जून-2017

देशपरछाई     Posted: March 1, 2015

””””हैलो, मोहन जी, कैसे हैं आप?””””
””””अच्छा दौरे पर हैं, गलत समय पर फोन तो नहीं कर दिया आपको? जी, आप जानते ही हैं कि यहाँ और वहाँ के समय में पूरा बारह घंटे का अंतर है इसलिए समझ ही नहीं आता कि कब बात की जाये। मुझे फ्री होते-होते करीब रात के दस बज ही जाते हैं। मुझे लगा कि अभी आप ऑफिस पहुँचे ही होंगे, सोचा बात कर ली जाए””””
””””अजी अगर हर जिलाधिकारी आप जैसा हो तो अपना भारत भी यहाँ की तरह ना हो जाए””””
उसने चिरौरी करते हुए कहा-””””अच्छा क्या है कि एक जरूरी काम आ पड़ा था आपसे, वो मेरे एक पारिवारिक मित्र हैं उनका बन्दूक के लाइसेंस का प्रार्थना-पत्र पड़ा होगा आपके ऑफिस में। सम्भव हो तो प्लीज उसे प्राथमिकता देकर देख लें””””
””””जी शुक्रिया मोहन जी, यही उम्मीद थी आपसे। शुभकामनाएँ आपके दौरे के लिए।””””
उसने फोन रखा ही था कि एक और काम याद आ गया, अंगुलियाँ अब अंकों के एक दूसरे संयोजन को मोबाइल स्क्रीन पर उभार रही थीं। टाई ढीली करते हुए उसने स्पीकर फोन चालू कर दिया ””””राणा सा””””ब नमस्ते, मैं सुशील बोहरा यू एस से। जी.. जी.. कैसे हैं आप””””
””””आपकी व्यस्तता समझता हूँ लेकिन एक इमरजेंसी की वजह से इस समय डिस्टर्ब कर रहा हूँ, असल में मेरे एक रिश्तेदार के पड़ोसी ने उनके खिलाफ मार-पीट का झूठा केस दर्ज कर दिया है। उनका कहना है कि आरोपकर्ता ने आपके नए एसपी से भी मिली भगत कर रखी है सो वह भी उन लोगों की नहीं सुन रहा। मैं तो वहाँ आपको ही जानता हूँ और मुझे यकीन है कि वह एसपी भी किसी की सुने ना सुने अपने अफसर की जरूर सुनेगा, तो एक बार आप बोल देना उसे जरा””””
””””हाँ हाँ, जी.. जी.. बाकी सब बिल्कुल ठीक है, अगली बार भारत आने पर ही आपसे मुलाक़ात होगी। उम्मीद है तब तक आप भी आई जी बन चुके होंगे। भाभी जी को प्रणाम कहिएगा”””” उसने आवाज़ में जोश लाते हुए कहा।
दोनों काम होने का आश्वासन मिल चुका था। उसकी नज़र सामने टेबल पर पड़ी फ़ोर्ब्स पत्रिका पर टिक गई, जिसके कवर पर शीर्षक था ””””विश्व के सौ प्रभावशाली व्यक्ति””””। उसकी मुस्कान चौड़ी होने लगी। बाईं तरफ नीचे की ओर रखे टेबल लैम्प की रौशनी से दीवार पर पड़ती उसकी परछाई सीलिंग को छू रही थी।
तभी उसका मोबाइल मिनमिनाया, उसने फिर से फोन कान से लगा लिया ””””हाँ माँ, कैसी हैं? सब ठीक तो है?””””
””””अरे इतनी सी बात पर परेशान हो जाती हैं आप! डॉक्टर को फोन कर लीजिये ना और जो दवा दें किसी से मँगवा कर खिला दीजिए पिता जी को, कल तक ठीक हो जाएँगे। आप नाहक खुद परेशान होती हैं और मुझे भी करती हैं। मैं? मैं कब तक आऊंगा यह कुछ कह नहीं सकता माँ, देखो शायद साल के आखिर में””””
””””अच्छा रखता हूँ माँ, आप ध्यान रखना अपना”””” उसकी आवाज़ बहुत धीमी हो गई।
नज़र अब दीवार पर टँगी पेंटिंग से चिपक गई। पेंटिंग में पत्थर की बड़ी और भारी गेंद पर एक शक्तिशाली नग्न पुरुष चिंतामग्न बैठा हुआ था, पुरुष का एक पैर लोहे की जंजीर से उसी भारी गेंद से बँधा था। हाथ पीछे ले जाकर उसने नाइटलैम्प बुझा लिया। सीलिंग तक पहुँचती उसकी परछाई कमरे के अँधेरे में खो चुकी थी।
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गतिविधियाँ

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

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