सितम्बर-2017

देशभूत     Posted: September 1, 2017

  जब सरपंच गाँव के रामफूल के घर पहुँचे तो देखा कि घर में अफरा- तफरी का माहौल था ।उसकी बहू के बाल बिखरे,तन के कपडे अस्त -व्यस्त,कभी ठहाका तो कभी जोर .जोर से रोना— न समझ आने वाली भाषा में बड़बड़ाना ।इकट्ठा भीड़ बाते कर रही थी –“ ये तो भूत का साया है।”

कुछ  सोचने के बाद सरपंच बोला –“ हाँ भई लगता है -बहू पर भूत का साया है,पर चिंता की कोई बात नहीं। मैं भूत निकालना जानता हूँ”- कहते हुए वह बहू को घसीट कर कोठरी में ले गए । “देख बेटा, मैं तुम्हारे पिता समान हूँ।तुझको जो परेशानी है ,वो मुझको बोल —वरना भूत के लिए तो दाम लगाने होंगे।” ये सुनते ही बहू रोते हुए बोली-“बाबा मैं सारा दिन कोल्हू के बैल की तरह काम करती हूँ ।थककर शरीर चकना चूर हो जाता है —फिर मेरी हिम्मत ही नहीं रहती कि शाम को खेत से चारा ला पाऊँ।”

सरपंच कुछ सोच बहू के सिर पर हाथ रख बाहर आकर बोले –“देखो भाइयो !  मैंने भुत निकाल दिया है।रामफूल के खेत मे जो बरगद का पेड़ है, वहीं से बहू को भूत का साया लगा है ।रामफूल, आगे से बहू उस खेत न जाए, ध्यान रखना ।अन्य कोई भी जा सकता है।बाकी चिंता ना करो,मैंने भूत को गाँव से बाहर निकाल दिया है।

-0-राज बुडानिया;श्रीगंगानगर<मोबा-9414064333

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
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