अगस्त-2017

संचयनबोल भी इब     Posted: July 1, 2015

सुनसान भोपा रोड पर एक लडक़े ने हाथ से लडक़ी की चलती सायकिल रोक ली- ””ऐ छोरी, माण ले म्हारी बात। एक भी लुगाई ना मेरे घर में। माँ को गुजरे एक बरस हो लिया। तेरे आने से उजाला हो जावेगा।रोटी भी गरम मिलन लगेगी सबको। तन्ने सब सुख दूँगा, कपड़ा गहना सब।यो मत समझ कि मैं आवारा छोरा और तेरे पीछे प्रेम की खातिर भाग रा, मेरे तो इब्बी पढऩे के दिन। बस बापू, भाई को रोटी मिलती रवे टेम से तो मैं बेफिक्र होके सहर जाऊँ पढऩे, बोल भी इब?”
””तो सुन मेरी भी बात, मेरे बापू को मरे 5 साल हो लिए। अपने बापू को भेज मेरी माँ पे चादर डाल दे, उन दोनों का बुढ़ापा भी कटेगा और थारे घर गर्म रोटी भी पकेगी और मैं भी आ जाओंगी थारे घर थारी बहन बनके। राखी पर दे दियो यो कपडे गहने सब, बोल भी इब!”
सुनसान सडक़ पर अब लडक़ी अकेली खड़ी थी।
-0-

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-
    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine