मई-2017

देशमुक्ति     Posted: May 2, 2017

 उसके पिता की इच्छा थी कि उनकी अस्थियाँ गंगा में प्रवाहित की जाये । उसकी गांठ में जो पैसा था , वह तो अंत्येष्टि-क्रिया में ही लग गया था । अब अस्थि-विसर्जन और तेरहवीं के कर्मकांड बाकी थे । रिश्तेदारों से कुछ रुपये उधर लेकर अस्थि-विसर्जन के लिए उसने हरिद्वार की ट्रेन पकड़ ली । पिता की मौत से दुखी वह इसी उधेड़बुन में था कि तेरहवीं के लिए किसके आगे हाथ पसारेगा । उसकी हालात तो इतनी खस्ता थी कि वह हर रोज कुआँ खोदता और पानी पीता था । आने वाले खर्च के बारे में सोचकर उसके माथे पर चिन्ता की लकीरें खिंच गईं थी । ट्रेन स्टेशन पर रुकी । वह गले में अस्थियों की पोटली बांधे गंगा घाट को चल दिया । उसे देखते ही हाथ पसारते भिखारियों की चौकड़ी उसके पीछे लग गई । कुछ के हाथों में पैसे टिकाकर तो कुछ को डांट डपटकर उसने उनसे अपना पीछा छुड़ाया । सफेद वस्त्र और मुँडे सिर को देखते ही घाट पर पंडो ने गिद्धों की तरह उसे घेर लिया । इधर-उधर से पड़ताल कर वह बड़ी जहमत से अपने कुल के पंडे तक पहुँचा । पंडे  ने अस्थि-विसर्जन की तैयारी शुरू की । पंडे के मंत्र रूपी बाण सीधे उसकी जेब पर प्रहार कर रहे थे । कभी इस नाम के तो कभी उस नाम के पैसे । हर मंत्र के साथ उसकी जेब से पचास-सौ ढीले हो रहे थे । वह अंदर तक भुन चुका था और उसकी मुट्ठियाँ भिंची जा रही थी । पंडा भी उसके चेहरे पर उतरे गुस्से को भांप गया था । इसलिए बिना और देर किए उसने आखिरी पटकनी दी , ” यजमान , गऊदान के ग्यारह सौ रुपये .”

वह तमतमाते हुए उठा और स्वयं ही पिता की अस्थियाँ गंगा में बहा दी । अब वह हल्का महसूस कर रहा था ।

कुणाल शर्मा–0-137 , पटेल नगर ( जण्डलि ),अम्बाला शहर : 134003(हरियाणा)

 

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