अगस्त-2017

देशठेका     Posted: August 1, 2015

श्रद्धालुओं के भाव असली आलू से भी अधिक गिरने लगे तो भगवान का चिंतित होना स्वाभाविक था। उन्होंने मंदिर के सामने खड़ी भीड़ को देख प्रधान पुजारी को बुलाकर कहा, ‘‘देखो, लाइन लंबी होती जा रही है। कहीं नजूल की जमीन निगल गई तो गजब हो जाएगा। अतिक्रमण हटाओ की मुहिम बड़ी जोरदार चल रही है….।’’
प्रधान पुजारी मंदिर से बाहर निकल आए। श्रद्धालुओं की लंबी कतार के कारण कुछ घबराए हुए दिखे, भीड़ को कैसे कम किया जाए? एक उपाय सूझा, सबके संकट सुन लेते हैं,छानबीन बाद में हो जाएगी।
देश में सूखे के कारण अकाल की स्थिति थी तो निवेदन ज्यादातर वर्षा के लिए ही था। पानी गिराओ तो एक सौ एक किलो शुद्ध घी का दीपक जलाने का लालच दिला रहा है। पुजारी ने सोचा, अबकी बार सावधानी बरतनी चाहिए। गए साल 51 किलो शुद्ध घी का दीपक जला था। बू के कारण मंदिर–प्रांगण में बैठना कठिन हो गया था। गलती सिर्फ़ सेठ करोड़ीमल की नहीं थी, सभी सेठों ने यही सोचा कि मामला 51 किलो का है। एक किलो की मिलावट कोई मायने नहीं रखती।
संकट सुनते–सुनते पुजारी की नजर लंबी कतार से हटकर खड़ी एक विवश महिला पर पड़ी। फटे–पुराने मैले कपड़े पहने, आँखों में एक अजीब–सी शून्यता की आभा लिये चुपचाप खड़ी उस औरत को, चाहते हुए भी पुजारी पार नहीं कर सके।
‘‘क्या बात है? बाकी सब तो संकट सुनाने को उतावले हैं, तुम चुप क्यों हो?’’
औरत की बात ने पुजारी को चौंकाया। उसने कहा, ‘‘भगवान, अभी पानी मत गिराना। ऊपर छत नहीं है। बच्चों को कहाँ छिपाएँगे। पहले छत दे दो, फिर पानी।’’
नाराजगी के स्वर में पुजारी ने उसको प्रताडि़त किया, ‘‘बात तो सही है,लेकिन तुमको ऐसा नहीं सोचना चाहिए। कितने लोग पानी के लिए तरस रहे हैं और एक तुम हो कि…।’’
पुजारी आगे बढ़ा। ‘जल ही जीवन है।’ नारा लगानेवाले सेठ करोड़ीमल और उनके साथियों को देख, पुजारी प्रफुल्लित हो उठा। पानी के लिए सर्वस्व निछावर करनेवाले करोड़ीमल की नि:स्वार्थ आवाज सुनने के लिए पुजारी तरस रहे थे कि धीमे स्वर में संकोचमय ढंग से कई छतों वाले करोड़ीमल के मुँह से आवाज बह निकली,‘बस, अब की बार बचा लीलिए। पानी गिरा तो हम बर्बाद हो जाएँगे। हुजूर! सूखे के लिए नलकूपों का जो ठेका मिला है, वह बारह करोड़ का है!’’
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