नवम्बर-2017

देशडर     Posted: November 1, 2017

सातवाँ  पुरस्कार  प्राप्त  लघुकथा

रविवार का दिन था।  सौरभ   मेरे  सामने बैठा  था।  उससे बात करने की हिम्मत नहीं   हो  रही   थी। अखबार  से अपना चेहरा   छुपा,  आँसू रोकते हुए  बोलने की  कोशिश  की  ,तो  दोस्तों के  शब्द   कानों में   बजने लगे- ‘बड़े   बेवकूफ  हो   तुम! मकान बेचकर  बीस लाख बेटे के  हाथ पर रख  दिये, इतना  विश्वास! अच्छे को बुरा बनते   देर  नहीं लगती; वह तभी  तक  अच्छा  था   जब तक  पैसे   तुम्हारे पास थे; दस-पन्द्रह दिन  का  कहा  था,  तीन  महीने हो   गए; कहीं  तुम्हें   सड़क पर न पहुँचा दे  एक दिन; वैसे उन्हें अब तुम्हारी  जरूरत भी   क्या है? लगता   है   सत्तर लाख के विला के चक्कर  में  तुमने  पुराना  मकान भी गँवा लिया।’

खुद को सम्हाला और  सौरभ से पूछा, “बेटा,   बहुत समय हो   गया, हम कब शिफ्ट हो रहे   हैं?”

सौरभ बोला, “बाबूजी,   एक दूसरा  डूप्लेक्स भी देखा   है।  मुझे   लोन नहीं   मिल पाएगा; इसलिए  विभा  अपने ऑफिस  में   कोशिश कर रही है।   शायद काम हो   जाये।”

मन डूबने   लगा। जो  मुझे दिखाया   उसे  छोड़   दूसरा  मकान क्यों?  फिर भी   बात तो  करनी ही  थी। इसलिए  बोला,  “बेटा, जो  हमने देखा   था,  वो  भी तो   अच्छा था, फिर   दूसरा क्यों?”

“बाबूजी,  वहाँ आसपास मन्दिर नहीं  था और   चौराहा  पार करने के बाद  ही कोई  दुकान थी। आप और माँ को अकेले   जाने  में  दिक्कत होती।  अभी  जो  दूसरा  डूप्लेक्स देखा है, वहाँ   सब कुछ पास ही  है। आप दोनों  को  आराम   रहेगा। बस, दस लाख  ज्यादा हैं।   इसीलिए थोड़ा वक्त लग रहा है।  कोई   परेशानी है   क्या बाबूजी?”

अब आँखों  के  आँसू  छुपाने की ज़रूरत नहीं थी।  मैंने भर्राई आवाज़ में   कहा, “तेरे   होते  कभी   कोई चिंता हो   सकती है   क्या?”

-0-मो :   09826511033

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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