जून-2017

संचयनझक्की आदमी     Posted: April 1, 2015

मुझे एकांगी मार्ग (वन वे) में आता देखकर उनके सुस्त पड़े ारीर में अचानक फुर्ती दौड़ गई।
‘‘मालूम नहीं कि एकांगी मार्ग है? चला आ रहा है, जैसे र का राज है।’’
‘‘पढ़े–लिखे जान पड़ते हो, फिर भी कानून तोड़ते हो।’’ दूसरा भी रौब झाड़ने लगा।
मुझे अपनी भूल का ज्ञान होते ही मैंने निवेदन किया, ‘‘भूल तो हो ही गई, अब जो भी दण्ड लगता हो ले लीजिए।’’
‘‘शरीफ जान पड़ते हो इसलिए समझा रहे हैं। रसीद कटवाओगे तो सौ रुपये लग जाएँगे। ऐसा करो, पचास रुपए दे दो, और निकलो।’’ उनके स्वर का पारा एकदम नीचे उतर आया था, ‘‘पचास रुपए बचेंगे तो बाल–बच्चों के काम ही आएँगे।’’
‘‘मेरे बाल–बच्चों की चिन्ता आप न करें, एक भूल तो हो ही चुकी है, अब दूसरी करना नहीं चाहता।’’ मैंने सौ का नोट निकलाते हुए कहा, ‘‘आप तो रसीद बना दीजिए।’’
रसीद जेब में रखकर मैंने जैसे ही स्कूटर चालू किया, पीछे से आवाज आई, ‘‘झक्की साला…! कानून झाड़ रहा है…उल्लू कहीं का…।’’
-0-

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-
    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine