नवम्बर-2017

मेरी पसन्ददिल पर छाप छोड़ती लघुकथाएँ     Posted: July 1, 2015

लघुकथा विधा बहुत ही कम शब्दों में मनोभावों को व्यक्त करने की क्षमता रखती है । लेखक अपने आसपास ऐसी अनेक घटनाएँ देखता है जो उसके मन-मस्तिष्क में छाप छोड़ती जातीं हैं । उन्हीं को वह अपनी भावनाओं में पागकर शब्दों में पिरो देता है । वर्तमान समय में साहित्य के क्षेत्र में लघुकथा विधा बड़ी तेज़ी से अपनी जगह बनाती जा रही है । इस विधा की सबसे विशेष बात यह है कि आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में पाठक कम शब्दों में मर्मस्पर्शी तथ्यों से रूबरू हो जाता है । खासकर युवावर्ग रोज़मर्रा की आपाधापी और जीवन की उलझनों से उकताकर लघुकथाओं से जुड़ता जा रहा है ।
लघुकथा विधा नए पाठक वर्ग को विकसित करने और हिंदी भाषा व साहित्य के प्रचार प्रसार को बढ़ावा देने में अत्यंत सक्षम है । साहित्यकार जीवन की विसंगतियों की परतें उधेड़ने के लिए अनेक विधाओं की ओर अग्रसर हुए । लघुकथा लेखक और पाठक की संवेदनाएँ एकीकार हो उठीं । लघुकथा के माध्यम से लेखक अपनी अभिव्यक्ति के चरम को छूता है । लघुकथा का आकार छोटा भले ही हो लेकिन उसकी अभिव्यक्ति बहुत बड़ी और गहरी होती है । वह अभिव्यक्ति इतने कम शब्दों में होती है कि न तो घटनाओं के चमत्कार के लिए समय होता है और न ही वातावरण को प्रस्तुत करने का अवकाश । कम से कम शब्दों और पात्रों से युक्त लघुकथा पाठक को उद्वेलित करती है और उसके हृदय पर अपना अमिट प्रभाव छोड़ती है । भाषा की सांकेतिकता और लक्षणा-व्यंजना शब्द शक्तियों का प्रयोग लघुकथा को सारगर्भित और उद्देश्यपूर्ण बना देती है ।
मैंने कुछ वर्ष पूर्व एक लघुकथा पढ़ी थी, ‘माँ के आँसू’ । हरि मृदुल द्वारा लिखी गई यह लघुकथा मेरे हृदय पर सदैव के लिए अंकित हो गई । इस लघुकथा का भाव और इसकी मार्मिकता आज भी तरोताजा है । इसी के बाद मैने उनकी अन्य कई लघुकथाएँ जैसे ‘तिल, ‘खंडन’ आदि भी पढ़ीं । अन्य प्रतिष्ठित रचनाकरों की भी लघुकथाएँ पढ़ीं । रुचि जागृत हुई और पत्र-पत्रिकाओं में लघुकथाओं को खोज-खोजकर पढ़ने लगी । पढ़ते हुए जाना कि लघुकथा कम शब्दों में ज़रूर होती है किन्तु उसके भीतर छिपे भाव अत्यंत गूढ़ होते हैं । लघुकथा लिखना दुरूह कार्य है । लघुकथा.कॉम, गद्यकोश, हिंदी चेतना आदि में महत्त्वपूर्ण लेखकों की उत्कृष्ट लघुकथाओं को पढ़ने का अवसर मिला । प्रेमचंद से लेकर वर्तमान लघुकथाकारों को पढ़ना अत्यंत सुखद एहसास था । एक के बाद एक ऐसी लघुकथाओं से परिचय होता गया जिनकी भाषा मनोभावों को झकझोर देने वाली और विचारों को चमत्कृत कर देने वाली थी ।
प्रेमचंद जी की लघुकथा ‘राष्ट्र का सेवक’ झकझोर देने वाली लघुकथा है । यह लघुकथा दरअसल समूची मानवजाति के लिए दर्पण के समान है । यह लघुकथा हमें सोचने पर मजबूर कर देती है । क्या वाकई राष्ट्र का सेवक अपने सिद्धांतों को व्यवहार के धरातल पर ला सकता है ? हरिशंकर परसाईं जी कि लघुकथा ‘अपना-पराया’ हमारी दोहरी मानसिकता की परतें उधेड़ती है । श्री चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की ‘पाठशाला’ अभिभावकों की महत्त्वाकांक्षाओं के बोझ तले दबे पिसे बच्चों के दर्द को उजागर करती है । राजेन्द्र यादव जी कि ‘अपने पार’ एक बच्चे के जरिए हमारे रिश्तों की चुप्पी और शोर, दूरी और टकराहट, कशिश और उकताहट, चाहत और घुटन सब एक साथ कह जाती है । यह एक ऐसी बेजोड़ लघुकथा है जिसे बार-बार पढ़ा जाए तो भी हर बार सोच का नया अंकुर फूट ही पड़ता है ।
रामेश्वर काम्बोज़ ‘हिमांशु’ जी की लघुकथा ‘धर्म निरपेक्ष’ धर्म के नाम पर एक दूसरे की जान की मानवता पर कुत्ते की प्रतिक्रिया द्वारा करार व्यंग्य करती है । ‘नवजन्मा’ बेहतरीन लघुकथा है जो थोड़ी नाटकीयता के साथ सुखांत को प्राप्त करती है । यह लघुकथा लड़कियों के जन्म को सकारात्मक मानने का सुखद एह्साह प्रदान करती है ।
असगर वजाहत जी लघुकथाएँ अपने भीतर मानवीय संवेदनाओं का सागर समेटे होती हैं । हँसी, आग, राजा, बंदर योद्धा आदि । सुभाष नीरव की लघुकथा ‘बीमार’ मन को आहत करती बेहतरीन लघुकथा है । सुदर्शन की ‘मेरी बड़ाई’, शरद जोशी जी की ‘मैं वही भागीरथ हूँ’, राम पटवा की ‘अतिथि कबूतर’ और बलराम अग्रवाल की ‘कंधे पर बैताल’ अन्य अनगिनत मर्मस्पर्शी लघुकथाएँ हैं । इन्हें एक बार पढ़ने के बाद भूल पाना असम्भव है ।
सुकेश साहनी जी की लघुकथाएँ संवेदनाओं के तारों को झकझोर जातीं हैं । इनकी ‘दूसरा चेहरा’, ‘जागरूक’, ‘घर’, ‘आखिरी तरीख’, ‘गणित’ हमारी मानसिकता पर व्यंग्य करती है । ‘नागरिक’, ‘मैं कैसे पढूँ’, ‘बोंजाई’, ‘चश्मा’, ‘खारा पानी’, मार्मिक लघुकथाएँ है । ‘नंगा आदमी’, ‘गलीज़’, ‘तोते’, ‘अनुपात’ हमारी सच्चाई को उजागर करती है ।
‘मेरी पसंद’ के अंतर्गत मैं अपनी पसंद की दो लघुकथाओं पर चर्चा करना चाहूँगी । पहली लघुकथा है ‘माँ के आँसू’ और दूसरी है ‘चादर’ । ‘माँ के आँसू’ में हरि मृदुल जी ने भावनाओं के स्रोत खोलकर रख दिए हैं । यह मार्मिक लघुकथा दिल को भीतर तक छू जाती है । नायक के संस्कार उसे अपनी माँ से अलग होने ही नहीं देते हैं । वह अपनी मज़बूरी के चलते शरीरिक तौर पर अपनी माँ से दूर तो चला आता है; लेकिन माँ के आँसू, उसकी स्मृतियाँ आज भी नायक की स्मृति की अलमारी में सुरक्षित हैं । जीवन की भागदौड़ हमें चाहे कितनी ही दूर क्यों न ले जाए किन्तु ममता की छाया से परे कभी भी नहीं ले जा सकती । हमारे रिश्ते हमारी धरोहर हैं जो वर्षों बाद भी उतनी ही ऊष्मा, उतनी ही नमी बनाए रखते हैं ।
‘चादर’ लघुकथा में सुकेश साहनी जी ने हमारी वास्तविकता का पर्दाफाश किया है । मानवता को धर्म और संस्कारों की चादरें मुफ्त बाँटी जाती हैं । ये सफ़ेद झक्क चादरें हमें ता-उम्र भरमाए रहती हैं ; लेकिन जब हम पवित्र पर्वत की राह पकड़ लेते हैं तो इन झक्क चादरों के दाग साफ नज़र आने लगते हैं । हमें अपनी और दूसरों की सच्चाई नज़र आने लगती है । सभी किसी न किसी गुनाह से लिप्त हैं, किसी का जीवन पवित्र नहीं है लेकिन फिर भी हम आत्ममुग्धता में अपनी मूछों पर ताव दिए चले चले जाते हैं । हम सभी की चादरें दागदार हैं किन्तु हम सभी को पवित्र पर्वत पर पहुँचने की दरकार भी है । हमें इस भरमाती नींद से जागकर मुफ्त में बाँटी गई सफ़ेद चादरों को उतार फेंकना होगा । हमारी वास्तविकता हमीं को दिखाती यह लघुकथा दिल और दिमाग पर गहरी छाप छोड़ जाती है ।
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1-माँ के आँसू-हरि मृदुल

यह उसकी अपनी माँ से अंतिम मुलाकात थी, हालांकि तब उसे इस बात का इल्म नहीं था। वह शहर लौटते समय माँ से विदाई ले रहा था, तो माँ फूट-फूटकर रो पड़ी थी। वह लगाता रोए जा रही थी। उसे थोड़ा आश्चर्य हुआ था कि माँ इतना तो कभी नहीं रोई। वह कुछ समझ नहीं पाया। हाँ, उसने यह जरूर किया कि जेब से रूमाल निकाला और माँ के आँसू पोंछने लगा। पूरा रूमाल आँसुओं से तर हो गया था।
माँ अभी भी रोए जा रही थी।
नौकरी का सवाल था। उसे किसी भी हालत में शहर लौटना था। माँ के आँसू उसे नहीं रोक सके। अलबत्ता उसने माँ के आँसुओं से भीगा रूमाल अपनी जेब में डाल लिया था।
शहर पहुँचते ही माँ के चल बसने की खबर आ गई। उसने जेब से रूमाल निकाला, वह अभी तक गीला था। न जाने क्यों, उसने यह रूमाल अलमारी में सुरक्षित रख दिया।
आज काफी समय बाद उससे मेरी मुलाकात हुई है। बातचीत के दौरान उसने बताया कि माँ के आँसुओंवाला यह रूमाल अभी तक उतना ही गीला है।
कोई और होता, तो उसे इस बात पर जरूर आश्चर्य होता, लेकिन मुझे कतई नहीं हुआ है।
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2-चादर -सुकेश साहनी
दूसरे नगरों की तरह हमारे यहाँ भी खास तरह की चादरें लोगों में मुफ्त बाँटी जा रही थीं, जिन्हें ओढ़कर टोलियाँ पवित्र नगर को कूच कर रही थीं। इस तरह की चादर ओढ़ने–ओढ़ाने से मुझे सख्त चिढ़ थी, पर मुफ़्त चादर को मैंने यह सोचकर रख लिया था कि इसका कपड़ा कभी किसी काम आ जाएगा। उस दिन काम से लौटने पर मैंने देखा सुबह धोकर डाली चादर अभी सूखी नहीं थी। काम चलाने के लिए मैंने वही मुफ़्त में मिली चादर ओढ़ ली थी। लेटते ही गहरी नींद ने मुझे दबोच लिया था।
आंख खुली तो मैंने खुद को पवित्र नगर में पाया। यहाँ इतनी भीड़ थी कि आदमी पर आदमी चढ़ा जा रहा था। हरेक ने मेरी जैसी चादर ओढ़ रखी थी। उनके चेहरे तमतमा रहे थे। हवा में अपनी पताकाएँ फहराते जुलूस की शक्ल में वे तेजी से एक ओर बढ़े जा रहे थे। थोड़ी–थोड़ी देर बाद ‘पवित्र पर्वत’ के सम्मिलित उद्घोष से वातावरण गूँज उठा था। विचित्र–सा नशा मुझ पर छाया हुआ था। न जाने किस शक्ति के पराभूत मैं भी उस यात्रा में शामिल था।
इस तरह चलते हुए कई दिन बीत गए पर हम कहीं नहीं पहुँचे। दरअसल हम वहाँ स्थित पवित्र पर्वत के चक्कर ही काट रहे थे।
‘‘हम कहाँ जा रहे हैं?’’ आखिर मैंने अपने आगे चल रहे व्यक्ति से पूछ लिया।
‘‘वह पवित्र पर्वत ही हमारी मंजिल है।’’ उसने पर्वत की चोटी की ओर संकेत करते हुए कहा।
‘‘हम वहाँ कब पहुँचेगे?’’
‘‘क्या बिना पवित्र चढ़ाई चढ़े उस ऊँचाई पर पहुँचना सम्भव होगा?’’ मैंने शंका जाहिर की।
इस पर वह बारगी सकपका गया, फिर मूँछें ऐंठते हुए सन्देह भरी नजरों से मुझे घूरने लगा।
तभी मेरी नजर उसकी चादर पर पड़ी। उस पर खून के दाग़ थे। मेरे शरीर में झुरझुरी -सी दौड़ गई। मैंने दूसरी चारों पर गौर किया तो सन्न रह गया- कुछ खून से लाल हो गई थीं और कुछ तो खून से तरबतर थीं। सभी लोग हट्टे–कट्टे थे, किसी को चोट -चपेट भी नहीं लगी थी और न ही वहाँ कोई खून–खराबा हुआ था, फिर उनकी चादरों पर ये खून….? देखने की बात यह थी कि जिसकी चादर जितनी ज्यादा खून से सनी हुई थी, वह इसके प्रति उतना ही बेपरवाह हो मूछें ऐंठ रहा था। यह देखकर मुझे झटका–सा लगा और मैं पवित्र नगर में निकल पड़़ा।
लौटते हुए मैंने देखा, पूरा देश दंगों की चपेट में था, लोगों को जिन्दा जलाया जा रहा था, हर कहीं खून–खराबा था। मैंने पहली बार अपनी चादर को ध्यान से देखा, उस पर भी खून के छींटे साफ दिखाई देने लगे थे। मैं सब कुछ समझ गया। मैंने क्षण उस खूनी चादर को अपने जिस्म से उतार फेंका।
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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