जून-2017

देशबदलते चेहरे     Posted: December 1, 2015

वेंकट जैसे ही लिफ्ट से बाहर निकला , सामने कॉलोनी के दोस्तों को आपस में बातें और ठहाके लगाते हुए देखा तो उधर बढ गया। लेकिन ये क्या वेंकट को देखते ही सभी नजरें चुराते हुए इधर उधर होने लगे।वेंकट दोस्तों को देखकर खुश हो गया था। सोचा था सब उसे गले लगाकर उसके स्वास्थ्य के विषय में पूछेंगे। आखिर वो पुरे कॉलोनी का चहेता और बेहद जिंदादिल इंसान था।सभी के दु:ख सुख में हमेशा खडा रहता था।लेकिन दोस्तों का व्यवहार देखकर दिल छलनी- छलनी हो गया। सभी के चेहरे बदले हुए नजर आ रहे थे।
अरे संतोष, रुक तो! उसने पीछे से संतोष को आवाज देते हुए हाथ पकड लिया।अचानक संतोष ने अप्रत्याशित रूप से हाथ झटककर जोर से धक्का दे दिया। वेंकट गिरते गिरते बचा।
क्या कर रहा है वेंकट? मेरा हाथ क्यों पकडा? अब घर जाकर डेटोल से पूरा शरीर साफ करना पडेगा।तू घर में ही क्यों नहीं पड़ा रहता। तुझे एड्स है तो क्या पुरे कॉलोनी वालों में फैलाएगा? नालायक !
संतोष ,घर में मन ऊब रहा था इसलिए निकल के तुम लोगों से मिलने चला आया। लेकिन तुमलोग ऐसे बदल जाओगे ,कभी सपने में भी नहीं सोचा था। मै हर तीसरे महीने रक्तदान करता था।इस कलोनी के भी कई लोगों को जरूरत पड़ने पर मैंने अपना खून दिया है। संक्रमित सुई से अगर मुझे एड्स हो गया, तो इसमें मेरी क्या गलती?
चल हट सामने से-संतोष जाने लगा।
‘सिर्फ़ गले लगाने या हाथ पकडने से एड्स नहीं होता मेरे दोस्त! हाँ दोस्तों के प्यार से मौत थोड़ी आसान जरूर हो जाती है।’मुस्कुरा उठा वो।
संतोष को जाते हुए देखता रहा । मन ही मन तुलना करता रहा कि इस बीमारी का दर्द ज्यादा तकलीफदेह है या लोगों के बदलते चेहरों का दर्द!
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