नवम्बर-2017

संचयनलघुकथाएँ     Posted: October 1, 2015

दरार

सुशीला एक वर्ष तक मायके रहकर ससुराल लौटी थी। सास–ननद के ताने, पति की उपेक्षा मार डालने की धमकियाँ – इन सबने उसे मायके में जीने को बाध्य कर दिया था। नौकरी न कर रही होती तो न जाने उसका क्या हाल होता! परिचितों–रिश्तेदारों के बीच–बचाव और आश्वासनों से वह पुन: ससुराल लौट आई थी।
रात बगल में सोए पति ने उसके शरीर पर हाथ रखा। वह भय से काँपती उठ बैठी।
‘‘क्या हुआ?’’ पति ने पूछा।
‘‘कुछ नहीं’’ उसने पति की ओर अविश्वास भरी आँखों से देखा।
दोनों सोने का प्रयास करने लगे। न जाने कब सुशीला की आँख लग गई। पति ने फिर उसकी देह पर हाथ रखा। वह भय से काँपती हड़बड़ा कर उठ बैठी ।
‘‘मैं हूँ। तुम डर क्यों जाती हो?’’ पति ने पूछा।
उसने उत्तर में कुछ नहीं कहा। बस आँखें पति के चेहरे पर टिका दीं। नीले रंग की नाइट बल्ब की मन्द–मन्द रोशनी में सुशीला की आँखों में उमड़–घुमड़ कर आए प्रश्नों के बादलों का सामना पति न कर सका। वर्ष भर की पीड़ाएँ उन बादलों में भरी पड़ी थीं।
पति करवट बदलकर सो गया।
सुशीला अविश्वासों के तकिए पर सिर रखकर फिर सो न सकी।
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दुम
दस हजार जेब में डालते ही गिरवर को ठर्रे की दो बोतलों का नशा चढ़ गया। दस हजार सिर्फ़ एडवांस के थे। हड़ताल न हुई तो बीस हजार और मिलेंगे। वाह रे गिरवर! शहर आकर तू सचमुच समझदार हो गया है। वह स्वयं पर खुश हो रहा था। न हींग लगी थी न फिटकरी।
वह क्या करेगा, बस बस्ती जाकर वासदेव,शिवपूजन,रामजी और रक्खाराम को बुलाएगा। व्हिस्की की चार बोतलें मेज पसर रख देगा। चार मुर्गे रख देगा। बोतलों को देखकर ही चारों को नशा हो जाएगा। साले ठर्रे के लिए तरसते हैं। व्हिस्की अन्दर जाते ही कुत्तों की तरहदुम हिलाने लगेंगे। हजार रुपया भी उन पर खर्च दूँगा तो भी नौ हजार बच जाएँगे। और ज्यादा चूँ–चपड़ करेंगे तो बाकी के बीस हजार मिलेंगे उनमें से दो–दो हजार इनके मत्थे और मार दूँगा। तब भी कुल मिलाकर बीस–बाइस हजार तो बच ही जाएँगे।
उसने चारों के पास खबर भेजी। मेज पर प्लेट में मुर्गे सजा दिए। व्हिस्की की बोतलें और गिलास सजा दिए। वह उनके आने की प्रतीक्षा करने लगा।
‘‘जा! से जा! उनमें से कोई नहीं आएगा। पूरी बस्ती को खबर हो गई है कि मालिक ने मुझे खरीद लिया है। हड़ताल तुड़वाने के लिए पूरे दस हजार दिए हैं। तू क्या समझता है, सब तेरी तरह कुत्ते हैं, जो हड्डी पकड़कर मुह बन्द कर लेंगे? अकेले बैठ के अंगरेजी दारू पी और जाके मालिक के सामने दुम हिला। तू मेरा मरद न होता तो तेरी शक्ल न देखती। तूने पूरी बस्ती में मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा।’’ पति को फटकराते–फटकरारते गुलाबों का गला भर आया।
गिरवर की आँखों के आगे कड़कड़ाते नोट, शराब की बोतलें, मुर्गे घूमने लगे और तेजी से चूमने लगा गुलाबों का चेहरा। उसे लगा वह सचमुच मुँह में हड्डी दबाए दुम हिलाता हुआ कुत्ता बन चुका है।
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अविश्वास
उस दिन सूरज बहुत थका–थका सा उगा था। रमेश की तरह वह भी मानो रात भर सोया न था।
रमेश पूछ–पूछकर हार गया था। पत्नी घूम–फिरकर एक ही उत्तर देती, ‘‘मुझे नहीं पता अस्पताल कैसे पहुँची; किसने पहुँचाया। होश आते ही तुम्हें फोन करवा दिया।’’
वह बार–बार पूछता, ‘‘तुम सच–सच क्यों नहीं बता देती? जो हो गया, सो हो गया।’’
‘‘कुछ हुआ हो तो बताऊँ।’’
‘‘देखो! इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। अस्पताल ले जाने से पहले वे तुम्हें और कहाँ ले गए थे?’’
‘‘मैंने बताया न कि अँधेरे के कारण सामने पड़े पत्थर से ठोकर लगते ही मैं बेहोश हो गई थी। होश आया तो अस्पताल में थी।’’
‘‘डॉक्टर ने बताया था कि तीन युवक तुम्हें दाखिल करा गए थे। तुम सच–सच क्यों नहीं बता देती? मैं उस किस्म का आदमी नहीं हूँ , जैसा तुम सोच रही हो। आखिर तुम्हारा पति हूँ।’’
‘‘जब कुछ हुआ ही नहीं तो क्या बताऊँ? तुम मुझ पर विश्वास क्यों नहीं करते?’’
रात भर पति–पत्नी के मध्य विश्वास तैरता रहा था।
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अपना घर
डोली विदा होने के साथ–साथ ही रिश्तेदार विदा होने लगे। शकुन्तला आते–जाते ससुर को घूर जाती। उसके विदा न हाने के आसार देख वह भीतर ही भीतर कुढ़ रही थी। रात ससुर को सोया जान वह पति के सामने फट पड़ी, ‘‘मुझे नहीं लगता, पिताजी वापस आश्रम जाएँगे। इस बार अपना बक्सा भी साथ उठा लाए हैं। तुम उन्हें साफ–साफ कह देना। मुझसे उनकी सेवा नहीं होती। आश्रम में सारे आराम हैं। यहाँ बार–बार कौन बाजू पकड़–पकड़कर उन्हें पेशाब कराने ले जाएगा? उनकी खाँसी और बलगम थूकने की आवाजों से मुझे तो रात–रात भर नींद नहीं आती। मेरा अपना ब्लड–प्रेशर हाई हो जाता है। तुम कल उनको आश्रम छोड़ आना।’’
‘‘साल भर बाद तो पिताजी आए हैं। उनकी हालत देख रही हो। पता नहीं कब आँखें बंद हो जाए। अन्तिम समय में जितनी हो सके, उनकी सेवा कर लेनी चाहिए। बड़ों का आशीर्वाद ही मिलता है।’’ पति ने समझाते हुए कहा।
शकुन्तला जिद्द पर अड़ी रही। श्रीकान्त करवट बदलकर सो गया। बाहर लेटे बाबू रामदयाल की श्वास नली में बहू के शब्द फँस सें गए। अपना अन्तिम समय निकट जानकर पोती के विवाह में इसीलिए आए थे ताकि बेटे के घर में ही प्राण त्यागें। आश्रम में लावारिस न मरें। बहू के शब्द उनके हृदय केा तेज धार से चीरते चले गए। उनके फेफड़ों में सोई खाँसी जग गई। उन्होंने उसे रोके रखने का बहुत प्रयास किया, परन्तु छाती पर जमी बलगम खड़खड़ाने लगी। दम फूल जाने से वे हाँफने लगे। खाँसी का रोक रखा बाँध टूट गया।
किवाड़ खोलकर बेटा बाहर आ गया। उनकी छाती पर विक्स मलने लगा। हाथ–पैर दबाने लगा। पुत्र के हाथों का स्पर्श पाकर बाबू रामदयाल की आँखें भर आईं। रुँधे गले से कहने लगे, ‘‘श्रीकान्त! सवेरे जरा जल्दी उठा देना। तेरे साथ ही तैयार हो जाऊँगा। दफ्तर जाते समय रास्ते में आश्रम छोड़ते जाना।’’
पुत्र पिता की काँपती आवाज की थरथराहट महसूस कर रहा था। वह उन्हें ‘यहीं रुके रहिए’ की हिम्मत न जुटा सका। पिताजी की खाँसी थमी देखकर वह पत्नी के पास जा लेटा।
‘‘पिताजी ! आप यहीं रह जाइए।’’ सुनने की इच्छा लिए बाबू रामदयाल गहरी नींद में समा गए।
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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