जून -2018

देशथैंकू भैया     Posted: February 1, 2018

वह माँ के साथ जब पाँव घसीटती चली जा रही थी। उसकी नजरें बार-बार सड़क के दोनों ओर सजी दुकानों पर जा-जाकर अटक जातीं। मन हिलोरें मारता कि माँ से कुछ कहे, मगर उसे डर था कि माँ से अभी कुछ कहने का मतलब यहीं बीच सड़क पर मार खाना होगा। यों भी , आज माँ का मूड कुछ ठीक नहीं। कल मालकिन ने ताकीद की थी, देर न करना, मगर देर हो ही गई। इसलिए काम में हाथ बँटाने को माँ उसको भी जबरदस्ती साथ ले जा रही थी। अबीर, गुलाल के रंग-बिरंगे पैकेट उसे बुलाते, तरह-तरह के रूपों वाली पिचकारियाँ, गुब्बारे सब उसे इशारा करते-से लगते। वह टूटी चप्पल घसीटती अधमरी-सी चलती रही।

‘‘अरी, चल ना! क्या हुआ, पाँव के छाले पड गए का……एक तो ऐसे ही एतना देर हो चुकी, जाने मालकिन का पारा केतना गरम होगा? परवी नै दी तो का फगुआ का बैसाखी। सारी भी तो दे के खातिर बोले रही, बिटवा का उतारन भी। चल न, तुमको साथ काम करते देखेगी तो मन पसीजेगा जरूर, कुछ-न-कुछ दइए देगी।’’

माँ बड़बड़ाती हाथ खींचती चलती रही।

गली के मोड़ पर पहले पाँचमंजिला मकान मकान मालकिन का ही तो है। हे भगवान् ! उसका बेटा घर में न हो! केतना तंग करता है हमको। नौ वर्षीया निक्की ने मन-ही-मन ईश्वर को याद किया। कभी मन्दिर गई नहीं, भगवान् स्त्री हैं या पुरुष, उसको भ्रम बना हुआ है। मगर जब मुसीबत नजर आती है, वह झट-से भगवान् को पुकार लेती है। ‘मालकिन बोली की कड़ी थी, मगर उसे कभी डाँटा नहीं। माँ को जरूर डाँटती कि ‘इसे स्कूल भेजा कर। घर में बिठाकर अपने जैसा बनाएगी क्या?’

उसे मालकिन से डर नहीं लगता मगर उसके बेटे ओम से लगता है। वह हमेशा उसे छेड़ता रहता है। उससे थोड़ा बड़ा है तो का? अकड़ू कहीं का!’

चप्पल उतारकर अभी बैठक में कदम रखा ही था कि ओम दिख गया। वह सकपकाती हुई माँ की बगल जा खड़ी हुई।

‘‘जा, सीढ़ियों पर झाड़ू लगा दे, हम आते हैं कमरा में झाड़ू लगाकर।’’

वह हिली नहीं, सकपकाई-सी खड़ी रही।

‘‘अरी का हुआ, सुनाई कम देता है का?’’ माँ धीमी आवाज में मगर रोश में बोली।

‘‘माँ वो-वो…..’’ वह हकला गई।

‘‘चल जा, जल्दी काम कर’’ कहकर माँ अन्दर कमरे में चली गई।

ओम चुपचाप कब उसके पीछे खड़ा हो गया, उसे पता ही न चला। अचानके उसे पाकर वह भीतर तक सिहर गई। ओम का हाथ पीछे था।

‘अब फिर यह मेरे बाल खींचेगा या चिकोटी काटेगा। हे भगवान्, का करें? आज तो चिल्लाकर रोने लगेंगे हम, मालकिन को पता चल जाएगा कि…’ ‘‘निक्की’’ वह आगे सोच पाती, तभी ओम ने धीरे-से उसे पुकारा और हाथ आगे बढ़ा दिया। उसके हाथ में रंग, अबीर-पुड़िया की थैली और प्यारी-सी पिचकारी थी।

‘‘यह तुम्हारे लिए।’’

‘‘नहीं-नहीं हमको नहीं चाहिए।’’ वह छिटककर दूर जा खड़ी हुई, तभी मालकिन कमरे में आ गई।

’’ ले लो बेटा! भैया ने तुम्हारे लिए खरीदा है।’’

वह हैरान होकर कभी रंग और पिचकारी देखती, कभी ओम और मालकिन को। ‘तो क्या ओम छोटी बहन समझकर उसे तंग करता था, यही बात अच्छे-से भी तो समझा सकता था, डराकर रख दिया हमको।’ वह मन-ही-मन बुदबुदाई। साँवले चेहरे पर मुस्कान खिली और गुलाबी रंग निखर आया। होंठ हिले और बोल फूटे, ‘‘थैकू भैया!’’

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