जून-2017

भाषान्तरनटखट बालिका     Posted: February 1, 2017

रवीन्द्रनाथ टैगोर
मैंने केवल इतना कहा–सायंकाल जब पूर्ण चन्द्रमा कदंब वृक्ष की डालियों के बीच में फँस जाता है<तो क्या कोई उसे पकड़ नहीं सकता?
किन्तु दादा मुझ पर हँसने लगे बोले– बच्ची, तुम्हारी जैसी मूर्ख लड़की मैंने आज तक नहीं देखी। चन्द्रमा हमसे इतनी दूर है तो उसे कोई पकड़ कैसे सकता है?
मैंने कहा–दादा, वास्तव में मूर्ख आप हैं! जब माँ खिड़की में से मुस्कराती हुई बाहर झाँकती है और हमें खेलते हुए देखती है, तब हम उसे दूर कहेंगे?
फिर भी दादा ने कहा–तुम नटखट लड़की हो! किन्तु यह बताओ चन्द्रमा को पकड़ने के लिए तुम्हें इतना बड़ा जाल कहाँ मिलेगा?
मैंने कहा–आप निश्चय ही उसे अपने हाथों से पकड़ सकते हैं!
किन्तु दादा हँसकर बोले–तुमसे बढ़कर मूर्ख मैंने आज तक नहीं देखा। पास आने पर देख पाओगी कि वह कितना बड़ा है।
मैंने कहा–दादा, यह व्यर्थ की बातें आपको स्कूल में सिखाई जाती हैं! जब माँ हमारा चुम्बन लेने के लिए अपना चेहरा नीचे झुकाती है <तो क्या वह बड़ा लगता है?
फिर भी दादा कहते रहे, ‘तुम नटखट लड़की हो।’
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गतिविधियाँ

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

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