जून-2017

मेरी पसन्दमन की गहराइयों में बसी लघुकथाएँ     Posted: December 1, 2015

रोज़मर्रा के जीवन में कितनी ही घटनायें घटित होती हैं। लेखक समाज में अपने आसपास घटित उन घटनाओं को देखता है, उनसे प्रभावित होता है, उन्हें महसूसता है और उन घटनाओं को शब्दों में पिरो कर साहित्य की विविध विधाओं में कलमबद्ध करता है ,जिनमें लघुकथा अपने विशिष्ट गुणों के कारण लोकप्रिय हो रही है। आज के आपाधापी के युग में जब किसी के पास लम्बी रचनाओं को पढ़ने का समय नहीं। ऐसे में लघुकथा का प्रचलन और भी बढ़ रहा है।
लघुकथा कलेवर में भले ही छोटी होती है ; लेकिन उसकी अभिव्यक्ति, भाव गहरे होते हैं जो पाठकों के हृदय के छू लेते हैं , उनके मन को उद्वेलित करते हैं। यही कारण है कि पाठकों में लघुकथा के प्रति रुचि बढ़ रही है। अच्छी लघुकथा वही होती है, जिसके कथानक में कसावट हो , कम शब्दों में अधिक कहने का सामर्थ्य रखती हो। भाषा सरल हो,पात्र, स्थान समय के अनुसार हो तभी कथा प्रभावशाली बन पाती है।
जो कथा एक बार पढ़ने से भूले नहीं, मन की गहराइयों में बस जाए और बार -बार जिसका स्मरण आता रहे वही पसंद की लघुकथा बन जाती है। अनेक ऐसी लघुकथाएँ हैं ;जिनकी अमिट छाप हृदय पटल पर है; जिन्हें मैं विस्मृत नहीं कर पाती हूँ । वे आँखों के समक्ष चित्र बन कर उभरती रहती हैं। उनमें पहली लघुकथा श्री रामेश्वर काम्बोज ” हिमांशु ” जी की लघुकथा ”क़मीज़ ” मध्यम वर्ग की विवशताओं मानवीय सम्बंधों को दर्शाती , वेतन भोगी की आर्थिक तंगी को उकेरती हुई, भावपूर्ण, मर्मस्पर्शी रचना है जो पाठक के अंत:स्तल को छू जाती है, उद्वेलित करती है।
महीने का अंत है। पर्स में केवल 160 रुपये हैं। उसमें से भी 150 रुपये घर का कोई एक सदस्य निकाल लेता है। घर का स्वामी परेशान है कि शेष दिन केवल दस रुपये में कैसे कटेंगे। लघुकथा उस समय और भी मार्मिक बन जाती है जब बड़ा बेटा सेल ख़रीदी क़मीज़ पिता के लिए लेकर आता है और उसका पिता को यह कहना कि किसी अवसर पर पहनने के लिए अच्छी क़मीज़ नहीं है। यदि वह पिता से पूछकर पैसे लेकर जाता तो वह उसे क़मीज़ नहीं ख़रीदने देते। बेटे का यह कहना मन को छू जाता है।
घर के दायित्वों को निभाने वाले गृगस्वामी की मनोव्यथा, तंगहाली का यथार्थ चित्रण कर के लेखक ने अपनी सूक्ष्मदर्शिता का परिचय दिया है। ” कमीज” लघुकथा, लघुकथाओं की लम्बी श्रेणी में विशेष स्थान रखती है।
मेरी पसंद की दूसरी लघुकथा है अनिता ललित की ” ख़ास आप सब के लिए” ।यह एक नये विषय को लेकर लिखी गई है जो आज की कृत्रिम सामाजिकता और रुग्ण मानसिकता को दर्शाती लघुकथा है। गृहिणी त्योहार पर गुझिया बनाती है। बच्चे का मन गुझिया खाने को ललचा रहा है लेकिन उसे गुझिया के बदले थप्पड़ मिलता है। सास पूजा के लिए गुझिया की प्रतीक्षा कर रही है ; लेकिन गृहिणी उन्हें प्लेट में सजाकर भिन्न भिन्न ऐंगिल से चित्र खींच रही है ; ताकि वह उसे फ़ेस बुक पर डालकर मित्र वर्ग में अपनी पाक कला के कौशल का डंका बजा सके। उसे बहुत सारे लाइक्स और कमेण्ट्स भी मिलते हैं और वह फूली नहीं समाती। अपनों की इच्छाओं की क़ुर्बानी देकर प्रशंसा पाने की चाह, वाहवाही लूटने की होड़ में उसे बाह्य आत्मतुष्टि तो मिल गई ,लेकिन परिवारके प्रति सद्भाव और प्रेम की ज़रूरतें गौण हो गईं।
छोटी सी एक घटना हमारे बदलते समाज का चित्र प्रस्तुत करती है कि किस तरह सोशल मीडिया के अतिवाद के कारण लालसा के नाम पर भावना, संवेदना की बलि दी जा रही है।
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1-ख़ास आप सबके लिए!
अनिता ललित

गर्म-गर्म गुजिया एक सुंदर प्लेट में सजी हुई मेज़ पर रखी हुई थीं। वह अपने मोबाइल से भिन्न-भिन्न एंगल से उस गुजिया से सजी प्लेट का फ़ोटो खींच रही थी-मगर उसके मन का फ़ोटो नहीं आ रहा था। वह बहुत जल्दी में लग रही थी और इसलिए खीझ भी रही थी। मेज़ के दूसरे कोने में उसका लैपटॉप रखा हुआ था, जिसमें वह बीच-बीच में झाँक कर आती थी और उसकी बेचैनी और भी बढ़ जाती थी। मानों वह किसी ”रेस” में भाग ले रही हो। इतने में उसका बेटा चिंटू, खेलकर आया और इतनी सुंदर गुजिया देखकर उससे रहा न गया और ” अहा! गुजिया! मम्मा ! बहुत ज़ोरों की भूख लगी है!”कहकर प्लेट पर झपट पड़ा। ”चटाक् ”… की आवाज़ के साथ एक और आवाज़ गूँजी… ” दो मिनट का सब्र नहीं है! कोई मैनर्स नाम की चीज़ भी सीखी है? भुक्कड़ की तरह टूट पड़े बस!”
फिर सन्नाटा छा गया। चिंटू प्लेट तक पहुँच भी न पाया। उसे अपना क़सूर भी न समझ आया। बस अपना गाल सहलाता हुआ, सहम कर ठिठक गया। वह बड़बड़ाती हुई फिर से गुजिया की प्लेट की फ़ोटो लेने लगी। इतने में एक संकोचभरी आवाज़ आई,”बहू ! अगर तुम खाली हो गई हो तो गुजिया ले आना, भगवान को भोग लगा दें?”
“आती हूँ!… सबको अपनी ही पड़ी है! हुँह !”
कहती हुई वह लैपटॉप पर बैठकर कुछ करने लगी। थोड़ी ही देर में उस ”गुजिया की प्लेट” की फ़ोटो फ़ेसबुक पर लगी हुई थी , और उसका शीर्षक था- “ख़ास आप सबके लिए!”
उसपर ढेरों ”लाइक्स” और ”वाह! वाह! गृहिणी हो तो आप जैसी !” –कमेंट्स आने लगे और वह गर्व से फूली नहीं समाई!
anita.atgrace@gmail.com
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2-कमीज़
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

महीने की आखिरी तारीख! शाम को जैसे ही पर्स खोलकर देखा, दस रुपये पड़े थे। हरीश चौंका, ‘सुबह एक सौ साठ रुपये थे। अब सिर्फ़ दस रुपये बचे हैं?’
पत्नी को आवाज़ दी और तनिक तल्खी से पूछा, ‘पर्स में से एक सौ पचास रुपये तुमने लिये हैं?’
‘नहीं, मैंने नहीं लिये।’
‘फिर?’
‘मैं क्या जानूँ किसने लिये हैं।’
‘घर में रहती हो तुम,फिर कौन जानेगा?’
‘हो सकता है किसी बच्चे ने लिये हों।’
‘क्या तुमसे नहीं पूछा?’
‘पूछता तो मैं आपको न बता देती, इतनी बकझक क्यों करती।’
हरीश ने माथा पकड़ लिया। अगर वेतन मिलने में तीन-चार दिन की देरी हो गई तो घर में सब्ज़ी भी नहीं आ सकेगी। उधार माँगना तो दूर, दूसरे को दिया अपना पैसा माँगने में भी लाज लगती है। घर में मेरी इस परेशानी को कोई कुछ समझता ही नहीं!
‘नीतेश कहाँ गया?’
‘अभी तो यहीं था। हो सकता है खेलने गया हो।’
‘हो सकता है का क्या मतलब? तुम्हें कुछ पता भी रहता है या नहीं ’,वह झुँझलाया।
‘आप भी कमाल करते हैं। कोई मुझे बताकर जाए तो ज़रूर पता होगा।बताकर तो कोई जाता नहीं, आप भी नहीं’-पत्नी ठण्डेपन से बोली।
इतने में नीतेश आ पहुँचा। हाथ में एक पैकेट थामे।
‘क्या है पैकेट में?’ हरीश ने रूखेपन से पूछा। वह सिर झुकाकर खड़ा हो गया।
‘पर्स में से डेढ़ सौ रुपये किसने लिये?’
‘मैंने लिये’- वह सिर झुकाए बोला।
‘किसी से पूछा?’ हरीश ने धीमी एवं कठोर आवाज़ में पूछा।
‘नहीं’-वह रुआँसा होकर बोला।
‘क्यों? क्यों नहीं पूछा?’-हरीश चीखा।
‘चुप क्यों हो? तुम इतने बड़े हो गए हो। तुम्हें घर की हालत का अच्छी तरह पता है। क्या किया पैसों का?’-उसने दाँत पीसे।
नीलेश ने पैकेट आगे बढ़ा दिया- ‘पंचशील में सेल लगी थी। आपके लिए एक शर्ट लेकर आया हूँ। कहीं बाहर जाने के लिए आपके पास कोई अच्छी शर्ट नहीं है ’
‘फि फिर.. भी..पूछ तो लेते ही’- हरीश की आवाज़ की तल्खी न जाने कहाँ गुम हो गई थी। उसने पैकेट की सीने से सटा लिया।
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-
    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

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