जून-2017

मेरी पसन्दजन -जन की लोकप्रिय साहित्यिक विधा- लघुकथा     Posted: July 1, 2016

मैं साहित्य की विभिन्न विधाओं – लघुकथा,कहानी ,कविता , समीक्षा , आलोचना व बालसाहित्य में अपनी अभिव्यक्ति देती हूँ , परन्तु लघुकथा की विशिष्टताओं ने मुझे इस विधा की ओर आकर्षित किया और अब यह मेरी प्रिय विधा बन गई है I सीमित कलेवर वाली इन रचनाओं में तेजी से बदल रही आर्थिक , सामाजिक व राजनैतिक परिस्थितियों का समावेश आसानी से किया जा सकता है I लघुकथा देखने में सरल लगती है , परन्तु यह एक गम्भीर विधा है , जो सम्वेदनात्मक यथार्थ को बड़ी सजीवता और मार्मिकता से अपने अंदर समाहित करती है और कई बार पाठक को इतना उद्वेलित करती है कि वह अपने जीवन की दिशा ही बदल लेता है I परन्तु बड़े ही खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि कुछ लेखक कई बार उचित कथानक न होने पर भी लघुकथा का प्रणयन करते हैं और ऐसी रचना हृदयहीन व चुटकुले का रूप धारण कर लेती हैं I तिस पर पत्र –पत्रिकाएँ ऐसे कचरे को छापती हैं , इससे लघुकथा का अहित ही होता है I लघुकथा किसी घटना की मात्र प्रस्तुति ही नहीं ; बल्कि उस घटना में छिपे हुए सम्वेदन-सूत्र को पकड़ कर विधागत विशेषताओं ( जैसे अर्थपूर्ण शीर्षक ,प्रभावी व कसा हुआ कथ्य , कथ्य की तीव्र सम्प्रेषण तथा दिशासूचक व प्रभावशाली अंत ) का ध्यान रख कर ही लिखी जानी चाहिए I दूसरी तरफ अनेकानेक वरिष्ठ व समर्पित लघुकथाकार इस विधा को ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं I वे लघुकथा के शिल्प और शैली में निरंतर बदलाव लाकर इन्हें नया रूप प्रदान कर रहे हैं और इस तरह लघुकथा को जीवंत बनाए हुए हैं I आज एक बात तो तय है कि लघुकथा नई पीढ़ी की पहली पसंद बनती जा रही है और यह बदलते समय की मांग भी है , इसलिए इसे लोकप्रिय व जन –जन की प्रिय विधा बनने से कोई नहीं रोक सकता I मेरी पसंद की दो लघुकथाएँ मैं यहाँ देना चाहूँगी , ये हैं –प्रो . रूप देवगुण की ‘जगमगाहट’ व डॉ .छवि निगम की ‘लिहाफ I’ दोनों में पुरुष और नारी सम्बन्धों के दो रूप दिखाई पड़ते हैं। दोनों लघुकथाओं में इसकी पड़ताल की गई है।

आज चहूँ ओर बलात्कार व कार्यालयों में यौन –शोषण की घटनाओं में वृद्धि हुई है I ऐसे समय में रूप देवगुण की लघुकथा ‘ जगमगाहट ’ एक सुखद आश्वस्ति प्रदान करती है I लघुकथा में आर्थिक तंगी के चलते युवा लड़की का नौकरी करना मजबूरी थी ,परन्तु बॉस की वासनात्मक दृष्टि के कारण उसे कई जगह नौकरी छोड़नी पड़ी I एक नये दफ़्तर में पिछले अनुभव के आधार पर वह सतर्कता से काम लेती है I अगले ही दिन जब बॉस उसे पीछे वाले कमरे में अपने साथ फाइलें ढूँढने का आदेश देता है, तो वह आशंकित हो उठती है और मन ही मन फैसला करती है कि अबकी बार वह नौकरी नहीं छोड़ेगी ;बल्कि मजबूती से बॉस का सामना करेगी I अचानक लाइट के चले जाने पर वह भयभीत हो उठती है I ऐसे में अप्रत्यक्ष रूप से बॉस का सम्बोधन , “देखो , तुम्हें अँधेरा अच्छा नहीं लगता होगा I तुम्हारी भाभी ( बॉस की पत्नी ) को भी अच्छा नहीं लगता I जाओ , तुम बाहर चली जाओ I ” उसे लगा , जैसे कमरे में हज़ार-हज़ार पावर के कई बल्ब जगमगा उठे I यह लघुकथा आज के माहौल में मुझे उस खुशबू की तरह लगती है जो तपती धरती पर बारिश की चंद बूँदे पड़ने के बाद उठती है I यह लघुकथा लगभग सन 1990  में लिखी गई है, परन्तु आज भी उतनी ही प्रासंगिक है I इस प्रकार की लघुकथाएँ कालजयी श्रेणी में आती हैं I लघुकथा में लघुकथा के मानदंडों का भली-भाँति निर्वहन हुआ है –यथा प्रतीकात्मक शीर्षक ,सुगठित कथानक , तीव्र सम्प्रेषण व सकारात्मक, सार्थक संदेश I

एक नये और सम्वेदनशील विषय को लेकर लिखी गई डॉ. छवि निगम की लघुकथा ‘ लिहाफ ’ ने मेरे मन को गहरे में उद्वेलित किया है I पूर्व में और आज के समय में भी रिश्ते किस प्रकार प्रदूषित होते जा रहे हैं , सगे –सम्बन्धियों पर से विश्वास डगमगा गया है यह किसी से छुपा नहीं है I छोटी बच्चियों को घर में छुपे भेड़ियों से कैसे बचाया जाए ? यह सचमुच चिंता का विषय है I लघुकथा में नायिका रीना के बचपन की कुछ कटु स्मृतियाँ नासूर बन कर उसके अवचेतन मन में इस कदर गहरे पैठ गई हैं कि शादी के दस साल बाद भी समकक्ष स्थिति को सामने पाते ही उसके घाव हरे हो जाते हैं I महीन बुनावट की इस लघुकथा में स्त्री पीड़ा की मार्मिक अभिव्यक्ति है I अपने चाचा के आने की खबर से रीना मानसिक रूप से परेशान हो उठती है I दूसरी तरफ कामवाली बाई राधा उससे पुराने कम्बल की माँग करती है I उसके मना करने पर वह कहती कि कोई बात नहीं बच्चों के चाचा गाँव से आ रहे हैं, वो अपना बिस्तर भी साथ लाएँगे, वह अपनी बिटिया को उसके साथ सुला देगी I यह सुन रीना का तन –बदन सुलगने लगता है I नया लिहाफ राधा को थमाते हुए वह कहती है, “ले राधा , ले जा इसे  ये सिर्फ तेरी बिटिया के लिए है हमेशा वह इसी में सोएगी ….और अकेले , ये कुछ न भी कह पाए , तो भी इसके इशारे समझो और खबरदार , जो इसे कभी किसी मामा , दादा , चाचा के साथ ….” जैसे लिहाफ न हुआ वह उसका सुरक्षा कवच हो गया I पात्रानुकूल भाषा के प्रयोग से लघुकथा की स्वाभिकता व विश्वसनीयता को बल मिला है I सांकेतिक शीर्षक बहुत कुछ कहता नजर आता है I

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1-जगमगाहट-रूप देवगुण

वह दो बार नौकरी छोड़ चुकी थी I कारण एक ही था –बॉस की वासनात्मक दृष्टि I किन्तु उसका नौकरी करना उसकी मजबूरी थी I घर की आर्थिक दशा शोचनीय थी I आख़िर उसने एक अन्य दफ़्तर में नौकरी कर ली I

पहले दिन ही उसे उसके बॉस ने अपने कैबिन में काफी देर तक बिठाए रखा और इधर –उधर की बातें करता रहा I अबकी बार उसने सोच लिया था , वह नौकरी नहीं छोड़ेगी , वह मुकाबला करेगी I उसी दिन दोपहर बाद बॉस ने उसे अपने साथ अकेले में उस कमरे में जाने के लिए कहा,जहाँ पुरानी फाइलें पड़ी थीं I उन्हें उन फाइलों की चैकिंग करनी थी  I उसे साफ लग रहा था कि आज उसके साथ कुछ गड़बड होगी I

एक बार तो उसके मन में आया कि कह दे कि मैं नहीं जा सकती I किन्तु नौकरी का ख्याल रखते हुए वह इंकार न कर सकी I कुछ देर में ही वह तीन कमरे पार कर चौथे कमरे में थी I वह और बॉस फाइलों की चैकिंग करने लगे I उसे लगा जैसे उसका बॉस फाइलों की आड़ में केवल उसे ही घूरे जा रहा है I उसने सोच लिया था कि ज्यों ही वह उसे छूएगा वह शोर मचा देगी I दस पन्द्रह मिनट हो गये , लेकिन बॉस की ओर से कोई हरकत न हुई I

अचानक बिजली गुल हो गई I यह बॉस की ही साजिश हो सकती है – यह सोचते ही वह कांपने लगी I लेकिन तभी उसने सुना , बॉस हँसते-हँसते कह रहा था , “ देखो , तुम्हें अँधेरा अच्छा नहीं लगता होगा I तुम्हारी भाभी ( बॉस की पत्नी ) को भी अच्छा नहीं लगता I जाओ , तुम बाहर चली जाओ I ” इस अप्रत्याशित बात को सुन कर वह हैरान रह गई I बॉस की पत्नी  , मेरी भाभी यानी मैं बॉस की बहिन I

सहसा उसे लगा , जैसे कमरे में हज़ार-हज़ार पावर के कई बल्ब जगमगा उठे I

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2-लिहाफ़ –डॉ छवि निगम

इतने सालों के साथ के बाद इतना तो मैं समझ सकता था कि कोई तो बात जरूर है कि कभी कभी रीना अपनी किसी ख्याली दुनिया में अक्सर गुम हो जाती है। हाँ, वैसे शिकायत नहीं कोई मुझे उससे। पर कभी- कभी महसूस होता है कि दस साल की शादी के बाद भी ,कहीं कुछ तो था- एक इन्विज़िबल -सा गैप जो हमें अच्छे दोस्त बनने से रोकता- सा रहा था।

आज फिर लेटे- लेते यही ख्याल आ रहा था।

“सुनिए,एक बात कहनी थी आपसे-बालों में कंघा फिराते वह बोली।

नींद को बमुश्किल अपने से दूर करते,लिहाफ के एक कोने से मुँह निकाल मैंने पूछा “हाँ कहो,क्या हुआ?

“वो दिन में चाचाजी का फोन आया था…कुछ दिनों में यहाँ आने की बात कर रहे थे…”

“अरे लो ,आज तुम आज इसी सोच में डूबी हुई थी क्या ?…अच्छा है। पर तुम तो महान हो सच्ची। मायके से कोई आए, तो औरतें कितनी खुश हो जाया करती हैं। पर एक तुम हो। शाम से ही कितना अजीब बिहेव कर रही हो। ये चाचाजी तो पहले भी तुम्हारे घर काफी आया जाया करते थे न। बढ़िया है।चलो आओ…लाइट ऑफ कर दो। ”

लेकिन क्या इतनी -सी ही बात थी बस?फिर रीना सारी रात करवटें क्यों बदलती रही थी।

“ओहो राधा!बिटिया को क्यों ले आई हो साथ में? इसे स्कूल भेजा कर न। इतना समझाती हूँ ,तुझे पर समझ ही नहीं आता।”रीना की आवाज़ ने मुझे सन्डे सुबह सुबह जगा दिया। और मैं रजाई में दुबके- दुबके गर्म चाय के कप का इंतज़ार करते ,उनकी बातचीत सुनने लगा।

“अरे दीदी!बस ऐसे ही हमरे पाछे चली आत है।”

“मुझे सब पता है। ऐसे ही धीरे धीरे पूरे काम बच्चियों के सर डाल देते हो तुम लोग।”

“कुछ नईं होगा दीदी वाको ।”

” अच्छा अच्छा ये पिंकू का पुराना स्वेटर इसे पहना दो तो पहले।चलो दोनों जने भी चाय पी लो।”

“स्ब्ब्बे कोठियाँन वाली में आप ही सबसे नीक हो दीदी। सुनो कोई पुराना- उराना कम्बल।।सूटर,साल वाल हमरे वास्ते भी पड़ी हो तो …”

चाय सुडकते मुझे हँसी आ गई।

“बस हो गया तुम्हारा माँगना शुरू!पुरानी चीजें हम रखते ही कहाँ है बता तो। और इस समय तो तुम्हे पैसे भी नहीं दे पाएँगे…

“अरे क्कोनो बात नाही ।जाड़ा कट ही जाई जाईसे तैसे। असल में एक रजाई तो बा हमरे पासे। पार साल तक बिट्टी,हम,ई और मुन्ना तो ओमे ही दुबक जाइत थे। परे बिट्टी अब न आ पहिये।ऊपर से गाँव से रिश्ते के चाचा आई के चाह रहे हैं न कछु काम ढून्ढहे खातिर…तो हम सोचे रहे…”

“तो अब क्या करेगी?

अरे ऊ च्चाचा आपन बिस्तर उस्तर भी तो लाइ न। इत्तना जाडा म्में का ऐसे ही आ जाई ?सो ई बिटिया को हम ओके साथ ही पौढा देब। ठीक बा न बिटिया?

दीदी?…दीदी…दीदी…का हुआ? भैय्याजी जल्दी इधर आओ तो…जल्दी,देखो दीदी को का हुई गवा ।”राधा बौखलाई सी जोर से चिल्ला रही थी।

मैं लिहाफ फेंक लम्बे डग भरता रसोई की तरफ दौड़ पड़ा।और भौंचक्का रह गया। ये रीना ही थी या कोई और?उसकी तो पूरी की पूरी भावभंगिमा ही बदल गयी थी। चेहरा बुरी तरह तमतमाया हुआ था, होंठ काँप रहे थे। तना हुआ बदन अजीब तरह से थरथरा रहा था। आँखों में आँसू छलक आये थे।”क्या हुआ रीना?मैंने बेहद घबराते हुए पूछा। पर उसने मेरा हाथ झटक दिया।

“जाइये,वो जो नया लिहाफ बनकर आया है उसे ले आइये।”

इतनी सर्द आवाज़ थी उसकी ,कि क्यों , किसलिए वगैरह पूछने की हिम्मत नहीं हुई मेरी। चुपचाप लाकर उसके सामने रख दी।

“ले राधा,ले जा इसे। ये सिर्फ तेरी बिटिया के लिए है। हमेशा वह इसी में सोएगी और अकेले। और तुम जो दिन भर मुन्ना -मुन्ना करती रहती हो,ध्यान इसका भी रखा करो। ये कुछ न भी कह पाए,तो भी इसके इशारे समझो।और खबरदार!!जो इसे कब्भी किसी मामा,दादा चाचा के साथ।”

और कटे तने सी रीना कुर्सी पर ढह गयी।अब वह अवश सी ।।हिचकियों से रोये जा रही थी। कभी उसकी पीठ, तो कभी सर सहलाते हुए मैं सोच रहा था।। इस समय दिल का भारी बोझ उतर जाने से कौन ज्यादा सुकून महसूस कर रहा है।राधा, रीना या मैं?

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डॉ . शील कौशिक , मेजर हाउस- 17 ,सेक्टर – 20  सिरसा – 125055  ( हरियाणा ) ,मोबाइल- 9416847107

 

 

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

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    सुकेश साहनी

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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