दिसम्बर-2017

देशान्तरबड़ा पागलखाना     Posted: July 1, 2015

( अनुवाद: सुकेश साहनी)

पागलखाने के बगीचे में मेरी उस नवयुवक से मुलाकात हुई। उसका सुंदर चेहरा पीला पड़ गया था और उस पर आश्चर्य के भाव थे।
उसकी बगल में बैंच पर बैठते हुए मैंने पूछा, ‘‘आप यहाँ कैसे आए?’’
उसने मेरी ओर हैरत भरी नज़रों से देखा और कहा,‘‘अजीब सवाल है, खैर….उत्तर देने का प्रयास करता हूँ। मेरे पिता और चाचा मुझे बिल्कुल अपने जैसा देखना चाहते हैं, माँ मुझे अपने प्रसिद्ध पिता जैसा बनाना चाहती है, मेरी बहन अपने नाविक पति के समुद्री कारनामों का जिक्र करते हुए मुझे उस जैसा देखना चाहती है, मेरे भाई के अनुसार मुझे उस जैसा खिलाड़ी होना चाहिए। यही नहीं….मेरे तमाम शिक्षक मुझमें अपनी छवि देखना चाहते हैं।….इसीलिए मुझे यहाँ आना पड़ा। यहाँ मैं प्रसन्नचित्त हूँ….कम से कम मेरा अपना व्यक्तित्व तो जीवित है।’’
अचानक उसने मेरी ओर देखते हुए पूछा, ‘‘लेकिन यह तो बताइए….क्या आपकी शिक्षा और बुद्धि आपको यहाँ ले आई?’’
मैंने कहा, ‘‘नहीं, मैं तो यूँ ही….मुलाकाती के तौर पर आया हूँ।’’
तब वह बोला, ‘‘अच्छा….तो आप उनमें से हैं ; जो इस चाहरदीवारी के बाहर पागलखाने में रहते हैं।’’
-0-

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-
    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine