जून-2017

देशछोटी बहू     Posted: July 1, 2015

बेटी की विदाई के समय आकाश की रुलाई फूट पड़ी और सुबकते हुए अपने समधी मनोहर लाल जी से कहा– भाई साहब, मेरी बेटी को बाकी तो सब काम आता है, पर खाना बनाना नहीं आता।
मनोहर लाल ने सहजता से कहा– कोई बात नहीं…आपने बाकी सब सिखा दिया, खाना बनाना हम सिखा देंगे।
सरस्वती के पुजारी समधी जी फूले नहीं समां रहे थे, घर में पढी-लिखी बहू जो आ गई थी। जो भी मिलता उससे कहते– भई, पाँच-पाँच बेटियाँ विदा करने के बाद घर में एक सुघड़ बेटी आई है।
उस दिन शाम का समय था। कमरे मेँ बिछे कालीन पर एक चौकी रखी थी, जिस पर चाय-नाश्ता सलीके से सजा था। ननद-देवर छोटी बहू मतलब अपनी नई भाभी को घेरे बैठे थे और इंतजार मेँ थे कि कब घर की बड़ी बहू आए औए चाय पीना शुरू हो।
कुछ मिनट बीते कि जिठानी जी धम्म से कालीन पर आकर बैठ गईं और बोली -हे राम, मैं तो बुरी तरह थक गई, मुझसे कोई उठने को न कहना। और हाँ छोटी बहू ! मुझे एक कप चाय बना दो और तुम लोग भी शुरू करो।
चाय के घूँट भरने शुरू भी नहीं हुए थे कि सबसे छोटे बेटे को ढूँढते हुए ससुर जी उस कमरे मेँ आ गए और बोले– रामकृष्ण तो यहाँ नहीं आया?
बड़ी बहू ने जल्दी से सिर पर पल्ला डाल घूँघट काढ़ लिया। छोटी बहू तुरंत खड़ी हो गई और एक कुर्सी खींचते हुए बोली– बाबू जी आप जरा बैठिए मैं आपके लिए चाय बनाती हूँ। देवर जी तो यहाँ नहीं आए ।
-न बहू, मैं जरा जल्दी मेँ हूँ। चाय रहने दे।
फिर बड़ी बहू से बोले– इंदा, मैं चाहता हूँ अब से तुम भी पर्दा न करो, नई बहू आजकल के जमाने की है। अब कोई पर्दा-सर्दा नहीं करता।
-पहले जब मैं पर्दा नहीं करना चाहती थी ;तब मुझसे पर्दा कराया गया, अब जब आदत पड़ गई तो कहा जा रहा है कि पर्दा न करो। अब तो मैं पर्दा करूँगी।
नई नवेली बहू आश्चर्य से जेठानी जी की तरफ देख रही थी– यह कैसा पर्दा! बड़ों के प्रति जरा भी शिष्टता या आदर भावना नहीं !
मनोहर लाल जी बड़ी बहू के इस रवैये से खिन्न हो उठे। उसने नई दुल्हन का भी लिहाज न किया। अपना -सा मुँह लेकर वे चले गए ।
उनके जाते ही एक वृद्धा ने कमरे मेँ प्रवेश किया।
यहाँ कोई आया था? उसने जासूस की तरह पूछा।
-हाँ! बाबू जी आए थे। जेठानी जी ने कहा।
-क्या बात कर रहे थे ?
-हाँ, बाबा जी मम्मी से कुछ कह रहे थे और चाची जी से भी बातें की थीं। चाची जी से तो बात करना सबको अच्छा लगता है। हमको भी अच्छा लगता है। वे हैं ही बहुत प्यारी-प्यारी। ऐसा कहकर बच्चे ने छोटी बहू का हाथ चूम लिया ।
-छोटी बहू, अभी तुम नई-नई हो। ससुर से बात करना ठीक नहीं। भौं टेढ़ी करते हुए वृद्धा बोली।
– यदि मुझसे कोई बात पूछे, उसका भी जबाव न दूँ ?…यह तो बड़ी अशिष्टता होगी!
दूसरे ही क्षण मेहमानों से भरे घर में हर जुबान पर एक ही बात थी–
छोटी बहू बड़ी तेज और जबानदराज है ।
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गतिविधियाँ

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