अगस्त-2017

संचयनलघुकथाएँ     Posted: September 1, 2015

डूबते किनारे

‘कच्चों”” का ‘पेमेन्ट”” चल रहा था । बिशन सिंह, रूप चन्द, रामलाल……..
देर तक उत्तर नहीं आया ।
‘अरे, राम लोेल ?
‘हाँ साब‘
‘मुँह में दही जमा रखा है क्या ? कब से है तू ?‘
‘एक महीने से साब‘
‘कहाँ लगा है कभी देखा नहीं‘
‘साब…….बडे़ साब के बंगले पर……..‘
‘किसने लगाया ?‘
‘उन्होंने ही….‘
‘चल नाम लिख इधर, रुपये गिन ले, पूरे डेढ़ सौ………‘ अँगूठा लगा कर जो नोट थामे तो उनकी करकराहट से आँखों की चमक बढ़ गई । मन में इच्छाओं का चर्खा चल पड़ा । पहली तन्खा है, माँ को साड़ी, बाबू को पगड़ी बन पड़ा तो अपने लिए एक बुशर्ट………बाबू को लिखवा दूँगा । अगले महीने थोड़ा जास्ती भेज दूँगा ।
बंगले तक उधेड़बुन चलती रही ।
‘ले आया तन्खा ?‘
‘हाँ साब‘
दिखा इधर‘ बडे़ साहब ने एक बार सारे नोट गिने फिर उनमें से पाँच नोट निकालकर रामलाल को थमा दिये ।
रामलाल की निगाहें प्रश्नवाचक हो गईं ‘साब….?‘
सारे नोट जेब के हवाले करते बडे़ साहब बोले ‘महीने भर के रहने-खाने के सौ रुपये‘
‘साब…सौ रूपे‘
मिजाज़ में उफ़ान आ गया ‘और क्या …..मुफ़्त में आता है क्या खाना ?…क्या मैंने ख़ैरात खाना खोल रखा है ? रहेंगे बाबू की तरह, खाने को चाािहये तर माल………..पैसे देते दम निकलता है । साले, कामचोर चले आते हैं कहाँ-कहाँ से…….‘
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माटी कहे……

आज चम्पा की ड्यूटी कॉटेज वार्ड में थी । एक-एक कॉटेज झाड़ती बुहारती चम्पा नं. आठ तक आई । दरवाज़ा खुला था । वह झाडू़ घसीटती कमरे के पार तक चली गई।
‘ठैर…ठैर तो सही‘ सफे़द बुर्राक कपडे़ पहने बूढ़ी महिला यथा शक्ति जल्दी-जल्दी चलती हुई आईं और बाल्टी-मग उठाकर खिड़की में रख दिये । मरीज़ के पलंग की चादर ऊपर कर दी । नीचे रखे अटैची केस व झोले-झाले मेज़ पर टिका दिये । अपने पलंग की चादर भी मोड़माड़ कर ऊपर समेट दी । दूसरी खिड़की में रखी सुराही और खाने का डिब्बा तौलिये से ढक दिया, फिर हाथ झाड़ती एक तरफ़ को बचकर खड़ी हो गई ।
व्यवधानों की बीच झाड़ू लगी । डिटौल डालकर पोंछा लगा । फिनायल से बाथरूम लैट्र्नि धुले । अस्पताल की गंदगी को लेकर अधूरी-पूरी आलोचना के मध्य आधे-पौने घंटे में काम ख़त्म हुआ । चलते-चलते चम्पा पूछ बैठी ‘कब आईं माँजी ?
‘कल शाम, बेटी है, बीमार……..‘
‘बहुत अच्छा किया आपने यहाँ आकर, बहुत बढ़िया अस्पताल है यह । यहाँ के डॉक्टर और नर्से भी बहुत काबिल हैं । कल सुबह ही मेरी माँ को भी छुट्टी मिली है। यहीं थी साल भर से इसी कमरे में‘ मासूम हँसी. दूध से सफे़द दाँत और माथे पर शीशे की टिकुली झक-झक चमक उठी ।
हाथ मसलती माँजी झाड़ू घसीटती चली जा रही चम्पा को देखती रह गई । असहाय नजरें कमरे की एक-एक चीज़ को ध्यान से देखती हुयी तौलिये से ढके पानी और खाने के डिब्बे पर टिक गईं ।
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बादशाह

‘ऐ ताँगे वाले! ताँगा खाली है क्या ?””
‘कहाँ जाना है आपको ?‘
‘मदनगंज….,
‘नीम गंज की सवारी है बीबी जी, वह…सामने पान की दुकान पर……..‘
तो पुलिया तक ही छोड़ देना । क्या लोगे ?
‘साठ पैसे‘
असमंजस में पड़ गयी वह । आधा मील के करीब ही होगी वह पुलिया, साठ पैसे अधिक लगे फिर भी स्वीकृति में सिर हिलाती ताँगे में बैठ गई ।
पास की दुकान से सवारी के आते ही ताँगा चल पड़ा । पुलिया पार आकर ही रूका । उतरकर वह पाँच मिनट तक पर्स टटोलती रही फिर बोली ‘चालीस पैसे ही हैं बाबा, और खुल्ले नहीं हैं‘।
उँगलियों के बीच अठन्नी दबाकर छुपाने की क्रिया जितनी तेज़ हुई उतनी ही स्पष्ट हो उठी निकृष्ट मानसिकता ।
चालीस पैसे लेकर घोडे़ को चाबुक से हाँकता हुआ ताँगे वाला ज़ोर से हँस दिया ‘कोई बात नहीं सरकार । बीस पैसे का महल बना लेना‘।
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दर्पण के अक्स

पत्नी अपने बच्चों में गुम हो गई ।
बच्चे अपने-अपने परिवारों में । रह गया वह । दिन भर जी तोड़ मेहनत से व्यवसाय सम्भालता । शामें-रातें सूनी हो गईं । अकेलेपन की बेकली को दूर करने के लिये उसने कम्प्यूटर की शरण ली । ‘इन्टरनैट‘ पर ‘चैटिंग‘ का चस्का लगते भला क्या देर लगती । नये-नये अछूते संसार में विचरण करता वह अति व्यस्त हो गया । हर पन्द्रहवें-बीसवें दिन एक नई लड़की से बातचीत करता । अंतरंगता के दबे-छिपे कोनों तक पहुँच बनाता । अपने भीतर उछलती उत्तेजना को महसूस करता । बेवकूफ़ बना पाने की अपनी कुशलता पर कुटिलता से मुस्कराता ।
इस बार भी वह इंटरनैट बंद करके लिप्सा से मुस्कराया । सोलह साल की लड़की की लहकती आवाज़ में लिपटा । नरम सा प्रेमालाप उसके कानों में रस घोल रहा था । उसने ऐनक उतारी, खुरदरे हाथों से माथा सहलाया और खुमारी में डूबा-डूबा बिस्तर में जा धंसा ।
उधर भी उस सोलह साल की लड़की ने इंटरनैट बंद किया । ऐनक उतार कर मेज पर रख दी । लहकती आवाज़ में गुनगुनाना शुरू कर दिया । रैक से झुर्रियाँ मिटाने की क्रीम को हल्के हाथों चेहरे पर लगाने लगी । खिचड़ी बालों की उलझी लटों को उँगलियों से सुलझाया । बेवकूफ़ बना पाने की अपनी कुशलता पर मंद-मंद मुस्काराई और खुमारी में डूबी-डूबी बिस्तर में जा धँसी ।
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बिम्ब-प्रतिबिम्ब

सड़क पर भीड़ चारों तरफ़ घिर आई । एक आदमी बुरी तरह रोये जा रहा था । पुलिस वाला एक छोकरे को गाली बकता पीट रहा था ।
‘साले, कमीने, बित्ता भर का छोकरा, जेब काटता है । निकाल पैसे‘
‘मेरे पास नहीं हैं उल्टे हाथ से मुँह के झाग व ख़ून पोंछता छोकरा बोला।
‘तलाशी लो तलाशी‘ भीड़ से कोई चिल्लाया । थप्पड़ों-घूँसों के साथ तलाशी हुई, पर कुछ न निकला । आदमी सिर पीट कर और भी ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा । ‘हाय सत्यानाश हो इसका, इसी ने निकाले थे पैसे । अब मेरी मेहरूआ मर जायेगी । दवा-इलाज के पैसे कहाँ से आयेंगे ?‘
किसी को दया आ गयी तो राय दी ‘अरे ! दो-दो चार-चार रुपये सब कोई डालो, ग़रीब का भला हो जायेगा । पुन्न का काम होगा । और, सिपाही जी इस कमीने को थाने में बंद कर दो इसी वक़्त‘
मिनट भर में रेज़गारी ही रेज़गारी आदमी के सामने इकट्ठी हो गयी । उसने पैसे समेट कर सभी को दुआ दी ।
सिपाही छोकरे को धकियाता थाने ले चला । भीड़ कुछ दूर तक साथ चली फिर धीरे-धीरे एक-एक करके सब अपनी-अपनी राह हो लिये ।
थोड़ी देर बाद एक सूनी गली में सिपाही, छोकरा और आदमी मिले पैसों का हिस्सा बाँट कर रहे थे ।
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-
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    -सम्पादक द्वय

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