जनवरी-2018

देशजिंदादिली     Posted: January 2, 2017

कई बार आउट हाऊस से रात को गुनगुनाने की आवाज़ आती। सोचा, अपनी बाई से पूछूँगी कि आखिर उसके घर में गवैया कौन बन गया है! लेकिन सुबह होते नाना विध कामों में ऐसी उलझती कि पूछना भूल mala-vermaजाती। कुछ दिन निकल गए। फिर एक दिन, करीब हफ़्ते-दस दिन के अंतराल पर गाने की आवाज़ फिर आई, और गाना भी क्या- ‘हम काले हैं तो क्या हुआ दिल वाले हैं….’
सुबह जैसे ही बाई घर में घुसी, मैंने तुरंत प्रश्न पूछा- ‘अच्छा बताओ तो सही, ये जब-तब गीत कौन गाता है? क्या तुम्हारे बच्चे या पति!’
उसने सिर झुकाये जवाब दिया- फ्मैंने कितनी बार पति को समझाया कि गाने की आवाज़ हल्की रखो, साहब-मेम साहब को डिस्टर्ब होगा पर वो सुनता ही नहीं। मैं उसे बुलाकर लाऊँगी, आप थोड़ा डाँट देना, उसके बाद वो ठीक रहेगा….’
‘अरे, डिस्टर्ब होने वाली ऐसी कोई बात नहीं, गीत तो वो अच्छा गा लेता है पर हफ़्ता दस दिन में कभी-कभार सुनने को मिलता है। अगर गाने का इतना ही शौक है तो रोज़ाना रियाज़ करे।’
‘नहीं मेम साहब! गरीब लोग गाना बजाना क्या करेंगे। जिस दिन उसे कोई काम नहीं मिलता, अपना दुख छिपाने वास्ते वो गुनगुनाता है ताकि बच्चों को ये न पता चले- आज उनके पिता की जेब खाली रह गई….’
आश्चर्य! एक साधारण अनपढ़ दिहाड़ी मज़दूर इतना सकारात्मक विचार रखता है?
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