अक्तुबर-2017

देशनमक हराम     Posted: January 2, 2015

खेत -खलिहान तो खैर वह पहले ही बेच गया था, अब अपने पुरखों की अन्तिम  निशानी के रूप में बचा पुश्तैनी मकान बेचने गाँव आया था। गाँव में प्रवेश करते ही बचपन की अनेक स्मृतियाँ मन-मस्तिष्क पर एक-एक कर धुंध की तरह छाने लगीं और मन बोझिल हो उठा। उसने माथे को एक जोरदार झटका-सा दिया, जेब से निकालकर एक सिगरेट सुलगाई और हवा में धुआँ का अम्बार छोड़कर बड़े ही दार्शनिक अंदाज में बोला, ‘बाप-दादे जिन्दगी भर मिट्टी खोदते रह गये। क्या मिला? गरीबी में ही पैदा हुए और गरीबी में ही चल दिये।’
‘जी मालिक!’ पीछे-पीछे चल रहा टहलुआ बोला।
‘और की कौन कहे, दो वक्त की सूखी रोटी भी भरपेट नसीब नहीं हुई।’
‘जी मालिक!’
‘आज हमें किसी चीज की कमी नहीं है। अच्छा खाते हैं, अच्छा पहनते हैं, बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ते-लिखते हैं।’
‘जी मालिक!’
‘हमारी किस्मत अच्छी थी जो हम जी-बच गये, पढ़-लिख गये। बाप-दादों ने क्या किया?’
‘जी, मालिक! लेकिन मालिक, हमने उन्हें बीहड़ काटकर क्यारियाँ बनाते देखा। अपने कंधों पर हल रखकर खींचते देखा। वे बहुत गरीब थे मालिक! दाने-दाने को मोहताज। लेकिन बच्चों को कभी भूखा नहीं रहने दिया। वे खुद पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन बच्चों को अपना पेट काटकर पढ़ाया-लिखाया। अपने बच्चों को तो जानवर भी प्यार करता है मालिक! लेकिन मुझ अनाथ को भी उन्होंने बच्चे-सा प्यार दिया। पाल पोसकर बड़ा किया। और सबसे बड़ी बात मालिक, इस भयानक गरीबी में भी ईमान-धरम कभी नहीं खोया। आप अपने पुरखों की अन्तिम निशानी बेचने आए हैं मालिक, इसे बेचकर आप सबकुछ भूल जाएँगे। मैं उन्हें कैसे भूल सकता हूँ मालिक!’’
उसने टहलुआ को घूरकर देखा और मन में सोचा, ‘भूल तो तुम भी जाओगे नमकहराम जब मैं लात मारकर नौकरी से निकाल बाहर करूँगा।’

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गतिविधियाँ

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
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