अगस्त-2017

संचयनटपकती छत     Posted: April 1, 2015

बादलों की जोरदार गड़गड़ाहट सुन भोला जाग गया। देखा, चारों ओर अँधेरा पसरा पड़ा है। रह–रहकर बिजली कड़क उठती है। शाम से शुरू हुई बरसात ने उग्र रूप ले लिया है। उसे उठता देख बापू ने कहा, ‘‘सा जा, सुबह स्कूल जाना है तुझे, पढ़ने–लिखने में जरा मन नहीं तेरा।’’ विवश हो वह आँखें मूँदे पड़ा रहा। माँ–बापू छत से टपकते तथा दीवाल के सहारे आते हुए पानी को कपड़े में समेट बाल्टी में निचोड़ते जा रहे थे, ताकि कमरा तालाब में परिवर्तित न हो जाए। बारिश की तेजी के साथ ही उनके हाथ भी तेजी से चल रहे थे। भोला का मन कह रहा था कि वह भी मदद करे, पर बापू के क्रोधित स्वभाव के डर से चुपचाप पड़ा रहा।
‘‘हर साल आप छत सुधरवाने का कहते हैं।’’ माँ फुसफुसाई।
‘‘करीब दो हजार का खर्चा है। कभी जमा ही नहीं हो पाते।’’ बापू की धीमी आवाज आई।
दो हजार हों तो छत सुधरे। माँ–बापू चैन से सोएँ, मैं भी छत के नीचे बैठकर पढ़ सकूँ। बापू और कुछ करने भी तो नहीं देते। बस्ती के मेरी उम्र के बच्चे कुछ–न–कुछ करते ही हैं, पर बापू को तो पढ़ाने की धुन सवार है। क्या पढ़ाई छत बन जाने की गारण्टी है? दो हजार…छत….पानी समेटते हाथ…भारी होती पलकों के कारण परछाइयाँ धीरे–धीरे धुँधली होती चली गई।
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