मई-2018

देशान्तरमुनासिब कार्रवाई     Posted: May 1, 2018

जब हमला हुआ तो मुहल्ले में से अल्पसंख्यकों के कुछ आदमी तो कत्ल हो गए, जो बाकी थे, जान बचाकर भाग निकले। एक आदमी और उसकी बीवी अलबत्ता अपने घर के तहखाने में छुप गए।
दो दिन और दो रातें छुपे हुए मियाँ-बीवी ने कातिलों के आने की सम्भावना में गुज़ार दीं, मगर कोई न आया।
दो दिन और गुजर गए। मौत का डर कम होने लगा। भूख और प्यास ने ज्यादा सताना शुरू किया।
चार दिन और बीत गए। मियाँ-बीवी को ज़िन्दगी और मौत से कोई दिलचस्पी न रही। दोनों छुपे स्थान से बाहर निकल आए।
खाविन्द ने बड़ी दबंग आवाज में लोगों को अपनी तरफ मुतवज्जह (आकर्षित) किया और कहा, ‘‘हम दोनों अपना-आप तुम्हारे हवाले करते हैं-हमें मार डालो।’’
जिनको मुतवज्जह किया था, वे सोच में पड़ गए, ‘‘हमारे मजहब में तो जीव-हत्या पाप है।’’
वे सब जैनी थे, लेकिन उन्होंने आपस में मशवरा किया और मियाँ-बीवी को मुनासिब कार्रवाई के लिए दूसरे मुहल्ले के सुपुर्द कर दिया।
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