अगस्त-2017

अध्ययन -कक्षजोगिन्दर पाल की लघुकथाएँ     Posted: January 1, 2016

लघुकथा न्यूनतम शब्दों में किसी एक कथा–बिम्ब को अभियक्त करने की विधा है। आज की लघुकथा की प्रकृति भौतिक है, जो सीधे यथार्थ जीवन और जगत से जुड़ा है। लघुकथा सामाजिक विसंगतियों पर कुठाराघात करनेवाली विधा है। इसलिए अधिकतर लघुकथाकारों की लघुकथाओं में आक्रमणकारी आक्रोश है।
साहित्य की यह विधा आक्रमणकारी विधा है। समाज की मूकदर्शक नहीं है। वस्तुत: लघुकथा विधा आम आदमी से जुड़ी विधा है। लघुकथा के आवश्यक तत्त्व जैसे–एक घटना,लघुता, कथानक का कसाव और मारक व प्रभावशाली अन्त। शीर्षक, भाषा एवं पात्रों के अनुसार संवाद। उपयु‍र्क्त सारी बातें उदू‍र् रचनाकार जोगिन्दर पाल जी की रचनाओं में दिखती है। यहाँ पर उनकी उर्दू में लिखित एवं हिन्दी में अनूदित लघुकथाएँ हैं, यथा–कौन,कारगिल, सजा, जागीरदार, मशवरा,जनसमुदाय, हीरो, प्रेत, अविश्वसनीय, भूतलोक एवं एक–एक।
श्री जोगिन्दर पाल जी की समीक्ष्य पहली लघुकथा है–‘कौन’। अपनापन अपने र, बच्चों और देश से हर इन्सान का होता है। इसी भव को दर्शाया गया है; लेकिन इस लघुकथा में कई सवाल खड़े हो जाते हैं। यथा–घर–देश छोड़ने का कारण नहीं है, 50–55 वर्ष पहले जिसे छोड़कर आया है उसे ‘मासूम’ शब्द से सम्बोधन उचित नहीं जान पड़ता ; क्योंकि इतने वर्षों का व्यक्ति स्वयं बुढ़ापे की स्थिति में होता है। ‘जादुई दरवाजा एकदम खुला है’–यह तिलिस्मी कहानी में होता है। अगर ऐसा है तो फिर ‘बाजी हासिल करने में कामयाब होना’ मानवीय क्रिया है। जबकि ‘अपना पाकिस्तान’ का वो पुराना घर’ देखने की ख्वाहिश 1947 में बेटे हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दो देशों का काल है।
‘‘कौन’ शीर्षक सही है ; क्योंकि ‘आगन्तुक’ को पचपन वर्षीय (बेटा)व्यक्ति पहचानता ही नहीं। भले आगन्तुक उसे जानता–पहचानता है। यह मानवीय स्वभाव है, वर्षों बाद अपनों से मिलने पर आँसू बह निकलते हैं। मानवीय संवेदना को यह लघुकथा दर्शाती है।
युद्ध हो या कोई अन्य टना के बाद लोग बहुत जल्द सक्रिय हो जाते हैं। ‘राहत’ कार्यहेतु नहीं, घटना से पीडि़त लोगों के ‘सामान’ लूटने हेतु। ‘कारगिल’ नामक लघुकथा में कारगिल युद्ध के समय की एक घटना को आधारभूमि बनाया गया है। एक तरफ हिन्दुस्तानी फौजी की लाश है तो दूसरी तरफ पाकिस्तानी मुजाहिद की। युद्ध के समय गाँव छोडकर सभी भाग जाते हैं। अब्दुल नामक व्यक्ति घटना से लाभ लेने हेतु पहाड़ों के अन्दर गुफा में छिप जाता है। और युद्ध समाप्त होने की प्रतीक्षा करता है ताकि दोनों तरफ के ‘जवानों’ की ‘लाश’ के पॉकेट में जो हो , उसे अपने पॉकेट में कर ले। लघुकथा कार ने मानवीय संवेदनाशून्य भाव को दर्शाया है। अब्दुल जैसा व्यक्ति ‘अल्लाह’ का शुक्र अदा करता है कि आपकी रहमत हुई। दो देशों के सियासी झगड़े (युद्ध) से तो निपटा जा सकता है, पर अब्दुल जैसे लोगो से निपटना ज्यादा जरूरी है। शायद लेखक की भावना भी यही है।
‘सजा’ नामक लघुकथा में लेखक यह कहना चाहता है कि आदिमानव पहले पैर–हाथों को जमीन पर रखकर चला करता था। सभ्यता के विकास के साथ–साथ इसी मानव ने दो पैरों पर खड़ा होना सीखा और दोनों हाथों से काम करने लगा, जिससे उसमें आत्मविश्वास आ गया और स्वावलम्बी हो गया। समय के साथ कुचक्र भी चला रहा। स्थिति ये हो गई कि दो पैर पर चलनेवाले मानव ने जानवर की तरह हाथ को भी पैर का सहयोगी बना लिया और आज गुलाम अर्थात् जानवर की तरह जीवन जी रहा है।
लेखक ने इस प्रतीक के माध्यम से कुछ लोगों के द्वारा कैसे मानव को जानवर समझकर हाँक रहे हैं, इसे दर्शाने की कोशिश की है।
शीर्षक लघुकथा का प्रवेशद्वार होता है। शीर्षक में लघुकथा का अक्स दिखता है। चौथी लघुकथा ‘जागीरदार’ का शीर्षक भ्रम पैदा करता है। ‘जागीरदार’ शब्द का शाब्दिक एवं सामान्य अर्थ समझा जाता है–एक क्षेत्र–विशेष का प्रभावशाली व्यक्ति।
इस लघुकथा का शीर्षक ‘जागीरदार’ की जगह ‘बेटी का दलाल’ ज्यादा ठीक होता क्योंकि ‘मेरी बेटी अब पूरी तरह जवान हो चुकी है जनाब। आपको अब तो पूरे ही पैसे चुकाने होंगे।’’ इस वक्तव्य के साथ लघुकथा समाप्त हो जाती है। लघुकथा के गुण के अनुसार यही सही ट्रीटमेण्ट है।
अब लघुकथा की विषयवस्तु को देखें–लेखक ने इस रचना के माध्यम से तथाकथित सफेदपोश एवं शरीफ आदमी का बोर्ड लटकाए ‘कामचोर और काहिल’ बाप के द्वार अपनी बेटी का सौदा करनेवाले पात्र का सृजन कर यह दर्शाने की कोशिश की है। कि समाज में ऐसे भी पिता हैं। समाज किस दिशा में जा रहा है; रचना पढ़ने के बाद, सोचने पर मजबूर कर देता है।
एक साधु ने साँप को कहा, ‘‘तुम लोगों को क्यों काटते हो? यह अच्छी बात नहीं है।’’ साँप ने काटना छोड़ दिया । अब बच्चों ने उसे पत्थर मार–मारकर लहूलुहान कर दिया। साधु उसी रास्ते से लौटा और साँप की यह स्थिति देखकर पूछा। साँप ने कहा, ‘‘ आप कहने के अनुसार मैंने काटना छोड़ दिया, तब से मेरी यह स्थिति है।’’
साधु ने कहा, ‘‘मैंने तुम्हें काटने से मना किया था, फुँफकारने से नहीं।’’
कुछ इसी तरह की रचना है‘मशवरा’। मरीज को डॉक्टर मशवरा देता है कि –‘‘जानते हो, तीस साल की उम्र में ही तुम इतने ढीले और बूढ़े क्यों पड़ गए हो? जैसे बहुत मीठा खाते हो, वैसे ही बहुत मीठा बोलते हो! ‘डाइबिटीज’ ठीक करने के लिए मीठा खाने पर परहेज जरूरी है, उसी तरह हर समय मीठा बोलने पर भी परहेज जरूरी है। मीठा बोलना नैतिक आवश्यकता है, ये पादरी का मशवरा है। मेरी सलाह है–निपुणता से जीने के लिए ‘क्रोध’ भी जरूरी है। अच्द्दी सेहत के लिए मीठा भी जरूरी है ,तो थोड़ी बेचैनी भी।’’
इस रचना के माध्यम से लेखक यह दर्शाना चाहता है कि समाज में ‘मीठा बोलने वालों’ की क्या स्थिति है? सच्चे, ईमानदार समय का पाबन्द व्यक्ति कहाँ खड़ा है और झूठ, फरेब बेईमानी करनेवाले राजों रात पूजे जाने लगते हैं।
‘जनसमुदाय’ की स्थिति क्या है? आप सभी से छुपी हुई नहीं है। यह एक प्रतीक है सरकार और जनता का। अपने देश में वर्ष 1952 से 2011 तक के आम चुनाव के नतीजे ‘जनसमुदाय’ के सामने हैं। पहले जनसमुदाय का क्या महत्त्व था और आज क्या हो गया है? इसे ही इंगित किया गया है, इस रचना में।
‘निगेटिव’ के बिना ‘पॉजिटिव’ नहीं बन सकता। फिल्मी दुनिया की कहानी भी यही है। फिल्म कम्पनी का मालिक जिसे चाहे उसे हीरो बना देता है। भले ही वह उस ‘पात्र’ के योग्य हो या नहीं ; क्योंकि उसके पास ‘धन’ है। समाज में भी यही स्थिति है। राजनीति में यही होता है। फिल्म निर्माता जो चाहे वही निर्देशक को करना होता है: क्योंकि उसे भी पैसा चाहिए। समझदार निर्देशक मालिक के आदमी को तो ‘हीरो’ बना देता है ; लेकिन अपनी समझ से ‘विलेन’ को आगे बढ़ाता है। बनाए गए ‘विलेन’ के अगर–मगर पर वह कहता है–‘‘जब तक पूरे ‘विलेन’ नहीं बनोगे, तुम्हें ‘हीरो’ कौन मानेगा।’’ गोया जीवन के हर क्षेत्र में ‘हीरो’ बनने का रास्ता ‘विलेन’ चौक से ही निकलता है। रचनाकार का उद्देश्य वही है। ‘विलेन’ बनकर–पद, पैसा और प्रतिष्ठा पर लो फिर चाहे जो बनो, सब सही ही होगा। आज आदर्श को ‘ताक’ पर रखकर ही आगे बढ़ा जा सकता है।
आज के वैज्ञानिक युग में भी समाज भूत–प्रेत में विश्वास रखता है। इसे ही केन्द्र में रखकर लघुकथा कार ‘प्रेत’ नामक लघुकथा का सृजन करता है। बारह वर्ष पूर्व मरे व्यक्ति केसाथ ‘शाम ’ बिताना और सरकारी तन्त्र द्वारा उसे(मरे हुए को)टूरिस्ट गाइड का लाइसेन्स देना, इस बात को दर्शाता है कि वहम के साए में हम है। कहा जाता है कि ‘आयु’ से पूर्व जिस किसी मृत्यु होती है, उसकी आत्मा भटकती रहती है प्रेत बनकर। जिसका जिससे अत्यधिक लगाव होता है , उसे वह अहसास होता कि उससे मैं मिला, बातें कीं, शाम गुजारी।
‘अविश्वसनीय’ लघुकथा में पात्रों के संवाद द्वारा इस बात पर अविश्वास दर्शाया गया है कि पहले जमाने के लोगों के द्वारा यह सवाल लाजिमी है क्योंकि आज की तरह चोरी, डकैती, भ्रष्टाचार, बलात्कार, बेईमानी और कामचोरी पहले नहीं थी। पहले लोग ईमानदारी से मेहनत करते थे, शुचिता से रहते थे। इसलिए उन्हें नींद आ जाती थी। आज के लोगों में एक–दूसरे से डर है ; इसलिए नींद के लिए भी गोलियाँ खानी पड़ती हैं।
आज प्राय: आदमी चेहरे पर चेहरा चिपकाए हुए जीवन जी रहा है ताकि असली चेहरा छुपा रहे। काम तो करना है, इसलिए काम करते हैं। काम करते हुए अपनी परिधि में ही घूमते रहते हैं । कोई अपनी गरीबी की परिधि में तो कोई अपनी बिछुड़ी हुई प्रेमिका की याद में। हर कोई ‘भूतलोक’ में गहरा उतरा हुआ है। इसी भाव को लेखक ने ‘भूतलेाक’ नामक लघुकथा में दर्शाया है–फैक्टरी के मालिक द्वारा कार्यस्थल पर निरीक्षण कराकर।
‘एक–एक’ नामक शीर्षक लघुकथा में धूम्रपान से होनेवाली हानि को दर्शाया गया है। मनाही होने पर भी व्यक्ति उस काम को और तेज़ी से करता है, यह मानव का स्वभाव है। सरकार द्वारा कार्यालय एवं सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान की मनाही होने पर लोग टॉयलेट में जाकर अपनी तृष्णा को पूरी करते हैं। घर के लोगों के द्वारा रोक लगाने पर नहीं मानते। नतीजा स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसका ही इस रचना के माध्यम से लोगों को सन्देश देने का एक प्रयास किया गया है।
जोगिन्दर पालजी द्वारा रचित लघुकथाओं में समाज में फैली अव्यवस्था पर कुठाराघात किया गया है। इनकी सभी ग्यारहों लघुकथाओं में अलग–अलग विषयों को उठाया गया है। ये लघुकथाएँ हमें ठहरकर सोचने पर मजबूर कर देती हैं।
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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