नवम्बर-2017

देशपानी     Posted: July 1, 2015

दादी ने फिर नल खुला छोड़ दिया। मैंने चलते नल को बंद किया। कितना ख्याल रखना पड़ता है मुझे। लेकिन दादी है कि परवाह ही नहीं करती। तीन बार नल बंद कर चुका हूँ आज की तारीख में। और दादी…।
दादी की अपने समय की जल संकट के बारे में सुनाई हुई कहानियाँ मेरे स्मृति-पटल पर उभर आईं। जब दादी सत्तर साल पहले ब्याह करआई थी, तब इस गाँव में पीने के पानी की सुविधा नहीं थी। दूसरे गाँव में बरसाती नदी के पास के कुओं से सप्ताह में दो बार मर्द ऊँट पर चौखठ रखकर पानी के घड़े भर कर लाया करते थे। वह पानी खाना बनाने व पीने के लिए ही प्रयोग में लाया जाता था। कपड़े धोने, पशुओं के पीने व अन्य घरेलू कामों के लिए गॉंव के बोडिय़े कुँए का पानी प्रयोग किया जाता था, जो बहुत नमकीन था। कोढ़ में खाज यह कि बोडिय़े कुँए का पानी औरतों को सिर पर ढोना पड़ता था।
दादी बताया करती है कि उस समय पानी घी की तरह प्रयोग में लाया जाता था। उस नमकीन पानी से नहाने से शरीर पर खाज हो जाया करती थी। इसलिए अधिकतर लोग सप्ताह में एकाध बार पीने वाले पानी से नहाया करते थे। दादी को सुबह तीन बजे उठकर पहले हाथ चक्की द्वारा आटा पीसना और फिर पानी की व्यवस्था करनी पड़ती थी। दादी बताती कि दिन का आधा समय तो औरतों को पानी की व्यवस्था करने में ही लग जाता था।
अबके दादी द्वारा नल खुला छोङऩे पर मैंने कहा, ‘‘पाणी भोत कीमती है दादी, व्यर्थ क्यों बहा रही हो? और आपणा टैम भी एक बार फिर याद कर लो।’’ मैं बेशक दादी को इसी तरह समझा सकता था; क्योंकि पानी के मामले में आज हमारा जिस संकट से सामना होने वाला है ,उसे दादी को समझा पाना मुश्किल था। दादी तो बस घर में लगी वाटर-वर्कस की टोंटी को देख कर ही अभिभूत थी।
दादी बोली, ‘‘इतना पाणी देख के अपणा टैम ई तो याद आ जावै है बेटा…।’’ तो मैंने फिर सवाल किया, ‘‘दादी आप तो कह्या करते थे न कि पाणी की भोत कमी देखी है आपने…?’’
इस पर दादी पोपले मुँह से हँसते हुए बोली, ‘‘हाँ रे बेटा, पर अब तो मनसा पूरी कर लेवाँ।’’
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