दिसम्बर-2017

संचयनदूसरी औरत     Posted: June 1, 2015

दूसरी औरत

वह अपनी खिड़की के पास खड़े, दूर सड़क पर रेहड़ी वाले से सब्जी ख़रीद रही औरत को देखकर, मुस्कराते रहे। वह औरत भी उन्हें बराबर ‘लिफ़्ट’ दे रही थी।
“सचमुच कितनी प्यारी है यह औरत ! काश, उसकी पत्नी भी इतनी ही आकर्षक होती !!” उन्होंने आह भरी।
रसोईघर से आ रही बर्तन खड़कने की आवाज़ से वह निश्चिन्त थे कि श्रीमतीजी अपने काम में लगी हैं।
उनका दिल खिड़की से हटने को ही नहीं कर रहा था। सब्जी ख़रीदने वाली औरत ने, मौका पाकर, कुछ ऐसा संकेत कर दिया था कि वह दिल थामकर रह गए।
खटखट के कुछ कम हो जाने पर, देखने के लिए कि पत्नी का काम ख़त्म तो नहीं हो गया, वह रसोईघर में घुसे, तो अवाक् रह गए-“तुम !”
“जी, बर्तन साफ़ कर रही हूँ।”
अपने धकधक करते दिल को, किसी प्रकार शान्त करते हुए, उन्होंने पूछा-“फिर बीबीजी कहाँ गई हैं ?”
“जी, वह बाहर सब्जी ख़रीद रही हैं।” बर्तन मलते हुए महरी ने उत्तर दिया।।
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