जुलाई -2018

संचयनलघुकथाएँ     Posted: January 1, 2018

1राजा नंगा है

छह साल की राजो मुझे घूँघट काढे पराँठे बेलते हुए देख रही थी । माँ तुम घूँघट क्यों काढ़ती हो ?

उसने पूछा ; “अरे, बाबा बैठे है ” माँ ने ढलक गए घूँघट को नीचे खींचते हुए जबाब दिया ।

“लेकिन बाबा से तुम मुँह क्यों छुपाती हो? बाबा तो किसी से मुँह नही छुपाते ,वह तो खाली नेकर (निक्कर)पहन कर पूरे घर में घूमते हैं?”

अवाक् माँ कुछ बोल नहीं पाई, बस स्कूल के उन दिनों की एक कहानी याद आ गई जो कि एक मास्टर साहब ने सुनाई थी ; “एक राजा था ,उसने एक पारदर्शी पोशाक बनवाई और उसे पहन प्रजा के बीच गया और सबसे पूछा कि पोशाक कैसी है?

सबने उसकी बहुत तारीफ की। केवल एक बच्चा हाथ में एक तख्ती उठाये खडा था, जिस पर लिखा था ‘राजा नंगा है।‘

कहानी खतम।

लेकिन, मै हमेशा सोचती ,कि उस बच्चे का हश्र क्या हुआ होगा।

आज एक ऐसी ही तख्ती राजो ने भी हाथो में उठा ली थी ।

चटाक्  की आवाज के साथ ससुर का रोबीला स्वर गूँजा “तमीज सिखाओ इसे।”

और उस कहानी का अंत आज समझ आया ।

राजा ने उस बच्चे का हाथ तख्ती सहित काट दिया होगा।

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2-क्षेपक

रात्रि भोज के लिये खाने की मेज पर बैठे बैंक मैनेजर मिस्टर एस लाल पचास साल पीछे की सीढ़ियाँ उतर गए ,जब वह सुखिया हुआ करते था।बस जब गाँव की पाठशाला में हाजिरी होती थी तब सुखलाल नाम सुनाई पड़ता था। नहीं तो ये सुख्खी ,ये सुखिया ऐसे सम्बोधन ही अन्तर्मन पर गुदे हुए थे। उसे अच्छी तरह याद है गाँव का नाम, सौंखिया था। लेकिन गाँव में जाति के आधार पर टोले बटें थे जैसे पसिया टोला, कुम्हारनटोला और उसका वाला था चमारन टोला।

उफ्फ !! झुरझुरी आ गई एस लाल को।पूरी खाल में चामरौधे की सड़ाँध भिद गई।

“खाना लगा दिया है “पत्नी माया की आवाज से वह वर्तमान में लौटे

“कुसुम कहाँ है? खाना नहीं खाएगी क्या?” एस लाल ने पूछा

“अपने कमरे में है आती होगी ।आज ऑफिस से देर से आई थी। कह रही थी, ऑडिट है, थोडा काम करना है।”

“हूँऽऽऊँ ।अरे वाह ! आज तो पनीर और खीर दोनो मेरी मनपसन्द चीजें बनाई हैं अ क्या बात है, कुछ कहना है क्या?

“जी” माया कुछ सकुचाते हुए बोली “कुसुम के साथ एक लड़का काम करता है.. अच्छी पोस्ट पर है… और दोनों एक दूसरे को पसन्द भी करते है, आप कहें तो……..?”

“ठीक हैऽ ,ठीक हैऽ ,भाई ।हमें क्या आपत्ति हो सकती है ।” खीर गटकते हुये उन्होने

पत्नी को प्यार से देखा ।

“लेकिन वह………….”-पत्नी हकलाई

“लेकिन क्या ? “एस लाल विराम चिह्न से प्रश्नवाचक बन गए थे।

“जी वह….. मु……स……ह….र ”

अचानक खीर के बर्तन में सुअरों को अपनी थूथन घुसाते देख सुखिया से एस लाल बने सुखलाल अगिया बैताल बन गए।

3-फाँस

मिस्टर सिंह और उनकी पत्नी के सामने की बर्थ पर एक अंग्रेज युवा जोड़ा बैठा था। उन्होने मित्र भाव दिखाते हुए उस युवा जोड़े से पूछा ; “हू आर यू ? एन्ड फ़्रॉम वेयर?”

उसने कहा ; ” आय एम  जॉन एन्ड शी इज माय फ्रैन्ड लीज़ा।वी आर फ्राॅम इग्लैन्ड ।”

ओह ! ग्रेट .

आय एम मिस्टर सिंह एण्ड शी इज माय वाइफ।आय एम गोइंग गंगोत्री यमुनोत्री (चारधाम यात्रा) कहकर मिस्टर सिंह हँस दिए।

यूँ तो आरक्षित कम्पार्टमेन्ट कोई अनारक्षित नही आ सकता ।मगर वह दस बारह साल का भिखारी लड़का कब कैसे उस बोगी में घुस आया, पता नहीं चला।

वह किशोरवय भिखारी अपनी याचना- मुद्रा बनाए यात्रियों से कुछ देने की गुहार लगा रहा था ।

भीख के कटोरे में एक का  दो का  पाँच सिक्का उछाल-उछालकर वह यात्रियों में दया भाव का संचार करके कुछ न कुछ देने के लिये उकसा रहा था । लेकिन कुछेक को ही वह अपनी इस भावना के ज्वार में बहा पा रहा था। वरना तो कुछ यात्री इतने निर्विकार भाव से बैठे थे कि उन्हें वह हाड-मांस का भिखारी , भिखारी न होकर उसका स्थान  निर्वात दिखाई दे रहा था।

उनमें से एक मिस्टर सिंह भी थे। समाज पर भिखारियों को वह बद्नुमा धब्बा समझते थे। भीख देकर  इसे और बढ़ाने के पक्ष में वह बिल्कुल न थे।

अब तक वह दस बारह साल का भिखारी लड़का दीन भाव से उनके सामने आकर गिड़गिड़ाने लगा । लेकिन उसके गिड़गिड़ाने का उन पर कोई असर नहीं हुआ हालाँकि पास बैठी पत्नी ने आँखो ही आँखो में उसे कुछ देकर टालने की मंशा  जाहिर की ।लेकिन वह अपनी मान्यता से ठस से मस होने वालों में से नहीं थे ।

अब वह भिखारी लड़का उस अंग्रेज जोड़े के सामने दीन याचक की मुद्रा बनाये खडा था। वह ज्यों ज्यों उनके सामने कटोरा बढ़ाता , वे दोनों अपनी सीट पर सिमटते जाते ।साथ ही हाथ के इशारे से उसे दूर रहने की हिदायत दे रहे थे। लेकिन वे लोग जितना ही उसे दुत्कारते वह उतनी ही ढिठाई से उनके और करीब जाने की कोशिश करता। उसे शायद यह ज्ञान घुट्टी में मिला था , कि विदेशी लोग अच्छे पैसे देते है । सो वह रिरियाता हुआ कभी अपनी काली कलूटी अँगुलियों के बीच दबे अल्म्यूनियम के कटोरे के पैसे उछालता , कभी कीचड़- भरी-आँखे मलता ,और कभी बरैया के छत्ते जैसे अपने बालो में अँगुलियाँ डाल कर कबर- कबर खुजलाता। उनके सामने डटा था।

सिंह साहब यह दृश्य देख धीरे से अपनी पत्नी से बोले ; “क्या केवल भारत के ही भिखारी विदेशी लोगों के सामने भीख के लिए ज्यादा गिड़गिड़ाने हैं या सभी देशों में इस मनोविज्ञान का इस्तेमाल होता है।”

अचानक वह अंग्रेज जोड़ा उसे धक्का देते हुए जोर से चीखा ;

” यू रास्कल ,आइ विल थ्रो यू फ्राम दिस कम्पार्टमेन्ट .गेट लास्ट, राइट नाऊ.”

पत्नी से बात करते सिंह साहब को अचानक जैसे जोर का धक्का लगा हो

उन्होने भौहें चढ़ाते हुए उस अंग्रेज का हाथ नीचे करते हुए  आदेशात्मक लहजें में  कहा ; ” कीप क्वायट”

और उस भिखारी लड़के के कटोरे में सौ का नोट डालते हुए उसकी मुण्डी पकडकर धकियाते हुए बोगी के दरवाजे तक ले गए और मुँह से इतना ही निकला इतने सालों इनकी गुलामी के बाद भी  जी नहीं भरा स्साले …….

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4-बोल मेरी मछली कित्ता पानी

पापा मैं जा रही हूँ …. ओमप्रकाश… अच्छा लड़का है , मैने माँ को बताया था… लेकिन उसकी  जाति के चलते… माँ ने आपको नहीं बताया ।आजकल ये सब कौन मानता है पापा… लेकिन … हो सके तो मुझे माफ कर देना……
आपकी….
पत्र के शब्दों के उथले जल में तैरते पति -पत्नी जाति की दीवार से बार- बार ऐसे टकरा रहे थे , जैसे आत्ममुग्ध रंग- बिरंगी मछलियों को गहरे पानी की सुरक्षा से घसीट कर मनोरंजन के निमित्त  छोटे से काँच के ज़ार में छोड़ दिया जाए, जीवन भर उसकी दीवारों से हाँफ -हाँफकर अपनी थूथन चोटिल करने को।

” दुबे जी हैं क्या ? ”
आगन्तुक की आवाज़ से पति पत्नी नीम बेहोशी से जागे ।
“लगता ह ,वर्मा जी हैं। “पत्नी ने सजग होकर कहा
” हूँ ।”  पति ने सिगरेट का आखिरी कश रीढ़ के अन्तिम छोर तक खींच कर बची सिगरेट को बिना प्लास्टर वाली दीवार की संध में ऐसे घुसा दिया  जैसे घर की बात घर में दफन कर रहे हो।
“आइये , वर्मा जी बड़े दिन बाद दर्शन हुए।”
वर्मा जी को बैठक में बैठाते हुए दुबे जी कृत्रिम मुस्कान के साथ संयत स्वर में बोले-” अरे ! क्या बताएँ दुबे जी ,”कहकर उन्होने दो विवाह के कार्ड़ और मिठाई का ड़िब्बा उनके आगे सरका दिया
” ये क्या है ? ”
कहते हुए दुबे जी कार्ड़ खोलकर पढ़ ही रहे थे , कि वर्मा जी से छलकती खुशी सम्भल न पाई ।
अति उत्साह में भरकर बोले ; ” अब क्या बताएँ , पंड़ित जी , मेरी बहू भी पंड़ित घर की आ रही और मेरा दामाद भी आप की बिरादरी का है… मेरे दोनों बच्चों की लव-मैरिज है…  मैनें कभी अपने बच्चों के ऊपर अपने फैसले नहीं लादे …जाने वे कैसे माँ बाप होते हैं,  जो अपने बच्चे की खुशी में खुश नहीं होते… लीजिये साब आप तो मिठाई खाइए… अच्छा जी अब चलते हैं …अभी और भी कार्ड बाँटने हैं .. ”
दुबे जी मिठाई का एक टुकड़ा उठाते हुए आँखे बन्द कर कड़वी हो चुकी लार को घूँटते  हुए बोले  ;  ” अरे ! सुनिए तो  वर्मा जी , अन्यथा न लें ,तो एक बात पूछूँ , अगर आपके बच्चे निम्न जाति से अपने जीवन साथी चुनते तो…..
…………….
वर्मा जी कब के जा चुके थे।
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5-ढकोसले

आज से बाइस साल पहले की शादी की एलवम देखती हुई मां बोली ; ” देखो तो इसकी आँखे कैसी गहरी उदासी में डूबी लगती है ,  लगता है, जाने कितने गहरे सोच में हैं ।
अरे कस्तूरी ! तू क्या सोच रही थी उस समय , मै तो काम धाम में लगी थी, तू कहाँ खोई थी ?”
कितना अच्छा अभिनय करती हैं माँ , जानकर अनजान बनने का ।
कस्तूरी की आँखो की कोरें पनिया गयी।
वह पुराने एल्बम की फोटो पर ऐसे हथेली फेर रही थी , जैसे वह अपने ममत्व भरे स्पर्श से बाईस वर्ष पहले की खाई को पाट रही हो
” कहाँ ,कहाँ है सोच में डूबी कस्तूरी? हमें भी देखने दो ।” समय की दस्तक के चिह्न चेहरे पर लिये अपनी ऐनक सम्हालते पापा भी  शादी की एलबम पर झुक गए । गौर से देखने के बाद उन्होने अपनी आँखे कुछ मिचमिचाते हुए कहा-” अब कुछ साफ साफ नही दिखता, मोतियाबिन्द पक गया है , अब तो ऑपरेशन के बिना काम नही चलने बाला। ”
उन्होने ऐनक को नाक पर धीरे से दबाया- ” लेकिन ऑपरेशन कराएँ तो कराएँ  कहाँ ? तेरा भाई कहता है, छोटे शहर में ऑपरेशन सस्ता पड़ता है, दिल्ली में तो बडा महँगा है , और फिर वहाँ तेरे भाई भाभी दोनो नौकरी पर जाते है , तो फिर मेरा ऑपरेशन सम्भालना अकेले तेरी मम्मी के बस का तो है नहीं ।सोचता हूँ तेरे यहाँ रह कर ही करा लूँ;
लेकिन समाज के ये रीति रिवाज , बेटी के घर का पानी भी गुनाह है  …..”
फिर कुछ झुक गई रीढ़ को अकड़ाकर विद्रूप स्वर में बोले ; ” लेकिन कस्तूरी अब मैं नहीं  मानूँगा इन पुराने और सड़े- गले रीति रिवाज़ों को । इन में कुछ नही रखा। यह सब ढकोसले है और कुछ नही।”
पापा यह निर्णय अगर आप बाइस साल पहले ले लेते ,तो मै भी अपने वाला प्यार पा लेती।जिन्दगी यूँ समझौते में तो न कटती।
यह सब कहना चाहकर भी कस्तूरी ने कहा कुछ नही केवल बाईस साल पहले की गहरी उदासी फिर उसकी आँखों में घिर आई ।
माँ बाइस साल पहले भी पापा के विरुद्ध नहीं गईं और आज भी नहीं।
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जन्म स्थान :शाहजहाँपुर
वर्तमान निवास स्थान: पीलीभीत उत्तर प्रदेश
शिक्षा : एम.ए (हिन्दी, संस्कृत ) बी. एड. , पीएच. डी. स्ववित्तपोषित डिग्री कॉलेज में प्राचार्या

लेखन की विधाएँ  :लघु कथा कहानी कविता  ( अतुकान्त ) रेखाचित्र, संस्मरण यात्रावृत्त , लेख ,शोधपरक लेख आदि।

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
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