जून-2017

देशजब तक कविता बाकी है     Posted: January 2, 2015

जब तक कविता बाक़ी है हद से ज़्यादा तकलीफ़देह हवा है-जलती, चुभती, उमस से दम घोंटती।
जून के बे-बरसे दिन हैं। ठेले पर जूते-चप्पल बेचने वाला अपने दस साला नौकर अशोक के साथ चौड़ी-तपती सड़कों पर फेरी लगा रहा है। आवाज़ें लगाने और ठेले को ढोने का काम नौकर बच्चे का है -इसके आने से बिक्री बढ़ी है; ग्राहक छोटे बच्चे पर दया कर कम-से-कम देखते तो हैं, कभी कुछ ख़रीद भी लेते हैं।
‘‘जूते ही जूते, मुफ़्त के भाव जूते!… चप्पल ही चप्पल, मुफ़्त के भाव चप्पल!’’
अशोक को अपने पेट के भीतर बड़ी ज़ोर की भूख़ लग रही है-पेट दर्द की हद तक की भूख़! हर दिन सबेरे अम्मा दिहाड़ी पर निकलने से पहले कितनी मनुहार करती हैं,‘‘लल्ला, और एक गक्कड़ डाल ले पेट में! दिन भर काम में जुतना है मौड़ा!’’
अम्मा की आवाज़ में बापू के लिए एक अव्यक्त घृणा होती है, …हम भी मज़दूरी करें, हमारा तनिक-सा बच्चा भी!
बापू पश्चातापी अपराधी की तरह उसके सिर पर हाथ फेरते हैं,‘‘बस, इस बरस और! अगली साल तक इतने पैसे जुड़ जाएँगे कि हमें अपना घर-गाँव छोड़ मज़दूरी को इस देश नहीं आना पड़ेगा; फिर लल्ला का स्कूल में दाख़िला कराएँगे; बाबू साहेब बनकर स्कूल जाना, गिटिर पिटिर अंग्रेज़ी बोलना, दूध-बिस्कुट खाना!’’
बापू कविता करने लगते हैं…पर दूध-बिस्कुट पिछले तीन सालों से सिर्फ़ कविताओं में ही है!अब आसमान से धीरे-धीरे धूप ग़ायब हो चली थी; काले बादल कहीं से दौड़े चले आ रहे हैं। हाँफते अशोक को अपने गाँव के धूल भरे दौड़-खेल याद आ रहे हैं। मालिक ने कोंचा; वो फिर आवाज़ें देने लगा,‘‘जूते ही जूते, मुफ़्त के भाव जूते! …चप्पल ही चप्पल, मुफ़्त के भाव चप्पल!’’
अचानक ज़ोर-ज़ोर से बारिश होने लगी। मालिक-नौकर तेज़ी से यहाँ-वहाँ सिर छुपाने की जगह तलाश करते हुए अंततः एक घने पेड़ के तले आ गये। पान-गुमटी के छप्पर तले आता ठेला-मालिक बोला,
‘‘एक पान लगा दियो, जाफ़रानी डालके।’’
इधर पान लग रहा है, उधर ठेले के पास खड़ा नौकर लड़का सोच रहा है अगर डिब्बा खोलकर एक गक्कड़ खा लूँ तो  बेपूछे खायेगा तो गक्कड़ के कौरों के बराबर थप्पड़ भी तय रहे मालिक के; और पूछे तो पूछे कैसे! अभी तो एक ही जोड़ी चप्पल बिकी है, जब तक चार-छह नग न बिक जाएँ, मालिक मुस्कुराता नहीं है। पान लेकर ठेला-मालिक ने जब मूल्य चुकता करने को नोट दिया तो दुकानदार ने फेर दिया; नोट फटा था।
‘‘उस बिल्डिंग वाली ने चप्पलें ख़रीदी थीं अभी, उसी का दिया नोट है! अशोक, तू दौड़कर जा और ये नोट बदल ला उससे।’’
अशोक दौड़ गया -मूसलाधार बारिश में।
उसकी फटी शर्ट, हाफ पैंट और घिसी चप्पलें छप-छप कर हिलोरें-सी लेती हैं …गाँव की बारिश याद आती है; पानी के मटमैले, मिट्टी घुले गड्ढों-तलैयों में छप-छप-छपाक!
-उसका वश चले तो ये दौड़ गाँव तक पहुँचकर पूरी करे ण्ण्ण्पर अम्मा कहती हैं, वहाँ खाएँगे क्या? सब योजनाओं का पैसा सरपंच-सचिव खा जाते हैं! हम शहर से ही इत्ता रुपया जोड़कर चलेंगे एक दिन।
-पर वो दिन जैसे कभी नहीं आयेगा, दस साल के अशोक का दिल डरता है; अम्मा कहती हैं, बाज़ार में पच्चीस रुपये किलो आटा है, सौ रुपया लीटर तेल, बीस रुपये किलो आलू -राशन की दुकान पर सब कूड़ा मिलता है; बीमार कर देने वाला राशन -बाज़ार से ख़रीदकर खाएँ तो बचाएँ क्या और कब तक? अम्मा की बातें सुनकर उसका दिल बापू की उम्मीद-कविता दोहराता है।
-बाबू साहेब बनकर स्कूल जाना, गिटिर पिटिर अंग्रेज़ी बोलना, दूध-बिस्कुट खाना!
अशोक उस बिल्डिंग तक आ पहुँचा। मेमसाहब चार-छह आवाज़ों में बाहर आ भी गई।
‘‘क्या कहा तूने? शर्म नहीं आती, मुझ पर इल्ज़ाम लगाता है! मैंने बिल्कुल सही नोट दिया था। चल भाग यहाँ से! आ गया अपना फटा नोट मेरे मत्थे मढ़ने! ’’
बड़बड़ाती अमीर औरत ने बड़ी जल्दी दरवाज़ा बंद कर लिया। वो कुछ देर बारिश में नहाता किंकत्तर्व्यमूढ़ खड़ा रहा; फिर थका-थका-सा भागता लौट आया।
मालिक उसकी सूरत देखते ही सब जान गया,तड़ाक! -थप्पड़ इतना झन्नाटेदार था कि नौकर बच्चा गिरते-गिरते बचा,‘‘नहीं बदला ना उसने नोट! क्यों वे, जब वो मुझे नोट दे रही थी, तब क्या तेरी आँखें फूट गई थीं! मैंने तुझे इन मक्कारियों के लिए नहीं रखा है! तेरी पगार में से काटूँगा ये पचास रुपये!’’
निरीह-नर्म गाल पर हिंसा की सुर्खी उतर आई; आसमान का बरसना एकाएक बंद हो गया। अभी उसे अपने आँसू रोकने हैं; अपमान पी जाना है। …ओ नन्हे नीलकंठ! ‘‘जूते ही जूते, मुफ़्त के भाव जूते !…चप्पल ही चप्पल, मुफ़्त के भाव चप्पल!’’
ठेलेवाले अपने मालिक के साथ नौकर बच्चा फिर सड़क पर है। झोंके-सी आकर बीत गई बरसात के पीछे से, पैनी उमस-धूप चारों ओर फैल गई है।
अशोक का दिल बापू की उम्मीद-कविता दोहरा रहा है,-बाबू साहेब बनकर स्कूल जाना, गिटिर पिटिर अंग्रेज़ी बोलना, दूध-बिस्कुट खाना!
…हद से ज़्यादा तकलीफ़देह हवा है!

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