एक्सक्यूज !! ” कहते हुए रोहन बाबू मुस्कुरा उठे।

अपनी आँखें पोंछते हुए उसने कनखियों से खिड़की से बाहर देखा। क्षितिज में ढलता सूरज अब सिंदूरी हो उठा था ।

-0-

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-
    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine