जून-2017

देशपूतना बोध     Posted: March 1, 2015

‘‘हमारा प्यारा बाबा अब दूधू पियेगा….’’ कहती हुई बच्चे के ऊपर झुकी आया का काम करने वाली लड़की दूध की बोतल पलंग पर लेटे बच्चे के मुँह तक ले गई। बच्चे के मुँह में निप्पल लगाने से पहले अचानक रुकी। उसने बोतल में भरे दूध पर एक ललचाई नज़र डाली। कुछ देर ठहरी, इधर-उधर देखा और निप्पल सहित बोतल का ढक्क्न खोलकर बच्चे के मुँह में लगाया और बोतल का खुला मुँह अपने मुँह की ओर ले जाने लगी।
इस दृश्य की ओर टकटकी लगाये बच्चे के मुँह में दूध नहीं पहुँचा तो वह अचानक उद्विग्न होकर रोने लगा। उसके मुँह से निप्पल निकलकर अलग हो गई। उसने अपने हाथ-पाँव फेंकने शुरू कर दिए। इससे पहले कि आया बोतल को अपने मुँह में लगा पाती, बच्चे का फेंका हुआ एक हाथ जोर से बोतल से टकराया और दूध को बिखेरती बोतल छिटककर दूर जा गिरी। ठीक इसी समय बच्चे का एक पैर आया की आँख के पास जा लगा और उस जगह को सहलाती हुई आया चीख पड़ी। एक साथ बच्चे के जोर-जोर से रोने और आया के चीखने की आवाजें सुनकर बच्चे की माँ बाथरूम से दौड़ी-दौड़ी आई, ‘‘क्या हुआ…..क्या हुआ मेरे बच्चे को?’’
अन्दर आते ही बदहवास-सी माँ ने बच्चे को गोद में उठाकर सीने से चिपकाया फिर कमरे के पूरे परिदृश्य पर दृष्टि डाली। कहीं निप्पल कहीं बोतल, बिखरा हुआ दूध और दूध से भीगे आया के कपड़े; अजीब सी स्थिति को समझने में उसे कुछ क्षण लगे, कुछ-कुछ उसकी समझ में आया। अचानक उसके मुँह से निकला, ‘‘पूतना कहीं की…’’
‘‘ऐ माई, पूतना क्यों कहती है मुझे। मेरे को दोष क्यों देती है? मेरे पै विश्वास नहीं है तो बच्चे की देखभाल की जिम्मेवारी काहे को देती है मुझे।’’
पकड़े गए झूठ को गटकती हुई वह लड़की बोली।
‘‘हाँ! यही तो गलती हो गई मुझसे, जो तुझे अपने बच्चे की छोटी-छोटी जिम्मेवारियाँ भी…..’’ कहते हुए बच्चे को कसकर अपनी छाती से चिपका लिया। ‘‘….तेरा भी क्या कसूर! जो जिम्मेवारी माँ होने के नाते मुझे ही निभानी चाहिए, वह भी तुझे सौंप दी तो यह तो होना ही था… और मरी तुझे दूध पीने की इच्छा थी तो मुझे तो कहती…’’।
बच्चा रोये जा रहा था। बच्चे को चुपाने की कोशिश कराती माँ निप्पल और
बोतल को उठाने लगी। आया एक ओर सिर झुकाए खड़ी थी।
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गतिविधियाँ

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
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