जून -2018

पुस्तकप्रकाश की आशा जगाता – ‘कीचड़ में कमल’     Posted: June 1, 2018

‘साहित्य समाज का दर्पण होता है।’ यह कथन बचपन से पढ़ते-सुनते आए हैं। वस्तुतः यह सच है। या ये कहें कि यह सच का एक अंश है। यदि पूर्ण सत्य की बात की जाए तो साहित्य समाज का दर्पण होने के साथ-साथ समाज के दिग्दर्शक की भी भूमिका निभाता है। साहित्यकार समाज को आईना दिखाते हुए उसे सकारात्मक पथ पर बढ़ने की चिंतन-शक्ति भी प्रदान करता है। साहित्यिक विधाओं में जब लघुकथा की कल्पना की जाती है तो यह सामाजिक विसंगतियों पर बड़ी पैनी नजर डालती है और कम शब्दों में तीखे अंदाज में पाठकों को रोमांचित एवं प्रभावित करती है। एक कुशल लघुकथाकार अपनी रचना पर चिंतन कभी बन्द नहीं करता। और रचना के माध्यम से सामाजिक चेतना जगाने की जिम्मेवारी को काँधों पर उठाए चलता है।

वह सामाजिक परिवेश में व्याप्त अंधेरे का भान कराता है लेकिन वहीं रोशनी की उपस्थिति अथवा उसकी किरण का भी एहसास कराता है। कुछ ऐसा ही करने का सफल प्रयास किया है डॉ राधेश्याम भारतीय ने अपने द्वितीय लघुकथा संग्रह ‘कीचड़ में कमल’ के माध्यम से।

इस संग्रह में कुल अठहत्तर लघुकथाएँ हैं जो कई विषयों को छूती हैं। शीर्षक कथा ‘कीचड़ में कमल’ अपने शीर्षक के अनुरूप कथ्य लिए हुए है। बेईमानों के बीच ईमानदार को ईमानदार बनाए रखने में एक बेईमान ही महती भूमिका निभाता है। इससे साफ जाहिर होता है कि अच्छाई हर मन में विद्यमान है। और कहीं भी मरती नहीं है।

लोग देशभक्त हों ये तो सभी चाहते हैं। पर जब बात खुद की औलाद की हो तो साँप सूंघ जाता है। लघुकथा’चेहरा’ के जरिये लेखक यही बात ससक्त रूप से रखता है।

पति-पत्नी ,माता-पिता,सन्तान,शिक्षक-विद्यार्थी,अन्य पारिवारिक एवं दैहिक  संबंधो पर आधारित कथाओं के द्वारा लेखक ने दैनिक जीवन की अनेक छोटी-बड़ी विसंगतियों व समस्याओं पर चिंतन प्रस्तुत किया है जिनमें प्रमुखतः ‘काला अध्याय’,’सुख’ , ‘चेहरे’ , ‘ पुल’, ‘औरत’ ,’कोट’, ‘मेरा घर’ , ‘ एक दुखियारी माँ’ , ‘खून का रिश्ता’ , ‘पगड़ी’, ‘प्रतिरूप’, ‘बड़ा हूँ ना!’

कुछ व्यक्ति स्वार्थाधीन होकर सामाजिक भेद-भाव को भूलने का प्रपंच करते हैं,लेकिन दिल में सदैव पोषित रखते हैं। ऐसी मानसिकता भी लेखक की लेखनी से बच नहीं पाई। कई कथाओं के माध्यम से लेखक ऐसी मानसिकता पर अपना रोष व्यक्त करता है। जिनमें ‘विडम्बना’ , ‘विषवृक्ष’और ‘ बिरादरी’ प्रमुख हैं।

सामाजिक विषमताओं,भ्रष्टाचार,किसान,खेतिहर मजदूर व अन्य कामगारों के हालात पर भी लेखक की लेखनी बहुत तीक्ष्ण नजर फेरती है। ‘आजादी-1,’ ‘मेहनताना’ , ‘पीड़ा’,’मुआवजा’ लघुकथाओं से यही परिलक्षित होता है।

लेखक ने स्थानीय राजनीति में लोगों की न्यून मानसिकता,जातीय भेदभाव को भी कई लघुकथाओं के जरिए उजागर किया है।

‘बच्चे’ और ‘कलाकार’ दोनों ही दिल को छूने वाली कथाएं हैं जो सेवानिवृत शिक्षक का स्कूल के बच्चों से लगाव व एक मूर्तिकार के द्वारा धन से अधिक कला को महत्व देना मार्मिक अंदाज में प्रस्तुत करती हैं।

इसके अलावा बेटी एवं दहेज प्रथा आदि विषयों को भी लेखक मजबूती से छूता है।

‘सजा’  व ‘गिद्ध’ लड़कियों पर हो रहे अत्याचारों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती प्रतीत होती हैं।

मजहबी उन्मादियों के द्वारा कन्या शिक्षा का सशस्त्र विरोध किया जाता रहा है। विद्यालय जाने वाली छात्राओं पर जानलेवा हमले होते रहे हैं। इस पर भी लड़कियों के हौंसलों की कहानी कहती है लघुकथा ‘डर’।

डॉ राधेश्याम भारतीय की लघुकथाएँ पाठक को न केवल आकर्षित करती हैं अपितु उसके दिल को कचोटती भी हैं। उनकी लेखनी में सामाजिक चिंतन एवं आम जन के प्रति पीड़ा के दर्शन होते हैं।

डॉ भारतीय की भाषा बिल्कुल आम पाठक के करीब है। उन्होंने आँचलिक परिवेश की बोली को भी संवादों में ढालने का सफल प्रयास किया है। कुछ कथाओं में संवादों में यह स्पष्ट दिखती है। तथापि आम हिंदी भाषी पाठक के लिए सहज समझ आने वाली है।

लघुकथा के पाठकों के लिए पठनीय एवं लेखकों के लिए पठनीय एवं संग्रहणीय कृति है लघुकथा संग्रह ‘कीचड़ में कमल’।

-०-कीचड़ में कमल:लेखक:डॉ राधेश्याम भारतीय,प्रकाशक:अयन प्रकाशन,1/20,महरौली,नई दिल्ली-110030;मूल्य:₹250,पृष्ठ :128, संस्करण :2018

-०-सतविन्द्र कुमार राणा

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

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