अप्रैल-2018

मेरी पसन्दजिन्हें विस्मृत कर पाना संभव नहीं     Posted: May 1, 2015

मैं साहित्य की जिन विधाओं को बहुत पसंद करता हूँ उनमें ‘लघुकथा’ निश्चित रूप से पांक्तेय है। कारण मात्रा उसका लघु आकार होना नहीं है, श्रेण्य हो तो मोटे–मोटे उपन्यास पढ़ने से भी मुझे परहेज नहीं, उन्हें भी पढ़ने का समय मैं निकाल लेता हूँ। लघुकथा को पसंद करने की बड़ी वजह यह है कि यह पाठक को घुमाती–पिफराती नहीं, सीधा अपने कथानक की प्रकृति के अनुसार सटीक भाषा–शैली एवं प्रतिपादन के मायम से अपने गंतव्य पर पहुँचकर वांछित प्रभाव छोड़ने में सफलता प्राप्त करती है। वांछित प्रभाव से तात्पर्य कि संवेदनापरक ढंग से पाठक को कहीं भीतर तक जाकर भिगो देती है या फिर कथानक की अनुकूलता को देखते हुए उसे संघर्ष करने हेतु उत्तेजित एवं प्रोत्साहित भी करती है। वस्तुत: यह लघुकथा के विषय एवं प्रकृति पर निर्भर करता है।
आरोह–अवरोह का संपादक होने के नाते प्रत्येक माह अनेक–अनेक लघुकथाएँ नज़रों से गुज़रती हैं। इसके अतिरिक्त पटना जैसे शहर में रहने के कारण जहाँ का वातावरण ही लघुकथामय है, अत: यहाँ प्रत्येक वर्ष अखिल भारतीय स्तर के लघुकथा सम्मेलन होते हैं, जिनमें दर्जनों लघुकथाएँ एवं उन पर टिप्पणियाँ सुनने को मिलती हैं। यों भी प्राय: प्रत्येक माह लघुकथा पर केन्ति विभिन्न संस्थाओं द्वारा गोष्ठियों का आयोजन होता रहता है। समय मिलने पर उनमें भी भाग लेता हूँ । लघुकथाएँ सुनता हूँ तथा इस विाा पर विद्वानों के विचारों को यान से सुनता हूँ, अपनी समझ के अनुसार सहमति–असहमति प्रकट करते हुए अपनी बेबाक राय भी साझा करता हूँ । लघुकथाओं का एक गंभीर पाठक होने के नाते अब तक हज़ारों लघुकथाएँ पढ़ने में आईंं, उनमें से अनेक–अनेक ऐसी लघुकथाएँ भी आयीं, जिन्होंने मुझे कई–कई बार पढ़ने हेतु विवश किया । उनमें से भी कुछ तो ऐसी हैं जिन्हें विस्मृत कर पाना मेरे लिए शायद कभी भी संभव नहीं होगा । उनमें दो लघुकथाएँ जो सदैव मेरे हृदय में बसी रहती हैं, उनमें पहली लघुकथा चर्चित लघुकथाकार डॉ सतीशराज पुष्करणा की ‘आत्मिक बंधन’ है तो दूसरी इन्दौर की अन्तरा करवड़े की ‘सुहानी सुबह’ है।
ये दोनों लघुकथाएँ ही एक–से बढ़कर एक हैं। दोनों ही संवेदनाओं से लबालब हैं और पढ़ते–पढ़ते कहीं भीतर से मन भींग–भींग जाता है।
पहले डॉ सतीशराज पुष्करणा की लघुकथा ‘आत्मिक बंधन’ की बात करूँ तो पहली बार देखते ही ऐसा लगता है एक साधरण–सी बात है जो कई–कई मामलों में पति–पत्नी के प्यार की गहराइयों को स्पष्ट करती है, किन्तु पुष्करणा जी ने सााारण–सी बात पर एक असाधरण लघुकथा लिख दी । बात यों है कि सर्दी के दिन हैं, दोनों पति–पत्नी अकेले हैं, दोनों की अपनी–अपनी रजाई है किन्तु कम्बल एक ही हैं। ठंड दोनों को लग रही है मगर एक–दूसरे के प्रति स्नेह ऐसा कि पति चाहता है कंबल पत्नी ले ले और पत्नी चाहती है कि कम्बल पति ले ले ।
अंतत: पत्नी विजयी होती है। पत्नी के सो जाने पर पति–पत्नी पर कंबल डालकर इत्मीनान से सो जाता है, मगर जब वह सवेेरे उठता है तो कम्बल को अपने ऊपर पाता है, क्या बेजोड़ लघुकथा है ! जैसा प्यारा इसका कथानक, वैसा ही प्यारा इसका प्रतिपादन। संवाद एकदम ऐसे स्वाभाविक जो प्रेमी पति–पत्नी के मय प्राय: सुने जाते हैं। ऐसी सहज स्वाभाविक लघुकथा स्वत: विकास करते हुए अपने गंतव्य तक पहुँचकर पाठकों के हृदय को गीला कर जाती है । यानी संवेदना के स्तर पर भिगो जाती है। प्रत्येक दृष्टिकोण से यह लघुकथा श्रेष्ठ है एवं मेरे हृदय के बहुत निकट है।
दूसरी लघुकथा अन्तरा करवड़े की ‘सुहानी सुबह’ भी डॉ पुष्करणा की ‘आत्मिक बंधन’ की तरह ही संवेदनापरक है; परन्तु दोनों लघुकथाएँ संवेदना के स्तर पर एक होते हुए भी आपस में नितान्त भिन्न हैं। ईमानदारी से कहूँ लघुकथा की चर्चा में अन्तरा करवड़े का नाम मैंने कभी नहीं सुना । यह लघुकथा मैंने एक बार दैनिक समाचार–पत्रा में ही पढ़ी, तो फिर अनेकबार पढ़ी । उसकी कटिंग आज भी मेरे पास मौजूद है।
‘सुहानी सुबह’ नायक के हृदय परिवर्तन की कथा है कि एक गुस्सैल बॉस जब अपनी माँ की तेरहवीं से ऑफ़िस लौटता है तो अनपेक्षित रूप से बदला हुआ मानवता से लबालब व्यक्ति होता है।
उसकी असिस्टेण्ट मैनेजर अपने बच्चे की तबीयत खराब होने पर बॉस से छुट्टी माँगती है ,जो न मात्र सहजता से उसे छुट्टी दे देता है, अपितु उसे अग्रिम राशि भी दिलवा देता है। जब उसका कमर्शियल मैनेजर उसे टटोलना चाहता है –‘सर, मीता को एकदम तीन दिन की छुट्टी दे दी, वो असिस्टेण्ट मैनेजर की जिम्मेदारी पर है।’ तो बॉस उत्तर देता है – ‘वो माँ भी है ना।’
मैनेजर ने चौंककर कर देखा, यह कोमल स्वर उनके गुस्सैल बॉस का ही था और वे एकटक फ्रेम में जड़ी अपनी दिवंगत माँ की वात्सल्य भरी मुस्कान को ताके जा रहे थे ।
ये दोनों लघुकथाएँ मानव के मानव होने पर बल देती हैं। कोई भी व्यक्ति सदैव बुरा नहीं होता, समय आने पर हालात उसे बदल देते हैं, कभी–कभी तो इतना बदल देते हैं कि सहजता से यह विश्वास ही नहीं होता कि यह वही व्यक्ति है।
मैं समझता हूँ कि मेरी पसंद शायद अन्य पाठकों एवं दर्शकों की भी पसंद बनेगी तो प्रस्तुत है क्रमश: दोनों ही लघुकथाएँ–

1-आत्मिक बन्धन
डॉ सतीशराज पुष्करणा

लगभग पूरे उत्तर एवं पूर्व भारत में ऐसी शीत–लहर चल रही थी कि नगरों में जगह–जगह अलाव जलते दिखाई देने लगे थे। हाड़ कँपाने वाले मौसम में योगेश्वर बाबू और उनकी पत्नी इस बुढ़ापे को कोस रहे थे। सर्दी और बुढ़ापे में जैसे छत्तीस का सम्बन्ध् है। उस पर गरीबी जलते में घी का काम कर रही थी। घर में ये दोनों ही थे। सब बच्चे अपनी–अपनी दुनिया में अलग रह रहे थे।
रात जैसे–जैसे गहराती जा रही थी, ठण्ड की ठिठुरन वैसे–वैसे बढ़ती जा रही थी। दोनों पति–पत्नी अलग–अलग अपने बारे में सोच रहे थे कि एक–एक रजाई के अतिरिक्त एक ही कम्बल फालतू है। किन्तु इस कारण सर्दी में इसे फालतू तो नहीं कहा जा सकता, बल्कि एक कम्बल की और आवश्यकता है। ऐसे में क्या किया जाए? दोनों में से कोई एक व्यक्ति ही उस कम्बल का उपयोग कर सकता है,? दूसरे को बर्दाश्त करना होगा ।
पत्नी के दिल में भारतीय नारी का दायित्व जाग उठा, सो उसने वह कम्बल पति की रजाई के ऊपर ओढ़ा दिया । पति ने कहा, ‘अरी भाग्यवान! यह क्या कर रही हो! मुझे इतने बोझ के नीचे दबाकर मार डालोगी क्या ? तुम औरत हो, तुम्हारा शरीर कमजोर है, तुम अपने ऊपर ओढ़ लो।’
‘आप तो बस यों ही चिल्लाते हो । चुपचाप लेटे रहो । सर्दी लग गई तो ? आपफत तो मेरी जान को ही होगी न !’
‘तुम बात को समझती क्यों नहीं ?’
‘कहा ना, अब चुपचाप पड़े रहो । बुढ़ापे में तुम कुछ ज्यादा ही बोलने लगे हो।’
योगेश्वर बाबू ने समझ लिया कि जिद्दी पत्नी नहीं मानेगी । वह स्वयं में बर्दाश्त कर सकती है; पर उन्हें कष्ट हो यह श्रीमतीजी को बर्दाश्त नहीं। पत्नी के स्नेह पर उन्हें गर्व हो आया और वह यह कहते हुए, ‘जैसी तुम्हारी इच्छा….’चुपचाप लेटे रहे।
पत्नी इत्मीनान से अपने बिछावन में उकड़ूँ होकर लेट गई और कुछ देर में सो भी गई। वह धीरे–से उठा और अपनी रजाई से कम्बल उतारकर बहुत धीरे–से पत्नी के ऊपर ओढ़ा दिया। अब पत्नी का चेहरा देखकर उन्हें सन्तोष हुआ कि अब उसे जाड़ा नहीं लग रहा है और स्वयं पुन: अपने बिछावन में आकर सो गए ।
सुबह जब आँख खुली तो देखा, कम्बल पुन: उनकी रजाई के ऊपर था ।
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2-सुहानी सुबह
अन्तरा करवड़े

गुस्सैल बॉस अपनी माँ की तेरहवीं के बाद पहली बार ऑफ़िस आए थे। पिछले दिनों सहज हो चला ऑफ़िस, सुबह–सुबह फिर पाबन्दियों के चौखट पर जाने की अनिच्छा से तैयारी कर रहा था। तभी मीता के घर से फोन आया। उसके बच्चे की तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी। लेकिन बॉस के केबिन में जाकर छुट्टी माँगना यानी दिन खराब करना । फिर भी सभी ने ठेलकर उसे भेजा । कोशिश करने में क्या हर्ज है ! सभी साँस रोके किसी तूफान की प्रतीक्षा करने लगे ।
आश्चर्य मीता की न केवल तीन दिन की छुट्टी मंजूर हुई, उसे कुछ रुपया भी अग्रिम मिल गया। खुशी और चिन्ता के मिले–जुले भाव लेकर वो झटपट ऑफ़िस से विदा हुई ।
फिर कमर्शियल मैनेजर ने किसी काम के बहाने बॉस को टटोलना चाहा ।
‘सर, मीता को एकदम तीन दिन की छुट्टी दे दी, वो असिस्टेण्ट मैनेजर की जिम्मेदारी पर है।’
‘वो एक माँ भी है ना !’
मैनेजर ने चौंककर देखा, ये कोमल स्वर उनके गुस्सैल बॉस का ही था और वे एकटक फ्रेम में जड़ी अपनी दिवंगत माँ की वात्सल्य–भरी मुस्कान को ताके जा रहे थे ।
केविन की खिड़की से रोज़ाना दिखता पीला सूरज आज कुछ ज्यादा चमकीला था ।
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डॉ.शंकर प्रसाद,संपादक ‘आरोह–अवरोह’ (मासिक)
काशीनाथ लेन, पश्चिमी लोहानीपुर,पटना–800003
ईमेल-aarohawroh@gmail.com

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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