नवम्बर-2017

मेरी पसन्दज्यों नावक के तीर     Posted: August 1, 2015

सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर।
देखन में छोटे लगैं, घाव करैं गंभीर।।

जिस तरह बिहारी के बारे में यह उक्ति प्रसिद्ध है, ठीक इसी प्रकार कथा के क्षेत्र में लघुकथा गागर में सागर भरने का काम करती है।एक अच्छा लघुकथाकार वही होता है जो बिहारी के दोहों की तरह थोड़े शब्दों में बहुत अधिक कह जाए और पाठक के मन को झकझोर जाए।अच्छी लघुकथा वही है जो साहित्य की कसौटी पर तो पूरी तरह खरी उतरे ही साथ ही एक स्पष्ट सन्देश छोड़कर भी जाए।जब भी मैं कोई लघुकथा की पुस्तक देखती हूँ तो मेरी आँखें इस तरह की लघुकथा की तलाश करने लगती है।आज लघुकथा- साहित्य बहुत ही समृद्ध हो चुका है।इसकी समृद्धि में सभी लघुकथाकारों का कुछ न कुछ योगदान है। लघुकथा भारतेंदु हरिश्चंद्र भी लिखते थे और इस परंपरा को प्रेमचंद,जयशंकर प्रसाद जैसे प्रसिद्ध कथाकारों ने आगे बढ़ाया ।आज इक्कीसवीं सदी के लघुकथाकार और अधिक समृद्ध कर रहे हैं।आज के कथाकारों में मुझे सतीशराज पुष्करणा,सुकेश साहनी,रामेश्वर काम्बोज ”हिमांशु”, सतीश दुबे,कमल चोपड़ा,बलराम अग्रवाल,राधेश्याम भारतीय आदि बहुत पसंद है। कुछ लघुकथाएँ अपने कथ्य और शिल्प के बल पर मन पर गहरी छाप छोड़ जाती हैं। मधुदीप की लघुकथा रात की परछाइयाँ और अनिता ललित की लघुकथा ख़ास आप सब के लिए पुराने और नए कथ्य की सजग प्रस्तुति के कारण पसंद हैं।
मधुदीप की लघुकथा रात की परछाइयाँ हमारे लोकतंत्र के रक्षकों पर करारा व्यंग्य है कि किस प्रकार लोकतंत्र के रक्षक ही लोकतंत्र का मखौल उड़ाते हैं। चुनाव आयोग की सख़्ती के कारण राजनैतिक पार्टियों पर अंकुश तो लगा, परंतु चुनाव आयोग भी रात के अँधेरे में खेले जाने वाले खेल पर बेबस है। सभी पार्टियाँ झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वालों को बिकाऊ समझती हैं।मतदाताओं के जिस वर्ग को ये बेवक़ूफ़ समझ कर दारू के बल पर उनके वोट लेना चाहते है, इसी वर्ग ने अभी एक राज्य के संपन्न हुए चुनाव में यह बता दिया कि भारतीय मतदाता अब जागरूक हो चुका है।यहाँ चुनाव परिणाम अप्रत्याशित रहे हैं। दारू पीने वाले भी लोकतंत्र की अहमियत को समझने लगे हैं।राजनैतिक पार्टियों की दारू पीकर भी वोट अपनी मर्जी से देते हैं।राजनैतिक पार्टियाँ 15 दिन के चुनाव प्रचार को असली चुनाव प्रचार नहीं मानती, उनके लिए चुनाव से पहली रात झुग्गी-झोंपड़ियों में दारू बाँटना ही असली चुनाव प्रचार है।
लघुकथा के तत्त्वों के आधार पर देखा जाए तो यह लघुकथा हर कसौटी पर खरी उतरती है।रात की परछाइयों के चेहरों का स्वाभाविक चित्रण किया है। एक उदाहरण देखिए-सुबह के दस बज रहे हैं ।सूरज आसमान में काफी ऊपर आ चुका है ।इलाके के पोलिंग बूथ पर एक विकट स्थिति पैदा हो गई है ।वोटिंग के लिए लम्बी लाइन लगी है लाइन में लगे बहुत-से वोटर नशे में झूम रहे हैं, हुडदंग होने का खतरा बढ़ता जा रहा है।
लेखक ने यहाँ पोलिंग बूथ का यथार्थ चित्रण किया है। रात की परछाइयों का चिंता में डूबना स्वाभाविक है।नशे में धुत्त मतदाता किसको वोट देकर जाए पता नहीं। “रात की परछाइयाँ” शीर्षक बिलकुल सटीक एवं सार्थक है। यह लघुकथा यह सन्देश देने में कामयाब हुई है कि लोकतंत्र के रक्षकों द्वारा लोकतंत्र का मज़ाक बनाना ठीक नहीं है।
अनिता ललित ने अपनी लघुकथा ख़ास आप सबके लिए में यह सन्देश देने की कोशिश की है कि किस प्रकार फ़ेस बुक आदि की बढ़ती लोकप्रियता ने हमारे समाज को अपनी गिरफ़्त में बुरी तरह जकड़ लिया है कि हम अपने नैतिक और सामाजिक मूल्य ही भुला बैठे है। आदमी का मूल्य कितना है, इसका आकलन इससे लगाया जाता है कि उसे फ़ेस बुक पर कितने लोग ”लाइक” करते है या ट्यूटर पर कितने लोगों द्वारा फ़ॉलों किया जाता है ।बच्चा खेलकर आया, उसने गुजिया खाने की जिद की तो गुजिया के स्थान पर मार खानी पड़ी, क्योंकि उसके लिए अपनी संतान से भी बढ़कर गुजिया के वे फोटों थे; जो अपने फ़ेस बुक मित्रों के साथ शेयर करने थे। तभी सासू माँ आवाज़ लगाती है,”बहू ! अगर तुम खाली हो गई हो तो गुजिया ले आना, भगवान को भोग लगा दें?” तब उसका बड़बड़ाना यह दर्शाता है कि उसके लिए भगवान् के भोग से पहले फेस बुक मित्रों से मिले लाइक्स है।जब गुजियों की प्लेट की फोटो फ़ेस बुक पर लगा दी जाती है तो उस पर ढेरों ”लाइक्स” और ”वाह! वाह! गृहिणी हो तो आप जैसी !” – कमेंट्स आने लगे और वह गर्व से फूली नहीं समाई! ऐसा लगता है मानो उसका सारा श्रम सार्थक हो गया।यह लघुकथा यह सन्देश देने में सफल रही है कि किस प्रकार लोग झूठी प्रशंसा से आह्लादित होने में ही परम सुख समझते है और झूठी शान के लिए अपनी संतान, भगवान और अपने बुजुर्गों को भी उपेक्षित कर देते हैं।फ़ेस बुक आदि का समाज को लाभ कम और हानि ज्यादा हो रही है।इसके कारण आधुनिक पीढ़ी की मानसिकता विकृत होती जा रही है। न जाने कितने परिवार टूट रहे है। समाज पर विद्रूपता हावी हो रही। बहुत ही भयावह परिणाम सामने आ रहे है।यदि सँभलकर नहीं चले तो इसके परिणाम और भी भयावह होगें।लेखिका ने यह सन्देश व्यंजना के माध्यम से प्रस्तुत कर दिया गया है ।शीर्षक की दृष्टि से भी यह रचना सार्थक है। ‘ख़ास आप सब के लिए’ शीर्षक यह दर्शाता है कि वह जो कुछ कर रही है अपने फ़ेस बुक मित्रों के लिए कर रही है। उसके लिए वे ही सर्वोपरि हैं, वे ही खास हैं।
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1-रात की परछाइयाँ-मधुदीप
इस बार चुनाव आयोग का डंडा कुछ ज्यादा ही तेजी से घूमा ।कोई जलूस नहीं, कोई धूम-धड़ाका नहीं, दीवारों पर पोस्टर भी नहीं ।बस, चौपालों पर छोटी-छोटी सभाएँ, जैसे ये विधान सभा के चुनाव न होकर ग्राम पंचायत के चुनाव हों |
अब वोट पड़ने में सिर्फ सात घण्टे शेष रह गये हैं ।यह झुग्गी-झोपड़ियों का छोटा-सा इलाका है मगर वोट यहाँ बेहिसाब ठुँसे पड़े हैं ।पूरे इलाके में मरघटी सन्नाटा छाया हुआ है मगर कुछ परछाइयों की बेचैन चहलकदमी और फुसफुसाहटें इस सन्नाटे को तोड़ने की कोशिश में हैं |
परछाइयों की पदचाप चारों तरफ फैलती जा रही है ।असली चुनाव प्रचार जोरों पर है ।भरे हाथ परछाई हर झुग्गी में घुस रही है और आश्वस्त कदमों से लौट रही है |
रात के गहराने के साथ-साथ परछाइयों की तेजी और बेचैनी बढ़ती जा रही थी मगर पौ फटते ही वे न जाने कहाँ दुबक गई हैं !
सुबह के दस बज रहे हैं ।सूरज आसमान में काफी ऊपर आ चुका है ।इलाके के पोलिंग बूथ पर एक विकट स्थिति पैदा हो गई है ।वोटिंग के लिए लम्बी लाइन लगी है…लाइन में लगे बहुत-से वोटर नशे में झूम रहे हैं…हुडदंग होने का खतरा बढ़ता जा रहा है…|
चुनाव अधिकारी बेचैन है…वह बार-बार मोबाइल के बटन दबा रहा है…बार-बार सूचना दी जा रही है…व्यवस्था बनाये रखने के लिए अतिरिक्त फोर्स की गाड़ियाँ सायरन बजाती हुईं तेजी से आ रही हैं…|
रात की परछाइयाँ चिन्ता में डूबीं, बेचैन तथा सहमी हुईं एक तरफ खड़ी हैं ।
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2-अनिता ललित- ख़ास आप सबके लिए!

गर्म-गर्म गुजिया एक सुंदर प्लेट में सजी हुई मेज़ पर रखी हुई थीं। वह अपने मोबाइल से भिन्न-भिन्न एंगल से उस गुजिया से सजी प्लेट का फ़ोटो खींच रही थी-मगर उसके मन का फ़ोटो नहीं आ रहा था। वह बहुत जल्दी में लग रही थी और इसलिए खीझ भी रही थी। मेज़ के दूसरे कोने में उसका लैपटॉप रखा हुआ था, जिसमें वह बीच-बीच में झाँक कर आती थी और उसकी बेचैनी और भी बढ़ जाती थी। मानों वह किसी ”रेस” में भाग ले रही हो। इतने में उसका बेटा चिंटू, खेलकर आया और इतनी सुंदर गुजिया देखकर उससे रहा न गया और ” अहा! गुजिया! मम्मा ! बहुत ज़ोरों की भूख लगी है!” कहकर प्लेट पर झपट पड़ा।
”चटाक् की आवाज़ के साथ एक और आवाज़ गूँजी।
” दो मिनट का सब्र नहीं है! कोई मैनर्स नाम की चीज़ भी सीखी है? भुक्खड़ की तरह टूट पड़े बस!”
फिर सन्नाटा छा गया। चिंटू प्लेट तक पहुँच भी न पाया। उसे अपना क़सूर भी न समझ आया। बस अपना गाल सहलाता हुआ, सहम कर ठिठक गया।
वह बड़बड़ाती हुई फिर से गुजिया की प्लेट की फ़ोटो लेने लगी।
इतने में एक संकोचभरी आवाज़ आई,”बहू ! अगर तुम खाली हो गई हो तो गुजिया ले आना, भगवान को भोग लगा दें?”
“आती हूँ।सबको अपनी ही पड़ी है! हुँह !”
कहती हुई वह लैपटॉप पर बैठकर कुछ करने लगी। थोड़ी ही देर में उस गुजिया की प्लेट की फ़ोटो फ़ेसबुक पर लगी हुई थी , और उसका शीर्षक था- “ख़ास आप सबके लिए!”
उस पर ढेरों ”लाइक्स” और ”वाह! वाह! गृहिणी हो तो आप जैसी ! – कमेंट्स आने लगे और वह गर्व से फूली नहीं समाई!
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
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    -सम्पादक द्वय

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