जुलाई -2018

देशमास्टर जी     Posted: August 1, 2016

सड़क के दोनों ओर पेड़ों की कतारे थी । पेड़ो की कतारो से सड़क की शोभा को चार चाँद लगे हुये थे । सैकड़ो की संख्मा में हर आयुवर्ग के लोग प्रभात-भ्रमण हेतु उस ओर खिंचे चले आते थे । पिछले कुछ दिनों से एक शिक्षक भी हमारे संग घूमने आने लगे थे वो अभी -अभी  स्थानांतरित होकर इस शहर में आये थे । अचानक एक सुबह हम सब को रोक कर शिक्षक बोले-” आप सब इन नीमों को देखकर क्या सोचते हो ? जरा बताइये । ” हम में से एक बोले – सोचना क्या ? हम सब घूमने आते हैं और रोज इनसे दातुन तोड़ कर दातुन करते हैं , बताया भी गया है कि नीम की दातुन स्वास्थ्य के लिए अच्छी होती है ।
“क्या आपने अन्य पेड़ों की तुलना में इन नीम के पेड़ो की दशा पर भी ध्यान दिया , शिक्षक ने कहा , ये नीम के पेड़ कक्षा में कुपोषण के शिकार बच्चों की भाँति सबसे अलग-अलग से दिखाई नहीँ दे रहे , इनकी इस दशा के दायी क्या हम सब नहीं ! बताइये ,आधे शहर की दातुन की जिम्मेदारी क्या यें निभा पायेंगे !! हम सब उनकी बात सुनकर चकित रह गये । हममें से एक बुजुर्ग ने कहा- मास्टरजी, इस तरह तो हमने सोचा ही नही , लेकिन देर आयद-दुरस्त आयद अब हम दातुन नही तोड़ेंगें साथ ही अन्य को भी समझायेंगे । कुछ दिनों बाद गर्मियों की छुट्टी बिताने मास्टरजी अपने गाँव चले गये ।
आज एक जुलाई है । मास्टर जी ,अपने गाँव से छुट्टियाँ     बिताकर सुबह वाली बस से शहर आ रहे है । जैसे जैसे शहर करीब आने लगा , उनकी आँखे कुछ अधीर होने लगी अचानक बस की खिड़की से क्या देखते हैं कि उन नीमों की डालियों पर नव कोंपलें हिल-हिल कर आने जाने वालो का अभिवादन कर रही थी ,अब वो कुपोषित बच्चों जैसे नहीं लग रहे थे । ये दृश्य देखकर मास्टर जी के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई । इस रहस्य को बस में अन्य कोई भी नही समझ पाया ।
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