जून -2018

देशबिना नाल का घोड़ा     Posted: April 1, 2018

उसने देखा कि ऑफिस के लिए तैयार होते-होते वह चारों हाथ-पैरों पर चलने लगा है। तैयार होने के बाद वह घर से बाहर निकला। जैसे ही सड़क पर पहुँचा, घोड़े में तब्दील हो गया।

अपने-जैसे ही साधारण कद और काठीवाले चमकरदार काले घोड़े में । माँ ,पिता ,पत्नी और बच्चे-सबको उसने अपनी गरदन से लेकर पीठ तक लदा पाया। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, सड़ाक् से

हण्टर उसके पुट्ठे पर पड़ा, ‘‘देर हो चुकी है, दौड़ो….!’’

वह दौड़ने लगा….ठकाठक….ठकाठक….ठकाठक…..ठकाठक।

‘‘तेज…और तेज….!’’ऊपर लदे लोग एक साथ चिल्लाए।

वह और तेज दौड़ा-सरपट।

कुछ ही देर मे उसने पाया कि वह ऑफिस के सामने पहुँचा गया है। खरामा-खरामा पहले वह लिफ्ट तक पहुँचा, लिफ्ट से फ्लोर और फ्लोर से सीट तक। ठीक से वह अभी सीट पर बैठा भी नहीं

था कि पहले से सवार घरवालों को पीछे धकेलकर बॉस उसकी गरदन पर आ लदा।

‘‘यह सीट पर बैठकर आराम फरमाने का नहीं, काम से लगने-लिपटने का समय है मूरख! दौड़….।’’ उसके पुट्ठो पर, कनपटियों पर सण्टी फटाकरता वह चीखा।

उसने तुरन्त दौड़ना शुरू कर दिया-इस फाइल से उस फाइल तक, उस फाइल से उस फाइल तक…लगातार…और दौड़ता रहा जब तक, जब तक कि अपनी सीट पर ढह न गया पूरी तरह पस्त होकर।

एकाएक उसकी मेज पर रखे फोन की घण्टी घनघनाई-ट्रिंग-ट्रिंग- ट्रिंग ग…. ट्रिंग…..!

उसकी आँख खुल गई। हाथ बढ़ाकर उसने सिरहाने रखे अलार्म-पीस को बन्द कर दिया और सीधा बैठ गया। पैताने पर, सामने उसने माँ को बैठे पाया।

‘‘नमस्ते माँ!’’ आँखें मलते हुए माँ को उसने सुबह ही नमस्ते की।

‘‘जीते रहो!’’ माँ ने कहा, ‘‘तुम्हारी कुण्डली कल पण्डितजी को दिखाई थी। ग्रह-दशा सुधारने के लिए तुम्हें काले घोड़े की नाल से बनी अँगूठी अपने दाएँ हाथ की अँगुली में पहननी होगी।’’

माँ की बात पर वह कुछ न बोला।

‘‘बाजार में बहुत लोग नाल बेचते हैं’’- माँ आगे बोली, ‘‘लेकिन, उनकी असलियत का कुछ भरोसा नहीं है। बैल-भैंसा किसी के भी पैर की हो सकती हैं।….मैं यह कहने को आई थी कि दो-चार जान-पहचानवालों को बोलकर काला घोड़ा तलाश करो, ताकि असली नाल मिल सके।’’

‘‘नाल पर अब कौन पैसे खर्च करता है माँ!’’ माँ की बात पर वह कातर स्वर में बुदबुदाया, ‘‘हण्टरों और चाबुकों के बल पर अब तो मालिक लोग बिना नाल ठोंके ही घोड़ों को घिसे जा रहे हैं……।’’

यह कहते हुए अपने दोनों पैर चादर से निकालकर उसने माँ के आगे फैला दिए, ‘‘लो देख लो!’’

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

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