अगस्त-2017

संचयनलघुकथाएँ     Posted: August 1, 2015

भूकम्प

अभी वह ऑफिस जाने की तैयारी में लगा ही था कि सहसा बदहवास सी पत्नी कमरे में आई,”जल्दी बाहर निकलिए…। बिलकुल भी अहसास नहीं हो रहा क्या…भूकंप आ रहा । चलिए तुरंत…।” वो उसकी बाँह पकड़ कर लगभग खींचती हुई उसे घर से बाहर ले गई ।
पत्नी को यूँ रुआंसा देख कर जाने क्यों ऐसी मुसीबत की घड़ी में भी उसे हँसी आ गई । बाहर लगभग सारा मोहल्ला इकठ्ठा हो गया था । एक अफरा-तफरी का माहौल था । कई लोग घबराए नज़र आ रहे थे । कुछ छोटे बच्चे तो बिना कुछ समझे ही रोने लगे थे ।
सहसा उसे बाऊजी की याद आई । वो तो चल नहीं सकते खुद से…और इस हड़बड़-तड़बड़ में वह उनको तो बिलकुल ही भूल गया । वो जैसे ही अंदर जाने लगा कि तभी उसके पाँव मानो ज़मीन से चिपक गए । बाऊजी की ज़िन्दगी की अहमियत अब रह ही कितनी गई है । वैसे भी उनका गू-मूत करते करते थक चुका था वो…और उसकी पत्नी भी…। ऐसे में अगर भूकंप में वो खुद ही भगवान को प्यारे हो जाएँ तो उस पर कोई इलज़ाम भी नहीं आएगा ।
अभी कुछ पल ही बीते थे कि सहसा पत्नी की चीख से वो काँप उठा । उनका दुधमुँहा बच्चा अपने पालने में ही रह गया था ।
अंदर की ओर भागते उसके कदम वहीं थम गए । वह गिरते-गिरते बच गया था। एक हाथ से व्हील चेयर चलाते बाहर आ चुके पिता की गोद में उसका लाल था ।
जाने भूकंप का दूसरा तेज़ झटका था या कुछ और …पर वह गिरते-गिरते बच गया था।
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जानवर

अक्सर वह सड़क पर लावारिस-सा इधर-उधर घूमता दिख जाता। मोहल्ले के लोग बासी-तिबासी खाना उसके आगे डाल देते। वह खाता फिर माला के घर के बाहर बने हौद में भरे पानी को जी भर कर पीता…कुछ देर इधर-उधर देखता, फिर हर फाटक को बन्द देख कर मायूस होकर या तो किसी पेड़ के नीचे सो जाता या फिर सड़क पर निकल जाता…।
वह कितनी भी दूर निकल निकल जाता पर सूरज के डूबने से पहले ही अपने मोहल्ले में लौट आता। मोहल्लेवालों को भी न जाने क्यों उससे लगाव सा हो गया था…अनजाने ही उसका इंतज़ार करते। वह आता तो ज्यादातर लोग घर के बाहर आकर उसके आगे कुछ खाने को डाल देते…। वह सबका मुँह देखता, पूँछ हिलाता और फिर रोटी खाकर हौद की ओर बढ़ जाता।
दिन में तो पानी पीकर वह इधर-उधर डोल भी आता, पर रात के समय न जाने क्यों माला के गेट पर बने चबूतरे पर ही सो जाता। माला यह बात जानती थी। वह भी दस-साढ़े दस बजे डिनर लेने के बाद बचा-खुचा खाना बाहर आकर उसे खिलाती…। खिलाना और खाना जैसे एक नियम बन गया था…। बिना उसे खिलाए माला को भी नींद नहीं आती थी और जब तक उसे भी वहाँ से खाना न मिल जाता, वह भी जागा हुआ पूँछ हिलाता रहता।
जाड़ा आ गया था…। माला के पति शहर से बाहर थे। बच्चे खा-पीकर सो गए थे। रसोई का काम समेट माला उसे खाना देने बाहर निकली तो अचानक सहम गई। बाहर, उसके घर के दूसरे वाले गेट की आड़ में खड़े एक विकृत-आवारा आदमी ने अचानक उसे दबोच लिया और फिर उसे घसीटता घर के अन्दर ले जाने लगा। माला भीतर तक काँप गई। इत्ती रात गए जाड़े की वजह से सड़क पर पूरा सन्नाटा था और लोग भी अपने-अपने घरों में रजाई में घुसे या तो सो रहे थे, या टी.वी देख रहे थे।
पकड़ से छूटने की उसने बहुत कोशिश की पर अपराधी काफ़ी बलिष्ठ था…। वह चीख भी नहीं पा रही थी (क्योंकि मजबूत हथेलियों ने उसका मुँह दबा रखा था। अपनी बर्बादी की कल्पना ने उसे बहुत सहमा दिया था। ग़लती उसकी भी थी…न कुत्ते को नियम से खाना देने निकलती न इस अपराधी के जाल में फँसती…। क्या पता वह कई दिन से उसे एक निश्चित समय पर बाहर आता देख कर उसकी ताक में लगा रहा हो…। पर अब क्या हो सकता था…?
सोचकर उसकी आँखों से आँसू बह ही रहे थे कि तभी उस अपराधी की चीख सुन कर अवाक रह गई। वह उसे छोड़ ज़मीन पर गिरा तड़प रहा था और उन दोनों के पीछे ही घर में आ गए कुत्ते ने उसके पैरों में अपने नुकीले दाँत पूरी गहराई तक घुसेड़ रखे थे और किसी तरह छोड़ नहीं रहा था। अपराधी की लगातार गूँज रही दर्दनाक चीखों को सुन कर पूरा मोहल्ला इकठ्ठा हो गया था। माला से सारी बात सुनकर उसे अधमरा करने की रही-सही कसर मोहल्ले वालों ने पूरी कर उसे पुलिस के हवाले कर दिया।
देर रात गए सारी अफ़रा-तफ़री से फ़ुर्सत पा अन्दर कमरे में उस कुत्ते को सहलाती माला सोच रही थी कि लोगों की निगाह में यह कुत्ता एक जानवर है पर असली कुत्ता तो वह था जो आदमी की खोल में किसी जानवर से भी ज्यादा ख़तरनाक हो सकता था…।
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डर्टी पिक्चर

रामप्रसाद जी जब से ‘डर्टी पिक्चर’ देख कर लौटे थे, तब से उनका मन अजीब-अजीब सा हो रहा था। घर पर विभा को उन्होंने ऑफ़िस में ढेर सारा पेंडिंग काम बता कर देर तक रुकने की बात कही थी, जबकि सच्चाई तो यह थी कि एक दिन पहले ही उनका अपने ऑफ़िस के कुछ लोगों के साथ पिक्चर देखने का प्रोग्राम बन गया था। ऐसा नहीं था कि वे विभा के साथ पिक्चर देखने नहीं जाते थे, पर जानते थे, संस्कारों की दुहाई देने वाली विभा उनके साथ यह फ़िल्म देखने चलने से तो रही। जब भी कोई ऐसी एडल्ट टाइप की फ़िल्म आती और उनका देखने का मन करता, विभा हमेशा अपना रोना चालू कर देती…ये भी कोई उमर है ऐसी गन्दी-सन्दी फ़िल्म देखने की…अरे तुम पचपन के हो गए और मैं पचास की…। रश्मि जानेगी तो क्या कहेगी…? यही न कि मम्मी वैसे तो संस्कार-संस्कार की रट लगाए रहती हैं और खुद…छिः, तुम ऐसा सोचते भी कैसे हो…? नाम रामप्रसाद और काम रावणप्रसाद वाले…।
रामप्रसाद अपने लिए रावण की उपाधि पाने के बाद से इस विषय पर चुप ही लगा गए थे…। सब से अच्छा तरीका था या तो अकेले या फिर अपने जैसे दो-चार तथाकथित ‘बुढ़ऊ’ लोगों के साथ ही ऑफ़िस में ओवरटाइम का बहाना बना कर पिक्चर देख आना।
रामप्रसाद जी रह-रह कर विद्या बालन के बोले गए द्विअर्थी संवादों को याद कर के मुस्करा उठते थे। बड़ी गुदगुदी मचती थी उनको…। विभा ने एक-दो बार पूछा भी, क्या बात है…किस बात पर इतनी हँसी आ रही है…? पर रामप्रसाद जी महज ‘कुछ खास नहीं, बस ऑफ़िस की किसी बात पर…’ कह कर टाल गए थे। विभा ने भी फिर आगे कुछ नहीं पूछा था। रात को भी उनके सपने में कई बार विद्या आई और वे खुद को नसीर की जगह देख कर पुलकित होते रहे…। आखिर नसीर भी तो लगभग उनकी ही उमर का है…जब वो स्क्रीन पर रंगरेलियाँ मना सकता है तो फिर वे सपने में क्यों नहीं…?
दूसरे दिन इतवार था। उनकी नींद भी देर से खुली। विभा वैसे भी छुट्टी वाले दिन उन्हें जल्दी नहीं उठाती और फिर कल रात तो नींद भी बड़ी टूटी-टूटी सी आई। फिर भी वे फ़्रेश ही महसूस कर रहे थे। एक मादक अँगड़ाई ले रामप्रसाद जी जब कमरे से बाहर आए तो विभा और रश्मि नाश्ता कर रही थी। हमेशा की तरह वे अखबार खोल कर बैठ गए और विभा उनके नाश्ते की प्लेट उनके आगे सरका रश्मि की बातें सुनने लगी।
इधर-उधर की बातों से हट जैसे ही उन्होंने रश्मि के मुँह से डर्टी पिक्चर का नाम सुना, उनके कान खड़े हो गए। हाथों में अखबार खुला था, पर दिमाग और कान पूरी सतर्कता से रश्मि की ओर थे।
रश्मि कह रही थी…पता है मम्मी, अपनी क्लास की कई लड़कियाँ पेरेण्ट्स से छुप कर ये फ़िल्म देखने गई थी। घर में कह दिया कि एक्स्ट्रा क्लासेज हैं और पूरा ग्रुप का ग्रुप सिनेमाहॉल में था। कुछ के तो बॉयफ़्रेण्ड भी थे साथ में…। अगर इस फ़िल्म के डॉयलाग और कुछ सीन्स वल्गर न होते न, तो सच्ची में हम भी चलते…। अच्छा मम्मी, सोचो तो ज़रा, उस बेचारी लड़की की ज़िन्दगी पर फ़िल्म बनाते समय या देखते वक़्त किसी ने भी उसके जीवन के दुःखों के बारे में गहराई से सोचा होगा…? ऐसा क्या महसूस किया होगा उसने या उस पर क्या बीती होगी कि उसे आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा होगा…? मैं तो सही में आप ही की तरह हूँ…मुझे तो किसी के दुःख में गन्दगी देखने वालों पर घिन आती है…। बाप रे…!
रामप्रसाद जी को पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था कि उनके पैरों तले की ज़मीन फटे और वे उसमें समा जाएँ…।
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जीव

“पिंकी, ओ पिंकी…अरे मैने कल सुबह की रोटी यहाँ कैसेरोल में रखी थी, कहाँ गई…?”
मिसेज शर्मा की परेशान आवाज़ सुन पिंकी अन्दर के कमरे से निकल आई,”क्या हुआ मम्मी…? वो कैसेरोल की रोटी तो मैने ली है, शैडो को दूध में भिगो कर दे दूँगी…। बर्बाद करने से क्या फ़ायदा…?”
पिंकी के हाथ में बासी रोटी देख मिसेज शर्मा ने झट से आगे बढ़ कर वो रोटी उसके हाथ से छीन ली,”पागल हुई है क्या…? गर्मी का समय है…बासी रोटी खा कर शैडो बीमार पड़ गया तो…?”
फिर पिंकी का बना मुँह देख कर उन्होंने कुछ पुचकारते हुए कहा,”बेटा, शैडो कुत्ता है ,तो क्या हुआ…? हमारा पालतू है, घर के बच्चे की तरह है…और फिर ये क्यों भूलती हो कि हमारी-तुम्हारी तरह वह भी एक जीव ही है…। क्या हम कल सुबह की यह बासी रोटी खाएँगे…? नहीं न…। फिर उस बेजुबान के साथ यह अन्याय क्यों…? इसे कैसेरोल में ही रख दे और महाराजिन आए तो उससे शैडो की भी दो ताज़ी, मोटी रोटियाँ बनवा लेना और दूध में भिगो कर दे देना…।”
दोपहर में सोकर कमरे से बाहर आई पिंकी मम्मी को ओवन में वही बासी रोटियाँ गर्म करते देख हैरान रह गई,” ये बासी रोटी गर्म क्यों कर रही मम्मी…?”
“चुपकर…” मम्मी ने उसे झट से चुप करा दिया और रोटी व एक छोटी कटोरी दाल लेकर बाहर निकल गई। बरामदे में दोपहर के बर्तन माँज चुकी उनकी दस वर्षीय महरी सरोज फ़्रॉक से पसीना पोंछती मम्मी का इंतज़ार कर रही थी।
“ले सरोज, खा ले…तेरे लिए आज दो रोटियाँ बचा कर रखी थी…।” मम्मी ने बड़े प्यार से सरोज के हाथ में रोटी-दाल की प्लेट पकड़ाते हुए कहा,”जितनी देर में तू घर जाती खाने, मैने तेरा वह टाइम तो बचा ही दिया…। खा कर ज़रा दस मिनट मेरा पैर दबा देना…बहुत दर्द हो रहा है…।”
सरोज ने कृतज्ञतापूर्वक हामी भरी तो मिसेज शर्मा चहक उठी,” भई, जहाँ हम इतने लोग खाते हैं, वहाँ एक जीव ने और खा लिया तो मेरा क्या घट जाएगा…? बल्कि भगवान और देगा…भूखे जीव का पेट भरने से बड़ा कोई पुण्य नहीं…।”

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गरीब

मई की चिलचिलाती दोपहर थी। टैम्पो से उतर कर मैं घर जाने के लिए रिक्शा ढूँढ रही थी, पर तपती धूप में रिक्शा तो क्या,लोग भी इक्का-दुक्का ही नज़र आ रहे थे। सहसा एक रिक्शा आते दिखा तो मैं तेज़ी से लपकी,”पाण्डुनगर चलोगे क्या?”
“चलेंगे क्यों नहीं…पन्द्रह रुपए पड़ेंगे…।”
“ज्यादा माँग रहे…बारह नहीं लोगे…?” हालाँकि मन में मैं जानती थी कि पाण्डुनगर के लिए पन्द्रह रुपए ही पड़ते हैं।
“ग़लत नहीं माँग रहा दीदी, अपने हक़ से ज्यादा नहीं लेता…। कोई जबरदस्ती नहीं है, चलना हो तो चलिए, नहीं तो नहीं…लेकिन पन्द्रह से कम में नहीं चलूँगा…।”
उसके अक्खड़पने पर गुस्सा तो बहुत आया, कोई और दिन होता तो मैं मोल-तोल कर के कुछ कम तो करा ही लेती,पर इतनी भीषण गर्मी देख कर मरता क्या न करता वाली बात थी सो बिना बहस किए चुपचाप रिक्शे पर बैठ गई।
लू के थपेड़े बेतहाशा मुँह पर वार किए जा रहे थे। दुपट्टे से मुँह लपेट मैने एक निगाह रिक्शे वाले पर डाली। मुश्किल से बीसेक साल का रहा होगा। धूप से तपे काले शरीर पर मेहनत का असर साफ़ झलक रहा था।
अचानक मेरी निगाह सड़क के किनारे खड़े गन्ने के रस वाले पर पड़ी। गला प्यास से चटकने लगा था, सो रिक्शेवाले से कह कर मैने रिक्शा रुकवा लिया।
अपने लिए बड़ा गिलास रस निकालने को कह दिया था। रिक्शेवाला एक कोने की दुकान की छाँव में जाकर अँगौछे से मुँह पोंछता खड़ा हो गया। उसकी शक्ल पर गर्मी से उपजी व्याकुलता साफ़ नज़र आ रही थी। मुझे जाने क्यों उस पर तरस आ गया।
“सुनो, आकर तुम भी रस पी लो…।”
“नही दीदी, तुम ही पीओ…। हम लोग गाढ़े पसीने की कमाई पल- पल ऐसे खरच करने लगेंगे तो हो चुका…।”
“अरे पी लो…पैसा मैं दे दूँगी…। भयानक गर्मी है…।” पता नहीं कैसे मेरे मुँह से निकल गया।
रिक्शेवाले ने पल भर सोचा फिर आकर ठेले के पास खड़ा हो गया। रस पी के रिक्शे की यात्रा फिर चालू हो गई। ऐसा लग रहा था मानो मीलों लम्बा सफ़र हो।
घर आ गया था। मैने पन्द्रह रुपए निकाल कर रिक्शेवाले की ओर बढ़ा दिए,”नहीं दीदी, इतना नहीं चाहिए…।”
उसकी बात सुन कर मेरा पारा चढ़ गया,”बड़े बदतमीज़ हो…। एक तो किराया कम नहीं किया, फिर भी मैने दया करके , इतनी गर्मी में अपने जैसा ही इन्सान समझ कर गन्ने का रस पिलाया, ऊपर से अब झिकझिक कर रहे…। ज़रा भी लिहाज नहीं है तुम लोगों में…इसी लिए तो भगवान ने भी तुम लोगों को गरीब ही बनाया है…।”
मेरी बात सुनकर पल भर तो वह मेरा मुँह ताकता रहा, फिर अँगौछे से पसीना पोंछता हुआ बोला,”आप मेरी बात समझ ही नहीं रही, मैं कह रहा हूँ, पन्द्रह रुपया नहीं चाहिए…इसमें से गन्ने के रस का पैसा काट कर बचा हुआ पैसा दीजिए…। मैं अपने हक़ का पैसा लेता हूँ , भीख नहीं…।”
अब अचानक मैं अपने को ग़रीब महसूस करने लगी थी।
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-
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    -सम्पादक द्वय

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