जुलाई-2017

देशान्तरप्लूटोक्रेट     Posted: April 1, 2017

अनुवाद-सुकेश साहनी   

 मैंने भ्रमण के दौरान एक द्वीप पर आदमी के चेहरे और लोहे के खुरों वाला भीमकाय प्राणी देखा, जो लगातार धरती को खाने और समुद्र को पीने में लगा हुआ था। मैं बड़ी देर तक उसे देखता, फिर नज़दीक जाकर पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे लिए इतना काफी नहीं है? क्या तुम्हारी भूख प्यास कभी शान्त नहीं होती?’’

उसने जवाब दिया,‘‘ मेरी भूख–प्यास तो शान्त है। मैं इस खाने पीने से भी ऊब चुका हूँ, पर डरता हूँ कि कहीं कल मेरे खाने के लिए धरती और पीने के लिए समुद्र नहीं बचा तो क्या होगा?’’

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

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