जुलाई-2017

देशढोलची     Posted: July 1, 2017

                      गणेशी मसान से ढोल गले में लटकाए और दोनों बाजुओं को हवा में बेकाबू सा लहराता -, झूमता – झामता कोठारी को लौट रहा था । उसके कदम बेहिसाब उठ रहे थे । उसका मन आज न जाने कौन -सी धुन अलाप रहा था। थोड़ी – थोड़ी देर में वह अपने आप ही कुछ – कुछ बड़बड़ाता चल रहा था ।

” नहीं …..नहीं …..अब कभिच्च नहीं बजाऊँगा , चाहे भूख से क्यूँ न मरना पड़े । पैसे के लाने तो कभिच्च न बजाऊँगा किसी की मैयत पे ” । राह चलते सभी राहगीर उसे पलट – पलट कर ताक रहे थे । जब वह शनिचरी हाट से गुजरा तो दिलावर चचा ने पीछे हे  हाँक लगाई , बोले ——– ” गणेशी ……अरे हो गणेशी , लगता है आज तो बहुत गजबे मालमत्ता हाथ लगे है तभिच्च मैं भी कहूँ साल्ला आज गणेशी के पैर काहे झूम रहा , जुबान काहे न काबू धर रहा । ”

” नहीं न चचा नही , कुछु नही हाथ लगा ।जो भी मिला रहा हम फैंक आये उनके  मुँह पे । ”

” पर बड़ा झूम झाम रहा , पाँव तो जमीन पर धर ही नहीं रहे तेरे , काहे झूठ बोल रहा रे ……..बूढ़े चचा से ……..? ”

” न चचा न ,….. अब कभिच्च न बजाईब ….. न ..न …कभिच्च नही । ” किसी तरह मन मसोस कर बोला कि एक क्षण को दिलावर चचा सकपका गए । पीठ पर गणेशी के हल्का सा हाथ धर कर बोले —–” गणेशी लल्ला… नई बजाईब तो खइबे का…. ओखर लाने ही तो सब टंटा , अब तो तुम्हरा बाबूजी भी तो जिन्दा न बचें है लल्ला ….. घर भर .सबके पेट में का भकोसेगा ……पेट ही तो दुसमन ठहरा हम गरीबन का । ”

” न…..चचा नहीं , अब कभिच्च नहीं न बजाईब …… मन में इक फाँस खुब गई है , मरने के बाद मसान , मसान के बाद नर्मदा , नर्मदा में अस्थि सिरा कर खाली हाथ लौटना , ढोलची हूँ <तो का भया जिया हमरा भी जलता है । एक आग की लपट उठती है , और सारा सरीर खाक ……….धू – धू कर जलता है । सोच रहे हम की ये साला कैसी जिनगी भला —— जब तक जियो, जिनगी भर पेट की खातिर लात जूते खाओ ,एड़ियाँ रगड़ – रगड़ कर पिसे जोड़ो अऊ ओ पिसे के लाने भाई – भाई में खूना – खच्चर , बेटा बहू से दो मुट्ठी भात के लाने करेजा जला – जला कर धुन्धुआ जाती बूढ़ी आँखें । अब जाके  अस्सी साल में मरा बुढहू { बुड्ढा } साले लोग दिन रात मेवा , मिठाई और फल बाँट रहे हैं गरीबो में । अब श्राद्ध के दिन बाम्हनो की पंगत बिठाएँगे …..ढेरों फल , मेवा , मिठाई नर्मद्दा में चढ़ाएँगे , और कहेंगे …” बाबूजी भूल – चूक माफ़ । खा लो और तृप्त हो लो । अब बुढाऊ खाए क्या ? बुड्ढे के  मुँह में  दाँन्त नहीं , पेट में  आँत नहीं ……नहीं जनते  क्या साले लोग की सीने में  साँस नहीं । दलिद्दर साले ………अब दान पुन …..जीते जी दो मुट्ठी भात को कितना रुलाया । अब मर गए< तो ढोलची बुलवाकर पोते – पोती , नाती – नतनी नचाएँगे ……..देखो अस्सी साल जीकर मरा है …तुम्हरा नाना , तुम्हरा दद्दा । थू – थू है ……….ऐसी जिनगी और ऐसी मौत पर ………..”

-0- मीता दास, 63/4 नेहरूनगर पश्चिम , भिलाई , छत्तीस गढ़ -4900020                                                                           फोन नंबर: 08871649748 , 09329509050 ; ईमेल :  mita.dasroy@gmail.com

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-
    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine